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खारिज किए गए बांधो को फिर से मंजूर करना, प्रभावित आदिवासीयों के हित में नहीं :- राजकुमार सिन्हा

लेखक:- राज कुमार सिन्हालेखक:- राजकुमार सिन्हा  (बरगी बांध विस्थापित संघ के वरिष्ठ कार्यकर्त्ता हैं।) ज्यादा नहीं, कुल आठ साल पहले जिन सात बड़े बांधों को तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने ठेठ राज्य की विधानसभा में खारिज कर दिया था, उन्हें अब प्रशासकीय स्वीकृति मिल गई है। गौरतलब है कि नर्मदा घाटी के मध्यप्रदेश के हिस्से में 29 बड़े बांध प्रस्तावित हैं जिनमें से 10 का निर्माण हो चुका है और 6 का निर्माण कार्य प्रगति पर है। शेष 13 में से 10 बडे बांधों को हाल में प्रशासकीय स्वीकृति मिली है। वर्ष 2016 में मुख्यमंत्री ने विधानसभा में घोषणा की थी कि परियोजनाओं की बढ़ी कीमत, विशाल डूब क्षेत्र और वनाच्छादित क्षेत्र के नुकसान के चलते बड़े बांधों की सात परियोजनाओं को रद्द किया जा रहा है। विडियो देखने के लिए टैप करें। इनमें से एक बसनिया बांध में 2443 हैक्टेयर काश्तकारों की निजी भूमि,2107 हैक्टेयर वनभूमि और 1793 हैक्टेयर शासकीय भूमि, अर्थात कुल 6343 हैक्टेयर जमीन डूब में आएगी। इससे 42 गांवों की 8780 हैक्टेयर जमीन में सिंचाई और 100 मेगावाट जल-विद्युत उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। इसको बनाने की अनुमानित लागत 2884.88 करोङ रूपये होगी। इस बांध से डिंडोरी के 13 और मंडला जिले के 18 गांव, अर्थात कुल 31 गांवों के 2735 आदिवासी परिवार विस्थापित होंगे।‘पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय’ द्वारा गठित ‘नदी घाटी विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति’ ने पिछले वर्ष प्रस्तावित ‘बसनिया बहुउद्देशीय परियोजना’ के लिए ‘पर्यावरणीय प्रभाव आंकलन रिपोर्ट’ तैयार करने हेतु ‘संदर्भ बिन्दु’ (टीओआर, टर्म्स ऑफ रिफरेंसेस)तय करने का निर्णय लिया था। उक्त निर्णय के बाद ‘पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय’ ने ‘नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण’ को विस्तृत दिशा निर्देश जारी किए हैं जिसमें उल्लेख किया गया है कि ‘पर्यावरणीय प्रभाव आकलन – 2006’ के प्रावधानों और संशोधनों के साथ अतिरिक्त ‘विशिष्ट संदर्भ बिन्दुओं’ का अध्ययन किया जाए। इनमें परियोजना निर्माण के कारण नर्मदा नदी के जलग्रहण क्षेत्र में उसकी वहन क्षमता और निरंतरता के कुल प्रभाव का अध्ययन, वनभूमि परिवर्तन से पारिस्थितिकी तंत्र पर पङने वाले असर के लाभ-हानि का विश्लेषण, ‘पर्यावरण प्रभाव निर्धारण रिपोर्ट’ तैयार करने के लिए बेस लाइन डाटा को ‘टीओआर’ के मानक अनुसार संकलित करना शामिल है। साथ ही मिट्टी की विशेषताओं का अध्ययन कर जलाशय और जंगल के आसपास के कम-से-कम 10 गांवों के अलग-अलग स्थानों का डाटा संकलित करना होगा।‘विशिष्ट संदर्भ बिन्दुओं’ में तीनों ऋतुओं में परियोजना क्षेत्र की 10 जगहों के भूजल स्तर का नाप करना, परियोजना के कारण जलीय और स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर पङने वाले असर का अध्ययन करना, विद्युत उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाले पानी के कारण जलीय पारिस्थितिकी तंत्र एवं उत्पादन की मात्रा पर प्रभाव और उसके अनुसार पर्यावरणीय प्रबंधन कार्य योजना तैयार करना, डूब और बांध के निचले क्षेत्र में रेत खनन स्थल को चिन्हित करना, निर्माण में लगने वाली सामग्री का स्रोत और उसकी परियोजना स्थल से दूरी के साथ उसके परिवहन की विस्तृत योजना तैयार करना शामिल है।परियोजना की 10 किलोमीटर की परिधि में वाटर शेड की संभावनाओं का अध्ययन करना इसी का हिस्सा हैं। वनस्पति एवं जीवजंतु का विस्तृत अध्ययन, सबंधित क्षेत्र में पाये जाने वाले स्थानीय पौधों और जानवरों की प्रजाति की जानकारी, वन्यजीव संरक्षण की विस्तृत रिपोर्ट तैयार करना, डूब में आने वाली वनस्पति एवं जीवजंतु और पेङों की संख्या, घनत्व एवं उसकी नामावली के साथ विस्तृत रिपोर्ट तैयार करना, परियोजना के कारण पक्षियों पर पङने वाले प्रभाव और पानी के स्रोत पर पङने वाले प्रभाव का अध्ययन करना ‘विशिष्ट संदर्भ बिन्दुओं’ में शामिल हैं।इस लंबी-चौडी ‘पर्यावरणीय प्रभाव आंकलन रिपोर्ट’ के बावजूद क्या बडे बांधों से होने वाले पर्यावरणीय विनाश पर कोई अंकुश लगाया जा सकेगा? नर्मदा घाटी में पहले बने इंदिरा सागर, सरदार सरोवर, ओंकारेश्वर और बरगी बांध में लगभग 60 हजार हेक्टेयर वनभूमि और जंगल डूब चुका है। कई वर्षो से नर्मदा बेसिन में जंगलों की अंधाधुंध कटाई हुई है। ‘वन स्थिति रिपोर्ट – 1991’ के मुताबिक मध्यप्रदेश की नर्मदा घाटी के जिलों में वन आवरण कुल 52283 वर्ग किलोमीटर था, जबकि 2019 की ‘वन स्थिति रिपोर्ट’ के अनुसार 48188 वर्ग किलोमीटर रह गया है। इसका मतलब है कि बीते 28 सालों में 4095 वर्ग किलोमीटर अर्थात 4 लाख 9 हजार 500 हेक्टेयर वन आवरण कम हुआ है। वन विनाश के इस कारनामे का क्या असर हुआ? ‘जल संसाधन मंत्रालय’ की ‘वाटर ईयर बुक 2014-15’ के मुताबिक नर्मदा घाटी में 1901-1950 के दौरान औसत वार्षिक वर्षा की तुलना 2006 – 2010 के बीच करने पर पता चलता है कि नर्मदा के उद्गम वाले जिले अनूपपुर में औसत वार्षिक वर्षा 1397 मिलीमीटर से घटकर 916 मिलीमीटर रह गई है। उसी के पडौसी अपर नर्मदा के मंडला जिले में भी औसत वार्षिक वर्षा 1557 मिलीमीटर से घटकर 1253 मिलीमीटर रह गई है। बेसिन के अधिकांश जिलों की यही स्थिति है। जाहिर है, वर्षा की इस गंभीर कमी में जंगलों की बर्बादी का खासा हाथ है।नर्मदा की कुल 41 सहायक नदियां हैं जो सतपुडा, विन्ध्य और मेकल पर्वतों से बूंद-बूंद पानी लाकर नर्मदा को सदानीरा बनाती हैं, लेकिन इनमें से कई नदियां सूखने की कगार पर हैं। ‘केंद्रीय जल आयोग’ द्वारा गरूडेश्वर स्टेशन से जुटाए गए वार्षिक जल आंकङे के अनुसार 2004-05 और 2014-15 की तुलना में नर्मदा के प्रवाह में 37 प्रतिशत कमी आई है। 1975 की गणना के अनुसार नर्मदा में पानी की उपलब्धता 28 ‘मिलियन एकङ फीट’ (एमएएफ) थी। ‘नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण’ ने 1980 – 81 से प्रतिवर्ष नर्मदा कछार में उपलब्ध जल की मात्रा को रिकार्ड किया है। इस आंकङे से पता चलता है कि वर्ष 2010 -2011 में नर्मदा कछार में 22.11 ‘एमएएफ’ जल उपलब्ध था। अप्रेल 2018 की एक रिपोर्ट के अनुसार 2017 में नर्मदा नदी की जल उपलब्धता मात्र 14.66 ‘एमएएफ’ थी। ऐसी परिस्थितियों में खारिज किए गए बांधों को फिर से मंजूरी देना कहां की समझदारी होगी?

