हमारा उद्देश्य केवल सत्ता बदलना नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को बदलना है जो बार-बार जनता को संघर्ष करने पर मजबूर करती है:- हिमांशु युवा बलाश

देशभर के जन-समुदायों, संगठनो, युवाओ के नाम एक खुली अपील

“जन-संसाधनों पर जन-अधिकार स्थापित करने का समय आ गया है”

प्रिय देशवासियों,

हमें तीन शक्तियों को एक करना होगा:
किशोर — जिनमें ऊर्जा और विद्रोह है.
नौजवान — जिन पर जिम्मेदारियों का बोझ है.
बुजुर्ग — जिनके पास अनुभव और चेतना है.

हम लगातार अपनी-अपनी आवाज़ अपने-अपने मुद्दों के लिए उठाते आए हैं। देश भर के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग संगठनों ने संघर्ष किए, कई लड़ाइयों में सफलताएँ भी हासिल की लेकिन वे सभी सफलताएँ बिखरी हुई रहीं। कुछ समय बाद हमारे सामने फिर एक नया संकट, एक नया मुद्दा खड़ा किया गया और हम फिर उसी नए संघर्ष में उतर गए। इस दौर में लड़ाई के तौर-तरीके और रणनीतियाँ बदलनी होंगी, अन्यथा हम भी अभिमन्यु की तरह आवेश में आकर चक्रव्यूह में फँसकर समाप्त कर दिए जाएँगे।

नौजवान सत्ता की कुटिल चालों और व्यवस्था के गहरे षड्यंत्रों को पूरी तरह समझे बिना संघर्ष के मैदान में उतर रहा है। वह जोश में चक्रव्यूह में घुसना जानता है, लड़ना भी जानता है, लेकिन उससे बाहर निकलने की सामूहिक रणनीति और दीर्घकालिक संगठनात्मक दृष्टि के अभाव में बार-बार कुचला जा रहा है।

दुनिया भर के संघर्षशील समाजों, शक्तिशाली राजाओं और बड़े-बड़े साम्राज्यों ने इतिहास में यही गलती बार-बार दोहराई। वे लड़ते रहे, अनेक संघर्षों में जीत भी हासिल करते रहे, लेकिन केवल अस्थायी परिवर्तन ही स्थापित कर सके। परिणामस्वरूप युद्ध, संघर्ष और टकराव निरंतर जारी रहे।जब तक नई परिस्थितियों के अनुरूप नए पैंतरे, मजबूत संगठन, वैचारिक स्पष्टता और दूरदर्शी रणनीति तैयार नहीं की जाएगी, तब तक यह संघर्ष केवल दोहराया जाता रहेगा और जनता स्थायी परिवर्तन से दूर ही रहेगी।

हमारा उद्देश्य केवल युद्ध जीतना नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था को बदलना है जो बार-बार जनता को संघर्ष करने पर मजबूर करती है। आज देश की स्थिति फिर उसी मोड़ पर खड़ी है। हम अलग-अलग मोर्चों पर बिखरकर लड़ रहे हैं — किसान अपने मुद्दे पर, छात्र अपने मुद्दे पर, मजदूर अपने मुद्दे पर, महिलाएँ अपने अधिकारों के लिए, बेरोजगार युवा रोजगार के लिए, आदिवासी जल-जंगल-जमीन के लिए।

लेकिन हमारी बिखरी हुई शक्तियाँ व्यवस्था परिवर्तन का आधार नहीं बन पा रहीं।

सन 2010 तक आते-आते देश में ऐसा ही माहौल बन चुका था। भूमि अधिग्रहण, परमाणु संयंत्रों, जल संकट, बेरोजगारी, शिक्षा, विस्थापन और जन-अधिकारों के सवालों पर पूरा देश आंदोलनों से भर गया था। जनता सड़कों पर थी और व्यवस्था के खिलाफ व्यापक असंतोष दिखाई देने लगा था।

लेकिन उसी समय वैश्विक शक्तियों, विशेषकर वर्ल्ड बैंक समर्थित “The Fight Against Corruption” जैसी मुहिम को इस प्रकार खड़ा किया गया कि देश की जमीनी लड़ाइयों की दिशा ही कुचल दी गई। जनता का ध्यान व्यवस्था परिवर्तन, संसाधनों पर जन-अधिकार और आर्थिक नीतियों के सवालों से हटाकर एक सीमित राजनीतिक विमर्श में बाँध दिया गया।

