Ògún 2024

कुछ जान की कुछ मन की

बसनिया बांध का लाभ-हानि का आंकङा हतप्रभ करने वाला : राजकुमार सिंहा

 मध्यप्रदेश के नर्मदा घाटी में 29 बांधों की श्रृंखला में बस्निया (ओढ़ारी) बांध भी है।इस बांध से 8780 हेक्टेयर भूमि में सिंचाई और 100 मेगावाट जल विधुत उत्पादन होगा। इस बांध से 6343 हेक्टेयर जमीन डूब में आएगा।जिसमें 2443 हेक्टेयर निजी, 1793 हेक्टेयर शासकीय और 2107 हेक्टेयर वन भूमि डूब में आने के कारण 2737 परिवार विस्थापित एवं प्रभावित होंगे। देश के विभिन्न बांधों के अध्ययन से पता चलता है कि जितने रकबा में सिंचाई का दावा किया जाता है उसमें से मात्र 60 से 70 प्रतिशत रकबा ही सिंचित हो पाया है।इस आधार पर बस्निया बांध से निर्धारित 8780 हेक्टेयर रकबा का अधिकतम 70 प्रतिशत के हिसाब से आकलन करने पर मात्र 6146 हेक्टेयर जमीन में सिंचाई होगा जबकि 6343 हेक्टेयर जमीन डूब में आ रहा है।इसका अर्थ है कि सिंचाई के रकबा से अधिक 197 हेक्टेयर भूमि डूब में आ रहा है।मालूम हो कि मिट्टी को बनने में लाखों वर्ष लगे हैं और धरती का स्वरूप आया है।  इसमें कोई दो राय नहीं है कि मंडला और डिंडोरी जिले के किसानों के खेतों में पानी पहुंचाना अति आवश्यक है।इसके लिए हमें बांध के अलावा अन्य विकल्पों पर विचार करना चाहिए।नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के पूर्व अध्यक्ष रजनीश वैश्य ने मिडिया को बताया था कि अब नर्मदा घाटी में बांध नहीं बना कर नर्मदा से पानी लिफ्ट कर खेतों में पानी पहुंचाया जाएगा। दूसरी ओर पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा 21 नवम्बर 2023 को नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण को लिखे गए पत्र में बताया गया है कि 100 मेगावाट में से मात्र 35 करोड़ युनिट वार्षिक विधुत उत्पादन होगा।इस 35 करोड़ युनिट को अधिकतम 5 रुपये प्रति युनिट में बिक्री किया जाता है तो 175 करोड़ रुपये की आमदनी होगी।उत्पादन स्थल से उपभोक्ताओं तक बिजली पहुंचाने के दौरान न्यूनतम 15 प्रतिशत बिजली की हानि होता है।अगर 15 प्रतिशत हानि को जोड़ा जाए तो आमदनी 148.75 करोड़ रुपये वार्षिक रह जाएगा।इस परियोजना की लागत 2884 करोड़ रुपये है।अगर इस पूंजी को किसी भी बैंकों से न्यूनतम 8 प्रतिशत ब्याज की दर से ऋण लिया जाता है तो 230 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष ब्याज भुगतान करना होगा।इस परियोजना से एक मेगावाट बिजली उत्पादन का खर्च 28.84 करोड़ रुपये खर्च आ रहा है जबकि सोलर प्लांट से लगभग 4.5 करोड़ रुपये आएगा। बिजली उत्पादन से प्रतिवर्ष मिलने वाला आमदनी और ब्याज भुगतान का अंतर काफी बङा है।जबकि बांध बनने के कारण खेती, जंगल, जैवविविधता और मवेशी से होने वाले आमदनी की हानि का आंकलन शामिल नहीं है।  मध्यप्रदेश सरकार ने सन् 2020 में नर्मदा बेसिन प्रोजेक्ट कम्पनी बना कर घाटी की विभिन्न परियोजनाओं को पूरा करने के लिए पावर फाइनेंस कार्पोरेशन से 20 हजार करोड़ रुपये ऋण लेने का अनुबंध किया था।बस्निया बांध में लगने वाला 2884 करोड़ रुपये मध्यप्रदेश की जनता को टेक्स के रूप में भुगतना होगा और  फायदा ठेकेदार एवं व्यापारियों को होगा। आश्चर्य है कि बस्निया बांध निर्माण के कारण नर्मदा नदी, नाला के जलग्रहण क्षेत्र में उसके वहन क्षमता और निरंतरता का संचयी प्रभाव (कम्युलेटिव इम्पेक्ट) का अध्ययन नहीं किया गया है। ‌‌दूसरी ओर वन भूमि का परिवर्तन, जैव विविधता हानि के कारण जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र पर पङने वाले असर का पर्यावरणीय दृष्टि से लाभ हानि का विश्लेषण भी नहीं हुआ है और परियोजना के कारण जलीय और स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर पडने वाला असर का भी अध्ययन नहीं हुआ है।जिसके कारण अभी बसनिया बांध को पर्यावरणीय और वन भूमि परिवर्तन की मंजूरी नहीं मिला है।परन्तु नौकरशाहों ने देश के प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को अंधेरे में रखकर उनसे बांधों का  शिलान्यास करवा लिया है।  उपरोक्त तथ्यों से साफ हो गया है कि यह परियोजना प्रदेश की जनता और विस्थापित परिवारों को कंगाल बनायेगा। नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण को बस्निया बांध परियोजना के लाभ- हानि पर सार्वजनिक चर्चा आयोजित करना चाहिए। लेखक:- राजकुमार सिंहा 