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इस बेलगाम सत्ता के नथुनों में नकेल कसनी होगी:- हिमांशु युवा बलाश

आज संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट और सड़क तक खामौश है आज ये खामौशी कल भारत के पतन का कारण बनेगी। उदय होगा तो बस खामौशी का और जब सत्ता बेलगाम हो जाएगी तो इस देश के पास सिविल नाफरमानी के सिवाय कोई रास्ता नहीं बचेगा। आज भारत की जरूरत है जब देश के तमाम लोगो को हसदेव के लिए ही नहीं बल्कि इस देश को बचाने के लिए सभी को एक मंच पर एक साथ एक हुंकार के साथ इस बेलगाम सत्ता के नथुनों में नकेल कसनी होगी। वरना आज हमारी खामोशी कल एक वीरान भारत को जन्म देगी।(पुरा विडियो देखने के लिए क्यु आर कोड को टच करें)

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परमाणु ऊर्जा संयंत्र लोगों की मौत का सौदागर :- राजकुमार सिन्हा

      केंद्र सरकार परमाणु उर्जा अधिनियम1962 के तहत परमाणु उर्जा केन्द्रों का विकास और संचालन करती है।इस अधिनियम के तहत फिलहाल घरेलू निजी कम्पनियों की उर्जा क्षेत्र में भागीदारी होती है।परन्तु नीति आयोग की ओर से गठित सरकारी समिति ने परमाणु उर्जा क्षेत्र में विदेशी निवेश पर लगी पाबंदी हटाने कि सिफारिश की है।समिति ने परमाणु उर्जा के उत्पादन में विदेशी कम्पनियों को शामिल करने के लिए परमाणु उर्जा अधिनियम के साथ विदेशी निवेश अधिनियमों में बदलाव की सिफारिश किया गया है।इसका  संकेत 2022 में भारत – अमेरिका के रक्षा और विदेश मंत्रियों  के बीच वाशिंगटन में हुई द्विपक्षीय वार्ता के समय ही मिल गया था।जब दोनों देशों के बीच आपसी व्यापार 150 अरब डॉलर तक ले जाने पर सहमति बनी जो उस समय 113 अरब डॉलर का था।इस बैठक में परमाणु,क्लाइमेट एवं क्लीन एनर्जी,  अंतरिक्ष अभियान और साईबर सुरक्षा के क्षेत्रों में 30 अरब डॉलर (लगभग 2.28 लाख करोङ रुपए) के निवेश को लेकर बातचीत हुई थी।जिसमें अमेरिकी कम्पनी भारत में 60 हजार करोङ रुपए की लागत से छह परमाणु रिएक्टर लगाने और भारत के घरेलू उपयोग और निर्यात के लिए लघु माॅडयूलर परमाणु रिएक्टर टेक्नलोजी  के विकास पर करीब 10 हजार करोङ रुपए निवेश की इच्छा जाहिर किया था।इसको लेकर उस समय न्यूक्लियर पावर कार्पोरेशन ऑफ इंडिया और वाशिंगटन इलेक्ट्रिक कंपनी के बीच बातचीत अंतिम चरण में था।कुछ दिन पहले परमाणु उर्जा विभाग ने बताया है कि वेस्टिंगहाउस इलेक्ट्रिक, जीई हिताची, इलेक्ट्रिक डी फ्रांस (ईडीएफ) समेत कई विदेशी कंपनियां देश की परमाणु उर्जा प्रोजेक्ट में भाग लेने में दिलचस्पी दिखा रही हैं।बहुराष्ट्रीय कंपनियां प्रौद्योगिक, आपूर्ति या ठेकेदार के रूप में और सेवा प्रदाता के रूप में अलग-अलग क्षेत्रों में निवेश करने ईच्छुक हैं।               जनवरी 2020 में परमाणु उर्जा विभाग (डीएई) ने इस सबंध में प्रधानमंत्री कार्यालय से चर्चा की थी।चर्चा के बाद केन्द्रीय कानून मंत्रालय से कानूनी राय मांगी गई थी कि क्या एफडीआई नीती को संशोधित कर परमाणु विद्युत क्षेत्र को निवेश के लिए खोला जा सकता है? परमाणु उर्जा विभाग का मत था कि परमाणु उर्जा अधिनियम किसी भी रूप में परमाणु विधुत परियोजनाओं में निजी क्षेत्र की भागीदारी को नहीं रोकता है।भारत सरकार ने अगस्त 2022 में विदेशी निवेश नियम और विनिमयन में संशोधन के लिए अधिसूचित किया था।             गौर तलब है कि भारत और अमेरीका कै बीच असैन्य परमाणु सहयोग के लिए 2008 के समझौते के तहत को परमाणु प्रौद्योगिकी और सामग्रियों का आयात शुरू करने की अनुमति दी गई और निजी कम्पनियों को भारतीय परमाणु बाजार में प्रवेश करने का रास्ता खोला गया।यह समझौता अमेरिका के परमाणु उर्जा अधिनियम 1954 की धारा 123 के तहत किया गया था।जिसे 123 समझौता कहा गया।इस समझौते को लेकर देश के विषय विशेषज्ञों ने गंभीर सवाल उठाये थे।     सवाल उठता है कि परमाणु क्षेत्र में निवेश करने वाली कम्पनी भारत क्यों आना चाहती है? दुनिया के 192 देश में से मात्र 30 देश परमाणु बिजली संयंत्र चला रहे हैं। इटली ने  चेर्नोबिल की दुर्घटना के बाद ही अपना परमाणु बिजली कार्यक्रम बंद कर दिया था।कजाकिस्तान ने 1999 में और लिथुआनिया ने 2009 में अपने एकमात्र रिएक्टर को बंद कर दिया था।परमाणु उर्जा संयत्रों के इतिहास की तीन भीषण दुर्घटनाओं थ्री माइल आइस लैंड (अमेरिका), चेर्नोबिल (युक्रेन) और फुकुशिमा (जापान) ने बार – बार हमें यह चेताया है कि यह एक ऐसी तकनीक है जिस पर इंसानी नियंत्रण नहीं है फुकुशिमा में आसपास के 20 किलोमीटर दायरे में 3 करोङ टन रेडियोएक्टिव कचरा जमा है।इस कचरा को हटाने में जापान सरकार ने 94 हजार करोङ खर्च कर चुकी है।विकिरण को पुरी तरह साफ करने में 30 साल लगेगें।परमाणु उर्जा स्वच्छ नहीं है।इसके विकिरण के खतरे सर्वविदित है।वहीं परमाणु संयंत्र से निकलने वाली रेडियोधर्मी कचर का निस्तारण करने की सुरक्षित विधी विज्ञान के पास भी नहीं है।ऐसी दशा में 2.4 लाख वर्ष तक रेडियोधर्मी कचङा जैवविविधता को नुकसान पहुंचाता रहेगा।इसलिए अमेरिका और ज्यादातर पश्चिम यूरोप के देशों में पिछले 35 वर्षो में रिएक्टर नहीं लगाए गए हैं।जर्मनी ने तो अपने यहां अंतिम परमाणु उर्जा संयत्र को भी इस वर्ष बंद कर दिया है।   साठ और सत्तर के दशकों में परमाणु उर्जा का बहुत शोर था।जो अस्सी के दशक आते – आते स्पष्ट हो चुका था कि परमाणु बिजली काफी महंगी पङती है।विकसित पश्चिमी देशों में परमाणु बिजली परियोजनाएं अपने बजट से ज्यादा खर्चे और योजना से ज्यादा समय लगने से पुनर्विचार के लिए बाध्य हुए। दूसरा  परमाणु बिजली घरों के संभावित खतरे,ऐसे बिजली घरों को बंद किए जाने पर आने वाली भारी लागतों और परमाणु कचरे के भंडारण की समस्या ने भी सोचने के लिए मजबूर किया है।   दरसल परमाणु बिजली उधोग में जबरदस्त मंदी है।इसलिए अमेरीका,फ्रांस और रूस आदि की कम्पनिया भारत में इसके ठेके और आर्डर पाने के लिए बेचैन है।साल 2017 में ‘ विश्व परमाणु उधोग स्थिति रिपोर्ट’ (वर्ल्ड न्यूक्लियर इंडस्ट्री स्टेटस रिपोर्ट) ने एक रिपोर्ट जारी की थी।इस रिपोर्ट में बताया गया कि पिछले चार सालों में दुनियाभर में निर्माणाधीन परमाणु रिएक्टरों की संख्या में गिरावट देखी गई है।2013 तक वैश्विक स्तर पर 68 रिएक्टरों का निर्माण कार्य चल रहा था,वहीं 2017 में निर्माणाधीन रिएक्टरों की संख्या 53 हो चुकी है।             परन्तु भारत में परमाणु परियोजना के विकास के लिए भारत के सबसे बङे बिजली उत्पादक नेशनल थर्मल पावर कार्पोरेशन (एनटीपीसी) और न्यूक्लियर पावर कार्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनपीसीआईएल) के बीच संयुक्त उद्यम अणुशक्ति विधुत निगम लिमिटेड बनाकर 1 मई 2023 को एक समझौता किया गया है।शुरुआत में संयुक्त उद्यम कंपनी दो प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (दाबित भारी जल रिएक्टर) परियोजनाओ का विकास करेगी – चुटका परमाणु परियोजना मंडला मध्यप्रदेश (2×700) और माही बांसवाडा राजस्थान परमाणु परियोजना(4×700) जिसे “फ्लीट मोड” की तरह बनाया जाएगा।रिपोर्ट के अनुसार चुटका परमाणु संयंत्र की अनुमानित लागत 25 हजार करोङ रुपए और माही परमाणु संयंत्र की 50 हजार करोङ रुपए होगी। भारत के सबसे बङे बिजली उत्पादक एनटीपीसी का लक्ष्य 2032 तक 2000 मेगावाट, 2035 तक 4200 मेगावाट और 2050 तक 20 हजार मेगावाट परमाणु उर्जा उत्पादन शुरू करना है।एनटीपीसी अभी तक ताप विद्युत और सौर उर्जा उत्पादन क्षेत्र में ही काम कर रहा था।परमाणु उर्जा क्षेत्र में