परिणाम यह हुआ कि जन-संघर्षों को पुनर्गठन और व्यापक व्यवस्था परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ने से रोक दिया गया। जो ऊर्जा एक बड़े जन-आंदोलन और वैकल्पिक व्यवस्था निर्माण का आधार बन सकती थी, वह धीरे-धीरे नियंत्रित और शांत कर दी गई।

इसके बाद देश में दो बड़ी राजनीतिक लहरें खड़ी की गईं — एक भाजपा की और दूसरी आम आदमी पार्टी की। दोनों धाराएँ आपस में टकराने का राजनीतिक नाटक करती रहीं, जबकि आम जनता की वास्तविक समस्याएँ — जल, जंगल, जमीन, रोजगार, शिक्षा, आर्थिक गुलामी और कॉर्पोरेट कब्जा — पीछे धकेल दिए गए।जनता को वैचारिक रूप से विभाजित कर दिया गया, संघर्षों को बिखेर दिया गया और व्यवस्था परिवर्तन की संभावनाओं को धीरे-धीरे कमजोर किया गया।

आज फिर दुनिया करवट बदल रही है। पूरी दुनिया में आर्थिक संकट, कॉर्पोरेट नियंत्रण, संसाधनों की लूट और जन-अधिकारों पर हमले तेज़ हो रहे हैं। भारत भी उसी दौर से गुजर रहा है और हमें सावधान रहना होगा —कहीं फिर कोई ऐसा प्रायोजित नैरेटिव खड़ा न कर दिया जाए जो जनता की वास्तविक लड़ाइयों को भटका दे और आने वाले 15 वर्षों तक जन-आंदोलनों को कमजोर कर दे।

इस बार हमें केवल किसी चेहरे, किसी मैगेसैसे पुरस्कारधारी या किसी तैयार किए गए “नायक” के पीछे नहीं चलना है। बल्की इस बार जनता को स्वयं अपनी आवाज़ बनना होगा। आज स्थिति यह है कि कॉर्पोरेट शक्तियाँ और दुनिया के कुख्यात प्रत्यक्ष एवं परोक्ष वैश्विक नेटवर्क सत्ता संरचनाओं पर अपना प्रभाव बनाए हुए हैं। वहीं विपक्ष भी जनता की वास्तविक लड़ाइयों को निर्णायक रूप से अपने हाथ में लेने की स्थिति में दिखाई नहीं देता।

ऐसे में प्रश्न यह है कि:-

  • भारत कब तक अंतरराष्ट्रीय शक्तियों के लिए एक राजनीतिक और आर्थिक प्रयोगशाला बना रहेगा?
  • कब तक यह देश वैश्विक बाजार और बाहरी हितों के इशारों पर कठपुतली की तरह नाचता रहेगा?
  • कब तक जनता एक दल से निराश होकर दूसरे दल को आजमाने के अंतहीन चक्र में अपना समय और भविष्य बर्बाद करती रहेगी?

देश की वर्तमान परिस्थितियों में केवल चुनावी परिवर्तन पर्याप्त दिखाई नहीं देता, जबकि दूसरी ओर अराजक हिंसात्मक टकराव भी किसी सुरक्षित और जनहितकारी पुनर्गठन की गारंटी नहीं देता। इतिहास गवाह है कि अव्यवस्थित अराजकता का लाभ अक्सर संगठित और चालाक शक्तियाँ उठा लेती हैं।

आज देश में धार्मिक ध्रुवीकरण, सामाजिक तनाव और वैचारिक टकराव का वातावरण लगातार बढ़ाया जा रहा है। ऐसी परिस्थितियाँ भविष्य में व्यापक सामाजिक संघर्ष और अस्थिरता को जन्म दे सकती हैं। इसलिए आवश्यक है कि देश के जागरूक नागरिक, सामाजिक संगठन, समुदाय, बुद्धिजीवी, किसान, मजदूर, युवा और जनपक्षधर शक्तियाँ आपसी संवाद और व्यापक सहमति के आधार पर एकजुट हों।यदि समाज संगठित नहीं हुआ, तो आने वाले समय में लोकतांत्रिक अधिकार — जैसे सवाल पूछने का अधिकार, असहमति व्यक्त करने का अधिकार और सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार — लगातार कमजोर किए जा सकते हैं।