आंदोलन समाचार

बांध निरस्त करने की मांग, मुआवजा हमें मंजूर नहीं : बजारी सरवटे

संघर्ष के साथी सम्पर्क सूत्र:- बजारी लाल सर्वटे, अध्यक्ष (9300509691)तितरा मरावी, उपाध्यक्ष  (9111411084)बसनिया (ओढारी) बांध विरोधी संघर्ष समिति (मंडला- डिंडोरी) के द्वारा:- हिमांशु युवा बलाश  (नई आजादी उद्घोष) गांव और जंगल को विस्थापित करके बनाए जाने वाले विकास और उन्नति के नाम पर नाजायज़ व गैर जरूरी बांधों के दिखाए जाने वाले सब्ज़बागो से ग्रामीणों, आदिवासियों और आमजन को जिस तरीके से मुआवजा के लालच पर ठगा जा रहा है उसके मद्देनजर लगता है की सरकारों की आंखों पर लालच और लूट की जो पट्टी बंधी है उससे राष्ट्र के विकास की बात तो दूर की है विनाश की जो रेखा खींची जाएगी। उससे इस उजाड़ से आने वाली पीढ़ियों को उभरना नामुमकिन  हो जाएगा।   विगत दिनों मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने अपने डिंडोरी प्रवास के दौरान अपने वक्तव्य में कहा था कि जो अपर नर्मदा, राघवपुर और बसनिया बांध प्रभावितों की मांग मुआवजा बढाकर देने की है उन्हें  मुआवजा बढाकर दिया जाएगा। मुख्यमंत्री के वक्तव्य पर प्रतिक्रिया देते बसनिया (ओढारी) बांध विरोधी समिति के अध्यक्ष बजारी लाल सर्वटे ने कहा कि प्रभावित परिवारों ने बांध निरस्त करने को लेकर ग्राम सभा में प्रस्ताव पारित कर सबंधित जिला अधिकारी और जनप्रतिनिधियों को लिखित में दिया है।हजारों की संख्या में आदिवासी एवं अन्य परम्परागत वन निवासियों ने इस बांध के खिलाफ मंडला एवं डिंडोरी जिला मुख्यालय में रैली निकालकर सरकार को ज्ञापन दिया है। इस मामले में स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों द्वारा मुख्यमंत्री को गुमराह किया गया है।    समिति के उपाध्यक्ष तितरा मरावी ने कहा कि मंडला और डिंडोरी जिला अनुसूचित क्षेत्र में अधिसूचित है। जहां पेसा कानून 1996, मध्य प्रदेश पेसा नियम 2022 और मध्यप्रदेश भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्विस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार नियम 2015 लागू है। कानूनी प्रावधानों के अनुसार सरकार ग्राम सभा की सहमति के बिना भूमि अधिग्रहण नहीं हो सकती है।