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पर्यावरण असंतुलन के लिए विकसित राष्ट्र सहित मानवीय लालच जिम्मेदार :- श्री आनंद मालवीय

आजादी बचाओ आंदोलन के तत्वावधान में जूम बैठक दिनांक 6 जनवरी 2023 को संपन्न हुई।इस जूम बैठक के मुख्य वक्ता इलाहाबाद के आंदोलन के साथी तथा पर्यावरणविद् श्री आनंद मालवीय थे। इस बैठक का मुख्य विषय ‘बदलता पर्यावरण, कारण और बदलने के प्रयास : जिम्मेदार कौन कार्पोरेट, आर्थिक महत्वाकांक्षा या दबी सहमी सरकारें’ ? श्री आनंद मालवीय ने इस मुद्दे पर विस्तार से अपनी बातें रखी।उन्होंने शुरुआत करते हुए कहा कि पर्यावरण का अर्थ है परि+आवरण पेड़ पौधे तथा जीव जंतु पर्यावरण में एक दूसरे को नियंत्रित करते हैं। पर्यावरण की चिंता प्राचीन समय से रही है। भारतीय साहित्य प्रकृति के साथ सायुज (सहोदर) बनाने पर जोर देता रहा है। प्राचीन काल में प्लेटो ने कृषि को भी पर्यावरण में हस्तक्षेप माना करते थे। लेकिन recycle होने तक इस व्यवस्था से कोई विशेष दिक्कत नहीं थी।   औद्योगिक क्रांति से यह संतुलन बिगड़ना उस वक्त शुरू हुआ,जब उत्पादन से तेजी से बढ़ा। आवश्यकता के बदले बाजार के लिए उत्पादन होने लगा। फ्रेंच अर्थशास्त्री का कथन काफी चर्चित हुआ, जब उसने कहा कि ‘एक झूठा अहंकार आ गया कि विज्ञान ने प्रकृति को जीत लिया है।’Supply credits its own demand. बाजारवाद का यह सूत्र वाक्य है। 19वीं शताब्दी के एक सामाजिक चिंतक डीन इंज ने कहा कि पर्यावरण असंतुलन हमें कई रूपों में दिखता है।              प्रारंभ में यह केवल वायुमंडलीय प्रदूषण के रूप में ही दिखता था। अब यह ध्वनि, जल, जैविक प्रजातियों के विलोपीकरण, कुछ वनस्पतियों का विलुप्तिकरण तथा ओजोन परत में छिद्र के रूप में दिखता है। यह जलवायु परिवर्तन के रूप में भी दिखता है। औद्योगिक उत्पादन जीवाश्म ईंधन का प्रयोग करता है।         खनिजों का अंधाधुंध प्रयोग मनुष्य के लालच का बड़ा कारण है।विकास कार्यों के साथ-साथ इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के लिए भी प्रकृति को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचाया जा रहा है।यहां पर उन्होंने महात्मा गांधी को उद्धृत करते हुए कहा कि धरती सभी की आवश्यकता है पूरी कर सकती हैं लेकिन किसी एक इंसान के लालच को पूरा नहीं कर सकती। 2012 के आंकड़ों के अनुसार विकास परियोजनाओं के कारण प्रतिवर्ष औसतन 30 लाख हेक्टेयर वन नष्ट किया जा रहे हैं।ग्लोबल वार्मिंग या जलवायु परिवर्तन का ताज़ा उदाहरण को अगस्त 2020 के बांग्लादेश में आई बाढ़ से समझा जा सकता है। सरकारी आंकड़े और उपग्रह से प्राप्त जानकारी के अनुसार उस वक्त बांग्लादेश का 24 से 37% क्षेत्रफल जलमग्न हुआ था। उस क्षेत्र के 10 लाख घर और लगभग 47 लाख लोग प्रभावित हुए थे। बांग्लादेश का लगभग दो तिहाई इलाका समुद्र तल से 5 मीटर से कम ही ऊंचा है। अगर वहां के समुद्र के जलस्तर में 30 से 35 सेंटीमीटर की बढ़ोतरी हुई तो बांग्लादेश के तटीय इलाकों में रहने वाले करीब साढे तीन करोड़ लोग विस्थापित हो सकते हैं। यह बांग्लादेश की कुल आबादी का एक चौथाई हिस्सा है।          पर्यावरण असंतुलन आधुनिक दौर में असमानता के सबसे विचलित करने वाले पहलुओं में से एक है। यह दुर्भाग्य है कि पृथ्वी को प्रदूषित करने में जो सबसे कम जिम्मेदार राष्ट्र है, वहीं इसका खामियाजा सबसे ज्यादा भुगत रहे हैं। पृथ्वी को गर्म करने में औसत बांग्लादेशी की तुलना में औसत अमेरिकी 33 गुना ज्यादा जिम्मेदार है। वैश्विक पर्यावरण के 40 फीसदी हिस्से की बर्बादी के लिए दुनिया की 10 फीसदी अमीर जिम्मेदार हैं। इसके उलट अति गरीब जनता की जिम्मेदारी केवल 5 फीसदी बनती है।उन्होंने अंत में कहा कि अगर दुनिया में पर्यावरण असंतुलन को समाप्त करना है तो विकसित और अमीर राष्ट्रों को इसकी पहल करनी होगी तथा इंसान को लोभ और लालच के बल पर अपनी बनाई हुई जीवन शैली को समाप्त करना होगा।         मुख्य वक्ता के भाषण के बाद सवाल जवाब का भी एक छोटा सा सत्र हुआ तथा उत्सुक प्रतिभागियों द्वारा कुछ रोचक टिप्पणी की गई. आंदोलन के संयोजक डॉक्टर मिथिलेश डांगी जो कि उस वक्त कॉरपोरेटी लूट के प्रतिरोध को स्वर देने छत्तीसगढ़ में थे, ने कहा कि छत्तीसगढ़ के हसदा वन क्षेत्र, जिसे कांग्रेसी हुकूमत के समय अदानी समूह को दिया गया था लेकिन उस वक्त तक वहां के जंगल को काटने की इजाजत अदानी समूह को नहीं थी। विधानसभा चुनाव के बाद भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के अगले दिन ही कई लाख हेक्टर पेड़ उस वन क्षेत्र से काट दिए गए। यह छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी के द्वारा की जाने वाली कारपोरेटी लूट का एक नमूना है।इस ज़ूम बैठक में अपनी बात कहने वाले उपरोक्त साथी के अलावे सीलम झा, हंसमुख भाई पटेल, प्रदीप जी, दिवाकर जी, हिमांशु युवा बलाश, मनीष सिन्हा सहित अन्य साथी मौजूद थे।