इसलिए समय की मांग केवल विरोध नहीं, बल्कि दूरदर्शी संगठन, वैचारिक स्पष्टता, सामाजिक एकजुटता और जन-अधिकारों की रक्षा के लिए मजबूत लोकतांत्रिक तैयारी की है।।

कभी न कभी इस देश की जनता को तीसरा पक्ष जनपक्ष खड़ा करना ही होगा — ऐसा जनपक्ष जो सत्ता के नथुनों में हाथ डालकर जनविरोधी नीतियों को रोक सके। जब तक जनता स्वयं व्यवस्था परिवर्तन की ताकत नहीं बनेगी, तब तक कोई भी दल हो — जनता पीसती रहेगी। आज केवल चुनावी बदलाव पर्याप्त नहीं है। यदि समाज संगठित नहीं हुआ, तो असंतोष बढ़ेगा, टकराव बढ़ेंगे और देश अराजक संघर्षों की ओर धकेला जाएगा।इसलिए आज सबसे बड़ी जरूरत राष्ट्रीय एकीकरण की है — जहाँ किशोरों का जोश, युवाओं की जिम्मेदारी और बुजुर्गों का अनुभव एक साथ खड़ा हो।

हमें तीन शक्तियों को एक करना होगा: किशोर — (जिनमें ऊर्जा और विद्रोह है.), नौजवान — (जिन पर जिम्मेदारियों का बोझ है.) और बुजुर्ग — (जिनके पास अनुभव और चेतना है.) इन्हीं तीनों के मेल से नया भारत खड़ा होगा। व्यवस्था परिवर्तन केवल किताबों, घोषणापत्रों, सिद्धांतों, भाषणों और नारों से नहीं आएगा। अपने अहम, वहम, झंडे, डंडे टोपी, सिद्धांतों आदर्शों की पोटली में टांग कर एकजूट होना पड़ेगा वर्ना बिखरे हुए लोग आवाज़ भी बुलंद नहीं कर पाते और हम व्यवस्था परिवर्तन की बात करते हैं।

1977 में भी व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई सात आयामों पर लड़ी गई थी, लेकिन बाद में वह अलग-अलग दलों में बंटकर रह गई। इस बार परिस्थितियां पहले से भयानक और बहुआयामी हो गयी है। हम इस नई लड़ाई को केवल एक “सेनापति” के आधार पर खड़ा करना नहीं चाहते। यह संघर्ष बदलते नेतृत्व, बढ़ती जिम्मेदारियों और सामूहिक भागीदारी के साथ तब तक जारी रहेगा जब तक नई व्यवस्था स्थापित नहीं हो जाती।आज हमारा देश ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ जल, जंगल, जमीन, खनिज, नदियाँ, पहाड़ और प्राकृतिक संसाधनों पर जनता का अधिकार लगातार कमजोर किया जा रहा है। विकास के नाम पर सरकारें जन-संसाधनों को बड़े कॉर्पोरेट घरानों और देशी-विदेशी कंपनियों के हवाले कर रही हैं।

यह केवल जमीन का सवाल नहीं है — यह हमारे अस्तित्व, हमारी आने वाली पीढ़ियों और भारत की आत्मा का प्रश्न है। हम यह मानते हैं कि — “देश के संसाधनों के असली मालिक जन-समुदाय हैं — न सरकारें और न कंपनियाँ।” हमारा संघर्ष किसी दल या सत्ता के लिए नहीं, बल्कि जन-अधिकार, स्वदेशी, स्वराज, आत्मनिर्भरता और आर्थिक आज़ादी के लिए है। आज जरूरत है कि —हर गाँव, हर युवा अपनी आवाज बुलंद करे, हर नागरिक जन-संसाधनों की रक्षा के लिए आगे आए, सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक जनता की आवाज गूँजे.

यदि संगठित होंगे, तो कोई भी ताकत जनता के अधिकारों को नहीं छीन सकेगी।


नई आज़ादी की इस लड़ाई में शामिल हों और जन-मालिकियत स्थापित करने के इस ऐतिहासिक अभियान का हिस्सा बनें।

याद रखना हम ना रुकेंगे, ना झुकेंगे, ना बिकेंगे, ना टुटेंगे, ना पीछे हटेंगे, अपने अधिकार छीन कर रहेंगे

हिमांशु युवा बलाश
राष्ट्रीय युवा संयोजक
आज़ादी बचाओ आंदोलन
“देश की अस्मिता और अखंडता को समर्पित”

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