परन्तु ग्राम सभा की असहमति के बाद भी जिला प्रशासन भू अर्जन की कार्यवाही को आगे बढा रहा है जो पेसा कानून और नियम के विरुद्ध है।       दूसरी ओर 3 मार्च 2016 को तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विधानसभा में पूछे गए एक सवाल के जबाब में लिखित दिया है कि बसनिया, राघवपुर, अपर बुढनेर,रोसरा, मछरेवा, अटारिया और शेर  बांधों को निरस्त किया गया है। इसे फिर से प्रारम्भ करने के पीछे बांध बनाने वाली निजी कम्पनी और नौकरशाहों की गहरी साजिश है।बांध के कारण इस क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र, पर्यावरणीय, जैवविविधता और जलीय जीव पर प्रतिकूल असर के कारण अपरिवर्तनीय नुकसान होगा। मध्यप्रदेश के हिस्से वाली नर्मदा घाटी में 29 बङे बांध प्रस्तावित है।इसमें से कई बड़े बांध बनाए जा चुके हैं। अतः उन सभी बांधों का नर्मदा नदी पर पङने वाले प्रभावों का एकत्रित मुल्यांकन पर्यावरणीय दृष्टि से आवश्यक है, जो अध्ययन अभी तक नहीं किया गया है।बसनिया बांध में 6343 हेक्टेयर जमीन डूब में आएगा जिसमें 2107 घना जंगल डूब में आने वाला है और 8780 हेक्टेयर जमीन में सिंचाई प्रस्तावित है।इसी बांध के उपर राघवपुर बांध से 4600 हेक्टेयर जमीन डूब में आएगी और 17587 हेक्टेयर जमीन में सिंचाई होने का दावा किया जा रहा है।जबकि हकीकत यह है कि सिंचाई का जितना लक्ष्य दर्शाया जाता है उसमें से मात्र 60 से 70 फिसदी में सिंचाई का पानी पहुँच पाता है।    विगत दिवस चिमका टोला में आयोजित संगठन की बैठक में सभी लोगों ने अनुरोध किया कि सरकार आदिवासी समाज की मांग को ध्यान में रखते हुए बांध को निरस्त करे। जिससे आस्था की नदी नर्मदा और उसके किनारे बसे आदिवासी समुदाय की जिंदगी एवं पर्यावरण सुरक्षित हो सके। संगठन ने निर्णय लिया है कि आगामी 22 सितंबर को विश्व नदी दिवस पर क्षेत्र में नर्मदा को बचाने संकल्प सम्मेलन आयोजित किया जाएगा।इस बैठक में जमुना बाई तेकाम, बरतो बाई मरावी, राजेन्द्र कुलस्ते, सुबेसा बाबा विश्वकर्मा,महेन्द्र परस्ते, लहर दास सोनवानी,प्रेम लाल कर्मो, अर्जुन कर्मो, लामू सिंह मरावी, सुरेश मरावी आदि उपस्थित थे।————————————————- ___________________________

आंदोलन समाचार

GM बीज स्वास्थ्य के लिए ही नहीं देश की अस्मिता, स्वतंत्रता और सम्प्रभुता के लिए खतरा है।