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गौतम अडानी द्वारा राजस्थान के मरुभूमि को ओएसिस में बदलने की नीति को जन-आंदोलन द्वारा रोकने की आवश्यकता- डाक्टर डांगी

23 दिसंबर 2023 को आजादी बचाओ आंदोलन की जूम बैठक संपन्न हुई। इस बैठक में राजस्थान के परिपेक्ष में अदानी के लूट पर आजादी बचाओ आंदोलन के संयोजक डॉक्टर मिथिलेश कुमार दांगी ने अपनी बात रखा।उन्होंने देश की शुरुआत करते हुए कहा कि राजस्थान का नाम आते ही शेष भारत के लोगों के मस्तिष्क में सिर्फ रेगिस्तान ,कटीली झाड़ियों के जंगल और राजपूत राजाओं के किलाओं का चित्र उभरता है परंतु ऐसा नहीं है। इस प्रदेश में भी प्रकृति ने भरपूर प्राकृतिक संसाधन दिए हैं।उदाहरण के तौर पर उन्होंने बताया कि भारत में चांदी का जितना भंडार है उसका 98% भाग राजस्थान में पाया जाता है। उसी प्रकार जिप्सम 82% ,पोटाश 94%, ब्लास्टोनाइट 100%, स्फटिक 66%, तांबा 54%, एस्बेस्टस 96%, वेंटो नाइट 75%, ओकरा 81% तथा संगमरमर 63% भंडार राजस्थान में उपलब्ध है।  इस प्रदेश में 79 प्रमुख खनिज पदार्थ बहुतायत में पाए जाते हैं । इन खनिजों को लूटने के लिए कई देशी विदेशी कंपनियां गिद्ध दृष्टि जमाए हुए हैं । कुछ ने तो अपना कार्य प्रारंभ भी कर दिया है । इन खनिजों के अलावा राज्य में विस्तृत खाली भू भाग भी है जिस पर ग्रीन एनर्जी के नाम पर सोलर पावर तथा पवन ऊर्जा उत्पादन हेतु विशाल क्षेत्र अदानी समूह को दिया गया है।यह सर्वविदित है कि अडानी समूह और अन्य कंपनियों के मालिक इन उपकारों के बदले राजनीतिक दलों को इलेक्टोरल बॉन्ड के माध्यम से भारी चंदा देकर इन सरकारों से जन विरोधी कार्य करवाती हैं। राजस्थान का भौगोलिक क्षेत्रफल की चर्चा करते हुए उन्होंने आगे बताया कि इसका क्षेत्रफल 3,42,239 वर्ग किलोमीटर है अर्थात 3 करोड़ 42 लाख 23 हजार 900 हेक्टेयर है, जो भारत के राज्यों में क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा राज्य है।इसकी लंबाई 826 किलोमीटर तथा चौड़ाई 869 किलोमीटर है।इसकी जनसंख्या लगभग 7 करोड़ है तथा यह जनसंख्या के आधार पर भारत में सातवें स्थान पर आता है। राज्य में जनसंख्या घनत्व 200 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। राजस्थान की नदियां राजस्थान का अधिकांश भाग शुष्क है परंतु यहां कई नदियां हैं जो कृषि एवं अन्य उपयोगी कार्यों के लिए बहु उपयोगी हैं तथा उन नदियों में सालों भर पानी भी रहता है इनमें से प्रमुख हैं चंबल जिसकी लंबाई 965 किलोमीटर है।अन्य नदियों में लूणी,माही ,पार्वती, बनास, साबरमती, साहिबी तथा अरवरी है। राजस्थान के वन पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि राजस्थान में कुल वन का क्षेत्रफल 328 62.5 वर्ग किलोमीटर है यह क्षेत्रफल राज्य के कुल क्षेत्रफल का 9. 54 प्रतिशत है जो देश के वांछित क्षेत्रफल से बहुत कम है। हालांकि इन वनों से राज्य घरेलू उत्पाद में 716 करोड रुपए का योगदान भी मिला है। राज्य में  राज्य में खनिज संसाधनों की स्थिति पर भी उन्होंने बात रखी। डॉक्टर डॉगी इस मुद्दे पर कहा कि राजस्थान खनिज संपदा की दृष्टि से एक संपन्न राज्य है। देश के कुल खनिज में इस प्रदेश का लगभग 22% योगदान है ।इस प्रदेश में वर्तमान में 79 प्रकार के खनिज मिलते हैं । जिनमें 56 खनिजों का ही व्यावसायिक दोहन किया जा रहा है। इन खनिजों का उत्पादन देश के कुल खनिज उत्पादन का 9% है। राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में खनिज क्षेत्र का योगदान 4.4% है।देश के कुल कच्चे तेल उत्पादन का 24% राजस्थान के बाड़मेर जिले से प्राप्त होता है जो भारत में मुंबई हाई पेट्रोलियम क्षेत्र के पश्चात दूसरा स्थान रखता है।खनिज भंडारों की दृष्टि से यह देश में झारखंड एवं मध्य प्रदेश के बाद तीसरा सबसे समृद्ध राज्य है।राज्य में खनिज संपदा के विविध प्रकारों के भंडार के कारण राजस्थान को “खनिजों का अज़ाबघर ” की उपमा से अलंकृत किया गया है। राजस्थान जैस्पर, बोलोस्टोनाइट , गार्नेट का समस्त भारत में एकमात्र उत्पादक राज्य है।सीसा ,जस्ता ,टंगस्टन, जिप्सम, फ्लोराइट ,मार्बल, एस्बेस्टस , रॉक फास्फेट, फेल्सपार , सोप स्टोन एवं चांदी के उत्पादन में देश में प्रथम स्थान पर विराजमान है । राजस्थान में वर्तमान समय में लगभग 1,90,000 बैरल खनिज तेल का उत्पादन प्रतिदिन हो रहा है । राज्य में धात्विक और धात्विक ईंधन तथा आण्विक चारों प्रकार के खनिज पाए जाते हैं प्रमुख खनिजों के भंडार इस प्रकार हैं स्रोत इंडियन मिनरल बुक 2015 से 2020 तक    नाम भंडार  मिलियन टन में ऊपर के इन खनिजों का बाजार मूल्य 2 अरब 96 करोड़ 31 लाख 53 हजार 504 करोड रुपए अर्थात 296 31.54 ट्रिलियन रुपया होता है।अगर इस कुल मूल्य का आकलन प्रति व्यक्ति किया जाए तो राजस्थान के प्रति व्यक्ति यह 42 लाख 33 हजार 76 होते हैं । यह तो मात्र यह तो मात्र 24 खनिजों के मूल्य का आकलन दिया गया है अगर शेष सभी खनिजो और पेट्रोलियम पदार्थ के मूल्य को भी जोड़ दिया जाए तो या आंकड़ा एक करोड़ के आसपास आ जाएगा। ऊपर के तालिका में मार्बल, ग्रेनाइट, गार्नेट, पेट्रोलियम, एमराल्ड,सोप स्टोन , ऐपेटाइट, एस्बेस्टस , बेरिल, सेंडस्टोन, बेंटोनिट ,फुलर्स अर्थ, ओकरा इत्यादि के मूल्य की गणना नहीं की गई है।  राजस्थान में अदानी के परियोजनाओं पर उन्होंने विस्तार से अपनी बातें रखी।उन्होंने बताया कि अदानी समूह ने राजस्थान में कई परियोजनाओं में निवेश करने का वायदा किया है जिसके कारण इस प्रदेश का बड़ा भूभाग और कई संसाधन उसके कब्जे में आएंगे।राजस्थान में अदानी समूह के प्रमुख परियोजनाएं पर उन्होंने दृष्टिपात किया। 1. सौर ऊर्जा उत्पादन  विस्तार से अपनी बात रखने के बाद डॉक्टर डांगी ने स्पष्ट कहा कि राजस्थान सहित देश के प्रत्येक भागों में जिस प्रकार विविध संसाधनों का कॉर्पोरेटीकरण या (अदानीकरण) हो रहा है उसे जन-आंदोलन के द्वारा ही दूर किया जा सकता है। मीटिंग का संचालन जलधारा अभियान, राजस्थान के उपेन्द्र सक्सेना जी ने किया। जूम मीटिंग में शामिल प्रमुख साथियों में उपेंद्र सक्सेना, धनीराम, मोहित(राजस्थान), कर्नाटक से विद्या, प्रवीर व पीटर, गुजरात से हसमुख भाई पटेल व उषा पटेल, हरियाणा से हिमांशु व राजकुमार भारत तथा यूपी से प्रदीप पाठक उपस्थित थे।

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भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर विशेष परिस्थिति में ही मुआवजा अंतिम विकल्प होना चाहिए :-डॉक्टर मिथिलेश कुमार डांगी

आजादी बचाओ आंदोलन के आंदोलनकारी की ज़ूम बैठक (शनिवार) 4 नवंबर को संपन्न हुई।इस बैठक में आंदोलन के संयोजक डॉक्टर मिथिलेश डांगी ने आंदोलन का पक्ष रखते हुए कहा कि जहां-जहां जमीन अधिग्रहण का आंदोलन चल रहा है, वहां पर आंदोलन का स्पष्ट मानना है कि हमें शुरुआत से ही सरकार की मुआवजा नीति पर संतुष्ट नहीं होना है। आंदोलन की पूरी कोशिश यह रहनी चाहिए कि विशेष परिस्थिति में ही सरकार के द्वारा जमीन अधिगृहत हो, मुआवजा अंतिम विकल्प होना चाहिए। उन्होंने झारखंड के विभिन्न जिलों में चल रहे भूमि अधिग्रहण पर आजादी बचाओ आंदोलन के सक्रियता की जानकारी दी। उन्होंने आंदोलन के साथियों से अगले महीने मध्य प्रदेश के कटनी जिले में संभावित आजादी बचाओ आंदोलन के बैठक में सर्वसम्मति से फैसले लेने पर बल दिया।डॉक्टर डांगी ने यह भी कहा कि पुराने साथियों को आंदोलन से जोड़ने की जरूरत है। इसी क्रम में सभी साथियों के साथ आंदोलन के रणनीति को लेकर एक बैठक की जानी चाहिए। यह बैठक भविष्य में देहरादून या गोड्डा में साथियों की सहमति से कराई जा सकती है। श्री आनंद मालवीय ने भी इस जूम मीटिंग में आंदोलन की विचारधारा पर बात करते हुए कहा कि बड़े कॉरपोरेट्स से छोटे दुकानदारों को बचाने के लिए हमें उन दुकानदारों से सामान खरीदने की कोशिश करनी चाहिए। उन्होंने लोकल फार वोकल की बात अपने ढंग से करते हुए कहा कि हमें देसी सामान खरीदने और उसे पहनने की कोशिश करनी चाहिए। आंदोलन के विचारधारा पर बात करते हुए उन्होंने यह भी कहा कि हमें सांप्रदायिक मुक्त विचारधारा पर कठोर तरीके से अमल करते रहना चाहिए।हरियाणा के साथी हिमांशु युवा बलाश ने आंदोलन के पोर्टल तैयार होने की बात की तथा उन्होंने यह भी कहा कि उस पर विभिन्न तरीके के वीडियो अपलोड किए जा चुके हैं। उन्होंने व्हाट्सएप चैनल शुरू करने की तकनीकी पक्ष की जानकारी दी।उन्होंने पोर्टल के माध्यम से नई आजादी उद्घोष नामक पत्रिका अपने बुद्धिजीवी साथियों के सहयोग से जल्द शुरू होने की उम्मीद जताई।आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए इलाहाबाद के दिनेश यादव ने भी उसकी सक्रियता पर बल दिया। तत्पश्चात पिछले लिए गए फैसलों के अनुसार इसकी प्रबल संभावना है कि एक पखवाड़े में आंदोलन का एक प्रतिनिधिमंडल आजमगढ़ के खिरिया बाग में चल रहे भूमि अधिग्रहण के विरोध में चल रहे आंदोलन को समर्थन देने उक्त स्थान पर जाए। इस प्रतिनिधि मंडल में झारखंड और इलाहाबाद के साथी के जाने की संभावना है।इस बात पर भी बल दिया गया कि जो साथी आंदोलन पोर्टल पर विभिन्न तरीके के लेख बेहतर तरीके से लिख सकते हैं, वह अवश्य लिखें।आंदोलन की अगली पाक्षिक बैठक दिवाली की पूर्व संध्या पर 11 नवंबर को होगा, जिसमें छत्तीसगढ़ के कारपोरेटी लूट के बारे में विस्तार से चर्चा की जाएगी।इस जूम बैठक में अपनी बात रखने वाले उपयुक्त साथी के अलावे मालती जैन तथा मनीष सिन्हा सहित अन्य साथी उपस्थित थे।

आंदोलन समाचार

उड़ीसा में पलायन रोकने के लिए जल, जंगल, जमीन तथा संसाधनों की मालकियत पर पूंजीपतियों के बदले वहां की जनता का अधिकार हो :-डॉ मिथिलेश डांगी