गत दिनांक (22.08.2024) किसान भवन चंडीगढ़ में देवेंद्र शर्मा जी के  आह्वान पर राष्ट्रीय किसान सम्मेलन “National Conclave of Farmer Leaders on GM Crops” जिसमें देश भर के करीब 18 राज्यों के 90 संगठनों के प्रतिनिधियों ने बीटी बीजों के संदर्भ में कार्यक्रम किया। सम्मेलन को सम्बोधित करते देवेन्द्र शर्माजिसमे आनुवांशिक रूप से संशोधित बीजों (GM Seed’s) के मानवीय, वानस्पतिक, कृषि विविधता और पशु स्वास्थ्य के नुकसान के साथ साथ देश की अस्मिता, आर्थिक व राजनैतिक स्वतंत्रता, राष्ट्रीय सम्प्रभुता व सामाजिक दृष्टिकोण के लिए घातक है और इसके भारत में प्रयोगों से भयावह व भयंकर परिणाम सामने आएंगे और जिसके भयंकर प्रभावों को कॉरपोरेटी प्रभाव के चलते सरकारी प्रचार के जरीए दबाने की साजिश को रोकना होगा। हमें उसका प्रचार व प्रभाव को प्रभावी ढंग से जन आंदोलन के रूप में जनजागृति के तहत देश भर के कोने-कोने में मजदूर -किसान,महिला,विद्यार्थी,नौजवान,आदीवासी,हर वर्ग और क्षेत्र,कर्मचारी,अधिकारी राज्य व केंद्र सरकार तक पहुंचाई जाए ताकी देश में एक माहौल खड़ा हो जो बिना किसी गुरेज के देश में सवालों का माहौल व मसला बना सके।           देवेन्द्र शर्मा जी के आह्वान पर आयोजित कार्यक्रम में देश भर के किसान प्रतिनिधियों का देवेन्द्र जी ने सबसे पहले स्वागत कर आभार प्रकट किया।उसके बाद उन्होंने कार्यक्रम की रुपरेखा सभी सम्मानित सदस्यों के सामने रखी। समय की गरिमा को समझते हुए कम समय में सभी बिंदुओं पर सात्विक चर्चा हो और एक एक्शन प्लान बने उसके लिए जोर देकर कर कार्यक्रम की रूपरेखा को आगे बढ़ाया और जी एम बीज पर अपनी बात रखते हुऐ कहा की भूतकाल में देश भर के किसान नेता इस बात पर एकमत थे कि यहां जीएम फसलों की अनुमति नहीं दी जाए और किसानों के बीच यह सर्वसम्मति है की “जीएम फसलें पर्यावरण, किसानों और मनुष्यों की आजीविका और पशु स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं।”सम्मेलन में एक अन्य राय भी बनी की उपस्थित सभी किसान प्रतिनिधियों अपने हस्ताक्षर सहित एक प्रस्ताव “केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन” मंत्री भुपेंद्र यादव को भी भेजेंगें। जिस पर सभी सभा सदस्यों की एक राय बनी और प्रस्ताव भेजना तय हुआ।         इसके साथ साथ हाल ही में आए  सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने मंत्रालय से एक राष्ट्रीय नीति विकसित करने को कहा है जिसमें देश के किसान प्रतिनिधियों के मशविरे को साथ लेने की भी बात कही सम्मेलन में सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का सम्मान किया गया।