आजादी बचाओ आंदोलन की पाक्षिक जूम बैठक 28 अक्टूबर दिन शनिवार को संपन्न हुई। जिसमें उड़ीसा में संसाधनों की स्थिति एवं अदानी की लूट के बारे में आंदोलन के संयोजक डॉक्टर मिथिलेश डांगी ने विस्तार से अपनी बात रखी। उड़ीसा राज्य की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि आधुनिक  1 अप्रैल 1936 को स्थापित इस राज्य को  इस तिथि के दिन उत्कल दिवस या उड़ीसा दिवस के रूप में मनाया जाता है । इस समय राज्य में 30 जिले हैं । क्षेत्रफल की दृष्टिकोण से उड़ीसा भारत का नौवां तथा जनसंख्या के हिसाब से 11वां सबसे बड़ा राज्य है । कृषि यहां प्रति व्यक्ति कृषि क्षेत्र 0.2 हेक्टेयर से भी कम है।राज्य के कुल क्षेत्रफल का 45% भाग में खेत है, जिसके 80% भाग में चावल की खेती होती है। यहां लगभग 40 लाख खेत हैं, जिनका औसत आकार 1.5 हेक्टेयर है।राज्य का भौगोलिक क्षेत्रफल 1,55,707 वर्ग किलोमीटर है इसमें  58,136 वर्ग किलोमीटर में वन फैला हुआ है।इन वनों में आरक्षित वन क्षेत्र 26329 वर्ग किलोमीटर संरक्षित वन क्षेत्र 15525 वर्ग किलोमीटर तथा अवर्गीकृत वन 16283 वर्ग किलोमीटर है। वन क्षेत्र राज्य की भौगोलिक क्षेत्रफल का 37.34 प्रतिशत है जो भारत के वनों का 7.53 प्रतिशत होता है।उड़ीसा सरकार ने 1982 से 2013- 2014 तक राज्य के 42,470 हेक्टेयर वन भूमि को 3103 परियोजनाओं के लिए समर्पित किया है। उड़ीसा के खनिज संसाधनों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि उड़ीसा में बॉक्साइट, लौह अयस्क, क्रोमाइट, मैंगनीज, तांबा आदि खनिज भंडार है, जिसका बाजारg मूल्य 325 करोड रुपए हैं। जबकि इस राज्य में कुल आबादी लगभग 5 करोड़ की है अर्थात् इस राज्य में प्रति व्यक्ति खनिजों का जो भंडार है, उसका मूल्य लगभग 65 लाख रुपया होता है। लेकिन दुख की बात है कि इस संपूर्ण भंडार को देश की सरकार किसी न किसी पूंजीपति के हाथों सौंपती आ रही है। वह भी इन्हीं जनता के विकास के नाम पर, अर्थात एक व्यक्ति का 65 लाख रुपए की लूट करवाकर विकास का नाम दिया जा रहा है जबकि भारत के संविधान की धारा 39 ‘ ख’ स्पष्ट करता है की इन खनिजों का स्वामित्व और नियंत्रण का अधिकार सिर्फ और सिर्फ समुदाय के हाथों में है। उन्होंने आगे कहा कि इस देश का वर्तमान नौकरशाह पूंजी पतियों का गुलाम है और यह वर्ग सिर्फ इन्हीं पूंजीपतियों के इशारों पर काम करता है। हालांकि इस काम को भी वे जन सेवा कहते हैं तथा जनता के विकास का सब्जबाग दिखाकर पूंजीपतियों के विकास के लिए कार्य करते हैं। इसका ताजा उदाहरण उड़ीसा के सीजीमाली बॉक्साइट ब्लॉक खनन के लिए किए जा रहे जनसुनवाई को देख सकते हैं जहां 16 और 18 अक्टूबर 2023 को राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड उड़ीसा और जिलाधिकारी के समक्ष जनसुनवाई हुई, जिसमें कंपनी की तरफ से भाड़े के लोग बुलाए गए और उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी गई। उन्हीं पहचान को देखकर जनसुनवाई स्थल पर उन्हें जाने दिया गया। हालांकि स्थानीय साथियों ने इसका विरोध किया और कंपनी के दलालों को खदेड़ा लेकिन यह हाल लगभग सभी खनन क्षेत्र में दिखाई देता है। उन्होंने उड़ीसा में अदानी के प्रोजेक्ट की चर्चा करते हुए कहा कि अदानी उड़ीसा में 57575 करोड रुपए की परियोजना लगा रहा है।इसी क्रम में उन्होंने  इंटीग्रेटेड एलुमिना रिफाइनरी प्रोजेक्ट की चर्चा की। यह रायगढ़ा में स्थापित किया जा रहा है तथा इसके सपोर्ट के लिए इसी जिला के काशीपुर में 175 मेगावाट का थर्मल पावर प्लांट भी लगाया जाएगा ।इस रिफाइनरी प्रोजेक्ट का सालाना उत्पादन चार मिलियन टन होगा तथा इसके लिए बॉक्साइट की आपूर्ति उड़ीसा के ही कालाहांडी और रायगढा जिले के बॉक्साइट ब्लॉक जो वेदांत को आवंटित किया गया है उसके साथ ज्वाइंट वेंचर करके किया जाएगा । आयरन ओर प्रोजेक्ट के बारे में उन्होंने कहा कि यह देवझर, जो क्योंझर जिला में आता है। वहां स्थापित की जा रही है तथा इसकी क्षमता 30 मिलियन टन प्रतिवर्ष होगी। इसी लौह अयस्क पर आधारित एक पिलेट प्लांट की स्थापना भी अदानी के बंदरगाह धामरा के समीप में किया जा रहा है। समुद्री बंदरगाह का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अडानी समूह को उड़ीसा में धामरा बंदरगाह 38 वर्षों के लिए सौंपा गया है। इसमें 300 एकड़ भूमि दी गई है। इसकी वार्षिक क्षमता 83 मिलियन टन की है। एक मिलियन टन के लिए अदानी को 270 रूपए बतौर भाड़ा मिलेगा। इसी क्रम में उन्होंने ग्रीन स्टील मिल की चर्चा की। अडानी पोस्को के साथ मिलकर इसकी स्थापना कर रहा है। इस Posco के खिलाफ उड़ीसा में पूर्व मे  बड़ा संघर्ष हो चुका है, जिसमें कंपनी को वापस जाना पड़ा था।सोमपुरी इन्फ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड के बारे में डॉक्टर डांगी ने कहा कि यह भी धामरा के निकट त्रिवेणी कंपनी के साथ ज्वाइंट वेंचर करके किया जा रहा है।त्रिवेणी कंपनी के ऊपर सर्वोच्च न्यायालय के शाह कमीशन ने पूर्व में अवैध खनन का आरोप लगाया है। उन्होंने अदानी समूह के LNG project की चर्चा करते हुए कहा कि यह समूह धामरा के नजदीक लिक्विफाइड नेचुरल गैस का 5 मिलियन टन क्षमता का एक संग्रह एवं विपणन केंद्र की स्थापना कर रहा है। उन्होंने सड़क परियोजनाएं की भी विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि अदानी समूह को रायपुर – विशाखापत्तनम इकोनॉमिक कॉरिडोर के बाड़ाकुमारी एवं कार्की सेक्शन के बीच NH 130CD में 47.5 किमी निर्माण एवं स्वामित्व दिया गया है।उस समूह को भारत माला परियोजना में 6 लेन 67.75km सड़क निर्माण तथा टोल वसूली का कार्य दिया गया है।इस प्रकार अदानी उड़ीसा के खनिजों, ईंधनों, समुद्री व्यापार, रेल मार्ग तथा सड़क मार्ग के व्यापार पर कब्जा करने की तैयारी कर लिया है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि उड़ीसा जैसे क्षेत्रों में पलायन को रोकने के लिए जरूरी है कि अडानी जैसे पूंजीपतियों के द्वारा जिस प्रकार खनिज संसाधनों कारपोरेटीकरण  किया जा रहा है, उसका जबरदस्त प्रतिरोध किया जाए।डॉ मिथिलेश डांगी ने आह्वान किया कि इस उल्टी गंगा की धारा को सीधी दिशा में मोड़ने हेतु साझा संघर्ष की ओर एक कदम बढ़ाएं और जल, जंगल ,जमीन एवं खनिज पर जन समुदाय की मालकियत स्थापित होने तक संघर्ष जारी रखें। इस बैठक की एक विशेषता यह रही की उड़ीसा के क्षेत्र में जल, जंगल, जमीन के लिए संघर्ष करने वाले साथी

सम्पादकीय

विदेशी कम्पनी प्राईवेट मिलिट्री कारपोरेशन (PMC)से समझौता है केंद्र सरकार की अग्निपथ योजना :- हिमांशु युवा बलाश

विदेशी कम्पनी प्राईवेट मिलिट्री कॉर्पोरेशन (PMC) से समझौता है, केन्द्र सरकार की अग्निपथ योजना:- हिमांशु युवा बलाश 15वीं शताब्दी के अंत में यूरोप के दो लुटेरे के अमेरिका और भारत की लूट के साथ ही अगली दो सदियों में यूरोप वासियों ने अमेरिका और भारत से भारी मात्रा में संपत्ति और प्राकृतिक संसाधनों की बे-हिसाब लूट की। जिसके नतीजो से यूरोप में 18वीं शताब्दी में औद्योगिक क्रांति हुई इस क्रांति में यूरोपवासियों के हाथ में माप, बिजली की ऊर्जा और नई-नई मशीनें दी जिससे उनके कारखाने दिन रात चलने लगे इन कारखानों में सामान बनाने के लिए भारी मात्रा में कच्चे माल की जरूरत के कारण वह अपना बेड़ा उठा कर व्यापार के बहाने अफ्रीका व एशिया की तरफ निकल पड़े लैटिन अमेरिका और उत्तरी अमेरिका में तो वे पहले से ही मौजूद थे, इसी नीति को अक्सर “बंदूक नाव” यानी “गन बोट” नीति कहा गया है। इस नीति का भरपूर फायदा उठाकर वे व्यापार के बहाने अफ्रीका व एशिया के देशों में अपना साम्राज्य स्थापित करने में सफल हुए जिससे वहां से कच्चा माल मिलने में मुश्किल लेना आए भारत, दक्षिण पूर्व एशिया व अफ्रीका में इंग्लैंड, फ्रांस, इटली, हॉलैंड, स्पेन और जर्मनी के उपनिवेश तेजी से बनते गए इस नीति को “राज्य उपनिवेश” यानी “स्टेट कॉलोनियलिज्म” कहा जाता है. 20वीं सदी के बीच तक आते-आते दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ जिसमें यूरोप की उपनिवेशी ताक़तें आपस में लड़ मरी और कमजोर हो गई। दूसरे भारत जैसे गुलाम देश में आजादी के लिए आंदोलन चले नतीजा यह हुआ की राज्य उपनिवेशवाद में सबसे पहले भारत को आजादी हासिल की और 30-35 सालों में अन्य देशों ने भी मुक्ति पाई लेकिन गुलामी का फंदा अब बदल गया था अब गुलामी के तौर तरीके बदल गए अब विकसित देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियां और उनके साम्राज्य को विस्तार देने के लिए विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन जैसी नापाक तिकड़ी अपने काले कारनामों और घातक समझौते के तहत काम करते हैं जिसके जरिए नई गुलामी आई जो कि पिछले ब्रिटिश गुलामी से कहीं ज्यादा भयानक, खतरनाक और बहु आयामी है इन्हीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उदय के साथ-साथ सेना के क्षेत्र में भी इन कंपनियों की दखलअंदाजी बहुत तेजी से जोर पकड़ रही है यह निजी युद्ध की फर्में अनियंत्रित है उनके लिए सारे नियम व कानून ना के बराबर है और उनकी जांच पड़ताल भी नहीं की जा सकती। यह पूरी दुनिया के लिए खतरा बन गई है “जैसुइट पीठ” द्वारा नियंत्रित व संचालित “नई विश्व व्यवस्था” यानी “न्यू वर्ल्ड ऑर्डर” के उद्देश्यों की पूर्ति में कार्यरत है.2003 में ब्रुकलिन संस्थान में राष्ट्रीय सुरक्षा फेलों रहे पीटर डब्ल्यू सींगर की प्रकाशित हुई पुस्तक “कॉर्पोरेट बैरियर : द वाइस का प्राइवेटाइज्ड मिलिट्री इंडस्ट्री” जिसमें लेखक ने प्राइवेट सेनाओं का खास तौर से इराक में कार्यरत विशेष अध्ययन में बताया कि इराक की जमीन पर बहुत व्यापक भूमिका निभा रही है इराक की जमीन पर लगभग 10 लाख पीएमसी ठेकेदार काम कर रहे हैं ।2004 में “नई आजादी उद्घोष” में छपे अंतरराष्ट्रीय गणितज्ञ एवं आजादी बचाओ आंदोलन के संस्थापक डॉक्टर बनवारी लाल शर्मा के लेख “हिंसा की ज्वालामुखी पर बैठी दुनिया बहुराष्ट्रीय सेना का उदय” से जानकारी मिलती है, कि यह ठेकेदार फोर्स बहुराष्ट्रीय है इनमें पुराने अमेरिकी, ब्रिटेन, साउथ अफ्रीका, चिल्ली, रूस व भारत के पुराने सैनिक शामिल है। यह सब देखते हुए लगता है कि वह दिन दूर नहीं जब प्राइवेट सेनाएं अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी छा जाएगी और दूसरों को हटा देगी ऐसा लगता है कि मध्य युग की तरह प्राइवेट सेनाएं जगह-जगह बनेगी, डॉक्टर शर्मा की 18 साल पहले की हुई दूर दृष्टा भविष्यवाणी भारत ही नहीं बल्कि विश्व पटल पर भी साबित होती नजर आ रही है। क्या है पीएमसी और उसका इतिहास: पीएमसी यानी प्राइवेट मिलिट्री कॉरपोरेशन जो की एक निजी सैन्य कंपनी है जो आर्थिक या वित्तीय लाभ के लिए सशस्त्र युद्ध या सुरक्षा सेवाएं प्रदान करती है। पीएमसी अपने कर्मियों को “सुरक्षा ठेकेदार” या “निजी सैन्य ठेकेदार” के रूप में जानते हैं। कंपनी जिस देश में जाती है सबसे पहले सर्वाधिक कर सुरक्षित करती है ताकि भविष्य में सैन्य बल की ताकत से राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक हस्तक्षेप मजबूती से कर सके। 1971 में कंपनी द्वारा लीबिया के “कर्नल मोहम्मद गद्दाफी” के तख्ता पलट का असफल प्रयास कर चुकी है इसके बाद कंपनी के मुख्य संचालकों ने 1972 में असहमति जताने के बाद पद से इस्तीफा दे दिया। 1995 में प्राइवेट मिलिट्री ने अफ्रीका में उग्रवादी संगठन “रिवॉल्यूशनरी यूनाइटेड फ्रंट” को न केवल सहयोग दिया बल्कि हजारों अपहृत लड़कों और लड़कियों को सैनिकों और वेश्याओं के रूप में सेवा करने के लिए मजबूर किया गया और जिन्हें लड़ाकों के रूप में चुना गया उन्हें कभी-कभी परिजनों की हत्या करने के लिए भी मजबूर तक किया जाता था। अग्निपथ का पीएमसी से आखिर नाता क्या है: अग्निपथ स्कीम ( स्कैम) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिमाग की उपज नहीं बल्कि जैसुईट पीठ द्वारा एक गुप्त एजेंडा है जो कि विदेशी कंपनियों और कुख्यात गुप्त संगठनों के दबाव में लिया गया फैसला है। जिसकी पुष्टि दिनांक 4 सितंबर 2020 को “इंडियन डिफेंस रिव्यू” की साइट पर “ब्रिगेडियर प्रदीप शर्मा” के लेख “द इंडियन आर्मी कांट्रैक्ट विद प्राइवेट मिलिट्री कंपनीज़: वाय फॉरवर्ड” से होती है। प्रचंड बहुमत वाली केंद्र सरकार ने को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सामने घुटने टेक कर जाता दिया है कि भारत बहुराष्ट्रीय गुलामी के कालचक्र में बड़ी तेजी से फंसता जा रहा है और देश की सत्ता पर आसीन चेहरे आज उनके लिए वायसराय की भूमिका में काम कर रहे हैं. अग्निपथ से पैदा होंगे तीन सामाजिक-राष्ट्रीय संकट: पहला संकट अग्नि वीर के बड़े स्तर पर रिटायरमेंट के बाद देश में अस्थिरता का माहौल पैदा होगा । क्योंकि कंपनियों की मंशा यही है इसलिए हजारों विदेशी कंपनियां समझौते के आधार पर तैयार अग्निवीरों को अपनी निजी सैन्य बल के रूप में न केवल तैनात करेगी बल्कि आमजन के संघर्षों और अधिकारों की लड़ाई को कुचलना का काम भी करेगी। जैसे वे आज भी भारत में तैनात है और छोटे-छोटे स्तर पर निजी कंपनियों को संरक्षण दे रहे हैं कुख्यात कंपनी के दम पर चलने वाली स्कीम अग्निपथ अगर सफल हुई तो कंपनियों के दोहरे

सेवाग्राम घोषणा

आजादी बचाओ आंदोलन की सेवाग्राम घोषणा

बहुराष्ट्रीय गुलामी में जकड़े भारत की तस्वीर विदेशी कर्जों के बोझ तले दम तोड़ती अर्थव्यवस्था, बड़े-बड़े उद्योगों के भयावह पंजों में मक्खियों की तरह मसल उठे परंपरागत लघु और कुटीर उद्योग, महंगे उर्वरकों और कीटनाशकों की वजह से महंगी और बाजार का मुंह तक की खेती, 35 करोड़ बेरोजगार नौजवान, कमर तोड़ महंगाई से परेशान उपभोक्ता, नशाखोर जमीन, जहरीले खाद्यान, हवा और पानी, नष्ट होते जंगल, उजडते लोग, टूटता समाज, पसरती अपसंस्कृतियां और मूल्य हीनता, निज के समाज से कटी टूटी और किन्ही इत्तर जीवन मूल्यों को ढोने वाली शिक्षा व्यवस्था, बाह्य शक्तियों के इशारों पर लिए जाने वाले राजनीतिक और आर्थिक निर्णय, दुनिया की कंपनियों के आगे बिकी सरकारें और विकलांग लोकतंत्र और इससे भी कहीं अधिक भयावह शायद अकल्पनीय यह तस्वीर है भारत की जो कोई 300 साल पहले दुनिया का सबसे समृद्ध राष्ट्र था। सबसे बड़े निर्यातक से सबसे बड़े आयातक देश की श्रेणी में आए इस भारत की आर्थिक नीतियां यहां की सरकारें नहीं तय करती बल्कि विदेशी बहु राष्ट्रीय कंपनियों के इशारो पर उनके मूल देश की सरकारें, विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष तय करते हैं। इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के फैले उपनिवेशवादी जाल से हमारी राजनीतिक संप्रभुता, आर्थिक स्वयत्तता और सांस्कृतिक अस्मिता खतरे में पड़ गई है। देश पर फिर से बहुराष्ट्रीय गुलामी लद गई है।

सम्पादकीय

आजादी बचाने की जरूरत क्यों है? क्या है आजादी के मायने?