गुजरात से आए किसान नेता कपिल शाह ने सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए बताया की शुरुआती दौर में प्रचार किया गया की जीएम बीजों से कीटनाशकों के इस्तेमाल की जरूरत खत्म हो जाएगी लेकिन वास्तव में कीटनाशकों का प्रयोग कई गुना न केवल बढ़ा बल्की कपास की खेती में आर्थिक रूप से बोझ बढ़ा और देश में आत्महत्याओं का सिलसिला भी बढ़ा। https://www.facebook.com/share/v/xwwV1iB7MQyNvnov/?mibextid=oFDknk अफसर जाफरी ने प्रेजेंटेशन देते हुए कहा की इस देश में मोनासंटो ने मंत्रालय को धता देकर बीज को पेस्टिसाइड बता कर पेटेंट लिया और देश के किसानों को धोखे में रखा कर उनकी खेती किसानी को नुक्सान पहुंचाने का काम किया . किसान एक्टिविस्ट कविता करुगांती ने कहा कि वर्तमान सरकार को जीएम फसलों पर राष्ट्रीय नीति को अंतिम रूप देने से पहले सभी हितधारकों के साथ परामर्श करना चाहिए। “वास्तव में, हमें जीएम फसलों पर नीति की नहीं, बल्कि एक जैव सुरक्षा नीति की आवश्यकता है। 2009 में, तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा सार्वजनिक परामर्श आयोजित किया गया था और बीटी बैंगन फसल की शुरूआत रोक दी गई थी, ”किसान नेता राकेश टिकैत ने बीटी कपास की विफलताओं के बारे में बात रखी और डट कर कड़े शब्दों में विरोध किया।इसके साथ साथ उन्होंने किसानों द्वारा जैविक खेती अपनाने की वकालत की।किसान नेता गुरनाम सिंह चढुनी ने कहा कि हालांकि गुप्त रूप से जीएम फसलों का क्षेत्रीय परीक्षण करने का प्रयास किया गया था, लेकिन हरियाणा में किसानों ने उन फसलों को नष्ट कर दिया। अंत में आजादी बचाओ आंदोलन से प्रतिनिधित्व कर रहे विवेकानंद माथने ने कहा जीएम बीजों पर तीस साल पहले देश में सबसे पहले जब हमने माहौल खड़ा किया तब से हमारी बीज नीति रही है की बीजों पर पेटेंट  खत्म हो ताकी किसान देशी बीजों को सहज कर अपना अधिकार स्थापित कर सके । उन्होंने कहा की किसान तथा परंपरागत बीज उत्पादकों का जैव विविधता फसल विविधता पर नैसर्गिक अधिकार है किसानों को किसी भी प्रकार के बीज बोने, उन्हें बचाने, उपयोग करने, दूसरे किसानों को देने, साझेदारी करने तथा बेचने हेतु उत्पादन करने का पूर्ण अधिकार है किसान की इस अधिकार को छिनने वाली कुख्यात कंपनियों व सरकारी नीतियों का हम कड़े शब्दों में विरोध करते हैं कृषि के क्षेत्र में किसानों द्वारा किए गए अनुसंधान को प्रोत्साहन देने और कृषि उत्पादों में कंपनियों का एकाधिकार व लूट समाप्त करने के लिए “बौद्धिक संपदा अधिकार” कानून को समाप्त किया जाए देश के विनाश के लिए जिम्मेदार जीएम बीजों के प्रयोग को तुरंत प्रतिबंधित किया जाए जीएम खाद्य पदार्थ स्वास्थ्य व प्रजनन क्षमता के लिए घातक है इसके आयात पर भी प्रतिबंध लगाया जाए। इसके साथ साथ उन्होंने बजट और खेती पर भी प्रकाश डाला।सभा मंडल में उपस्थित  सदस्य इसके साथ साथ केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, उ०प्र०, बिहार, गुजरात, दिल्ली के साथ साथ अन्य राज्यों से किसान प्रतिनिधियों, राज्यसभा सांसद, राजनैतिक सलाहकारों ने इस मसले पर अपना मत रखा और मजबूती से साथ देने की बात कही। इस कार्यक्रम में भोजन की जिम्मेदारी पंजाब से आए तीन साथियों (त्रिमूर्ति) ने ली और अच्छे से भोजन की सभी व्यवस्थाएं आदरपूर्वक की गयी। देवेन्द्र शर्मा द्वारा उन साथियों का हौसला अफजाई के साथ आभार प्रकट किया गया हैं। प्रस्तुतकर्ता:- हिमांशु युवा बलाश(नई आजादी उद्घोष)

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