साथियों हम भारत के नागरिकों के बीच कुछ ज्वलंत विषयों को लेकर सबके बीच आए है।  3 दिसंबर 1984 की रात मध्य प्रदेश के भोपाल में एक गैस कांड हुआ था जिसे “भोपाल गैस त्रासदी” के नाम से जानते है। जिसमें एक षडयंत्र के तहत मिक नामक गैस को लीक करके देखा गया था, की कितने कम समय में कितने लोगों को मौत की नींद में सुलाया जा सकता है और महज कुछ समय की लीकेज से हजारों लोग सुबह का सुरज नहीं देख पाए। दूध पिलाती मां और बच्चे मृत पाए गये और सुप्रीम कोर्ट ने वारेन एंडरसन और अमरीकी कुख्यात कम्पनी युनियन कारबाईड के दबाव में फैसला सुनाया और मृतकों की गिनती कर 720 करोड़ रू कीमत तय कर दी और हमेशा के लिए चुप हो जाने को कहा, इसके साथ साथ  इस पर से  सारे क्रिमनल केस हटा दिए गये। उसी दिन अहसास हुआ की ये तो मौत के सौदागर है जो मौत के दाम तय करते है। एसी भयंकर स्थिति को देख कर की अब इस देश में इन विकसित देशों की बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आगे सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने हथियार डाल दिये और युनियन कारबाईड कम्पनी को माफी दे दी गयी थी तब अंतरराष्ट्रीय गणितज्ञ और सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन के नायक प्रो. बनवारी लाल शर्मा की पहल पर देश भर के समाजकर्मीयों, बुद्दजीवीयों और युवाओं ने मिलकर इस युनियन कारबाईड को देश से निकालने का अथक प्रयास किया और अंततः देश से बाहर खदेडने की  सफलता भी हासिल की। भोपाल गैस त्रासदी  घटना वर्ष 1989 की है उस समय यह घटना मात्र छोटी सी, एक स्थान पर सीमित लगती थी पर उसकी विचारधारा इतनी व्यापक थी की पिछले 37 वर्षों में देशव्यापी और अंततः विश्वव्यापी आंदोलन के रूप में उभर कर सामने आई। उस साल 5 जून की भीषण गर्मी में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के गांधी भवन में “संपूर्ण क्रांति दिवस” मनाने के लिए बुद्धिजीवियों, समाजकर्मियों और युवाओं के गोष्ठी हुई उसमें देश के बिगडते हालातों की समीक्षा करते हुए यह सवाल गर्मजोशी से उठाया गया कि आखिर देश के हालात बदलने के लिए जेपी आंदोलन हुआ बहुत से लोग समाज परिवर्तन में लगे हुए हैं फिर भी देश की दशा व दिशा बद से बदतर क्यों होती जा रही है ?लम्बी चली बैठक और विचारों के आत्म मंथन में तरह-तरह के कारण निकल कर सामने आऐ उनमें से एक महत्वपूर्ण कारण निकाला गया कि देश की अर्थव्यवस्था में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की नाजायज घुसपैठ और देश के धन का बाहर ले जाना।  इसी विचार ने “लोक स्वराज अभियान” (आजादी बचाओ आंदोलन) का सूत्रपात किया । जो की 18 महीने बाद सेवाग्राम आश्रम में जनवरी 1991 में आयोजित पहले राष्ट्रीय सम्मेलन नाम बदल कर “आजादी बचाओं आंदोलन” तय हुआ पर कार्यकर्ताओं की एक जुझारू व कर्मठ टीम ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सुची बनाने हेतु खोज में 5 जून 1989 से जुट गई थी । यहां एक बात का उल्लेख करना बहुत जरूरी है आजादी बचाओ आंदोलन के कार्यकलापों के बाद में पता चला कि वो बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कुकृत्यों के बारे में दुनिया में कुछ संगठन अध्ययन लेखन कर रहे थे और  उनके द्वारा प्रकाशित जनरल मल्टीनेशनल मॉनिटर और मलेशिया में प्रोफेसर मोहम्मद इदरीश और डॉक्टर मार्टिन खोर कोर पोंग का समूह थर्ड वर्ल्ड नेटवर्क और उसके द्वारा प्रकाशित थर्ड वर्ल्ड और टीडब्ल्यूएम फीचर विशेष रूप से उल्लेखनीय है। 1993 में डेविड कॉटन की अद्भुत पुस्तक “When Corporation Rule The World” प्रकाशित हो गई जिसने बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद कॉर्पोरेट कॉलोनीज़्म का अत्यंत गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया जिसका हिंदी अनुवाद प्रो. बनवारी लाल शर्मा जी ने किया जिसका शीर्षक “जब दुनिया में निगमों का राज चले” और कॉरपोरेट के खिलाफ सीधी लड़ाई आजादी बचाओ आंदोलन ने शुरु कि आगे चलकर इन अभियानों का भरपूर लाभ न केवल आंदोलन को मिला । बल्कि आंदोलन ने साहित्य,पोस्टर, पत्रिका, व्याख्यान, कैसेट के द्वारा सम्पूर्ण राष्ट्र को एहसास कराया ।बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा जारी शोषण लूट और अपसंस्कृतियों के प्रसारण से लोगों को परिचित कराया और उन्हें विदेशी उत्पादों के बहिष्कार का कार्यक्रम दिया। आजादी बचाओ आंदोलन देश का पहला आंदोलन था जिसने नए गैट डंकल प्रस्ताव के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी । 23 मार्च 1992 आंदोलन ने दिल्ली के बोर्ड पर भूमंडलीकरण उदारीकरण की नीतियों के खिलाफ विशाल रैली का आयोजन किया 3 मार्च 1994 को अन्य जमीनी संगठनों के साथ मिलकर डंकल समझौते के विरुद्ध दिल्ली के लाल किले पर एक और विशाल रैली की । 14 दिसंबर 1993 को आंदोलन ने दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में बड़ी सभा की जिसमें राज्यसभा के विरोधी दलों के सांसदों और समाज कर्मियों ने ऐलान किया कि राज्य सभा में सभी पेटेंट कानून का संशोधन पारित होने नहीं देंगे यह बिल 4 साल तक रुका रहा सरकार ने इस बिल को पारित करा लिया है  पर आंदोलन में अन्य संगठनों के साथ इसके विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की है।  आंदोलन की साढे तीन साल की कानूनी लड़ाई के बाद दिल्ली के पुलिस आयुक्त ने 7 जुलाई 1999 को पुलिस आदेश जारी किया कि दिल्ली में कोई अश्लील पोस्टर चिपकाने नहीं दिया जाएगा दूरदर्शन के खिलाफ आजादी बचाओ आंदोलन की याचिका पर 3 जुलाई 1996 को दिल्ली के चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट श्री प्रेम कुमार ने आदेश जारी किया कि दूरदर्शन पर एडल्ट फिल्में तथा अश्लील कार्यक्रम बंद किए जाए और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही की जाए भारत सरकार ने आंदोलन के इस प्रयास को निष्फल कर दिया।  30 अप्रैल से 15 मई 1993 को आंदोलन में गांधीवादी और समाजवादी संगठनों के साथ नमक बनाने आई सन् 2005 को अमरिकी कम्पनी कारगिल के खिलाफ आंदोलन चलाया और कांडला (गुजरात) बंदरगाह से उसे खदेड़ा।  राजस्थान के अलवर जिले में 24 देशी-विदेशी शराब का लाइसेंस रद कराया  शंकरगढ़ इलाहाबाद में विदेशी कंपनी सेल के कारखाने को नहीं लगने दिया और व्यापक जन उभार को संघर्ष की तरफ उड़ते हुए आंदोलन में अक्टूबर 2003 को वाराणसी के सम्मेलन में निर्णय किया कि कंपनियों के खिलाफ सीधी लड़ाई का समय आ गया है और आंदोलन में अपना पहला लक्ष्य बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद की झंडाबदार लूटखोर अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों पेप्सी कोला कोका कोला को बनाया । 20 फरवरी 2005 को इन कंपनियों के बॉटलिंग प्लांट कि पूरे

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