Èbìbí 2026

सम्पादकीय

“स्वदेशी ही स्वाभिमान है, स्वराज ही वास्तविक आज़ादी है।”

आज़ादी बचाओ आंदोलन का उद्देश्य देश को बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद, आर्थिक गुलामी, कॉर्पोरेट लूट और जनविरोधी आर्थिक नीतियों से मुक्त कर स्वदेशी, स्वावलंबी और जनकेंद्रित भारत की स्थापना करना है। आंदोलन मानता है कि आज देश जिस बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद में फंस चुका है, वह अंग्रेज़ी शासन की गुलामी से भी अधिक खतरनाक है, क्योंकि यह केवल हमारी अर्थव्यवस्था ही नहीं बल्कि हमारी संस्कृति, राजनीति, खेती, रोजगार और आत्मनिर्भरता पर भी हमला कर रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि सत्ता और कॉर्पोरेट गठजोड़ मिलकर इस आर्थिक गुलामी को और मजबूत कर रहे हैं। आंदोलन का उद्देश्य उस व्यवस्था का विरोध करना है जिसमें मुट्ठीभर बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और पूंजीपति देश के जल-जंगल-ज़मीन, बाजार, उत्पादन और संसाधनों पर कब्ज़ा जमाकर जनता के श्रम और अधिकारों का शोषण कर रहे हैं। यह संघर्ष केवल विदेशी आर्थिक ताकतों के खिलाफ नहीं, बल्कि उन देशी उद्योगपतियों और सत्ताधीशों के खिलाफ भी है, जो नव साम्राज्यवादी शक्तियों के हित साधन में लगे हुए हैं। आज़ादी बचाओ आंदोलन ऐसे आत्मनिर्भर समाज के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है, जहाँ हर व्यक्ति को सम्मानजनक जीवन, ईमान की रोटी और सामाजिक सुरक्षा की गारंटी मिले। आंदोलन का विश्वास है कि उदारीकरण, वैश्वीकरण और बाजारवाद के नाम पर लागू की जा रही नीतियाँ वास्तव में आर्थिक औपनिवेशीकरण का नया रूप हैं, जिनका परिणाम गरीब देशों में बेरोजगारी, भुखमरी, विस्थापन और असमानता के रूप में सामने आ रहा है। इसलिए आंदोलन स्वदेशी उत्पादन, विकेंद्रित अर्थव्यवस्था और स्थानीय रोजगार आधारित विकास मॉडल को बढ़ावा देने की बात करता है। आंदोलन का उद्देश्य छोटे उद्योगों, किसानों, कारीगरों, मजदूरों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है, ताकि देश विदेशी पूंजी और आयात आधारित बाजार पर निर्भर न रहे। आंदोलन मानता है कि अनावश्यक आयात पर रोक लगाकर और स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देकर ही आर्थिक स्वतंत्रता और वास्तविक स्वराज स्थापित किया जा सकता है। आंदोलन आधुनिक शोषणकारी तकनीकी व्यवस्था का भी विरोध करता है, जिसके माध्यम से बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ बाजारों और उत्पादन व्यवस्था पर कब्ज़ा कर रही हैं। आंदोलन ऐसी स्वदेशी तकनीक और उत्पादन प्रणाली के विकास का समर्थन करता है, जो मनुष्य और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करे, श्रम का सम्मान करे और आवश्यकता आधारित उत्पादन को बढ़ावा दे। आज़ादी बचाओ आंदोलन का उद्देश्य ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था स्थापित करना है, जिसमें उत्पादन का आधार मुनाफा नहीं, बल्कि मानव कल्याण हो। जहाँ पूर्ण रोजगार, शोषणमुक्त संबंध, सहकारिता आधारित उत्पादन और मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति को प्राथमिकता दी जाए। आंदोलन बड़े कॉर्पोरेट उत्पादन मॉडल के बजाय छोटे, स्वतंत्र और सामूहिक उत्पादन को राष्ट्रहित में आवश्यक मानता है। आंदोलन का लक्ष्य गांवों को आत्मनिर्भर बनाना, स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देना और खेती आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है। कच्चे माल के निर्यात के बजाय उसका स्थानीय प्रसंस्करण कर रोजगार और उत्पादन बढ़ाना आंदोलन की सोच का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इससे गांवों के कौशल, श्रम और स्थानीय उद्योग मजबूत होंगे तथा खेती पर बढ़ता आर्थिक दबाव भी कम होगा। आज़ादी बचाओ आंदोलन मानता है कि यदि देश को आर्थिक गुलामी, सांस्कृतिक आक्रमण और कॉर्पोरेट नियंत्रण से बचाना है, तो स्वदेशी, स्वराज, जन-अधिकार और आत्मनिर्भरता को राष्ट्रीय नीति का आधार बनाना होगा। यही वास्तविक आज़ादी, सामाजिक न्याय और राष्ट्र की अस्मिता की रक्षा का मार्ग है।

सम्पादकीय

हमारा विज़न: -आज़ादी बचाओ आंदोलन

हम एक ऐसे भारत की कल्पना करते हैं — जहाँ देश की अर्थव्यवस्था बहुराष्ट्रीय कंपनियों और कॉर्पोरेट ताकतों के नियंत्रण से मुक्त होकर स्वदेशी, स्वावलंबी और जनकेंद्रित बने। जहाँ जल-जंगल-ज़मीन, प्राकृतिक संसाधनों और उत्पादन व्यवस्था पर पहला अधिकार देश की जनता का हो, न कि मुनाफाखोर कंपनियों और उनके एजेंट बने सत्ता तंत्र का। हमारा विज़न ऐसे समाज का निर्माण करना है, जिसमें किसान, मजदूर, छात्र, युवा, महिलाएँ, आदिवासी, कारीगर और मेहनतकश वर्ग सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें। जहाँ हर किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य मिले, भूमिहीन खेतिहर मजदूरों को न्याय मिले और कारीगरों के कौशल तथा वैज्ञानिकों की प्रतिभा का उपयोग आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में हो। हम ऐसी व्यवस्था स्थापित करना चाहते हैं, जहाँ शिक्षा और स्वास्थ्य बाजार की वस्तु नहीं, बल्कि हर नागरिक का मौलिक अधिकार हों। जहाँ कन्वेंटीकरण और बाजारवादी शिक्षा व्यवस्था के स्थान पर ऐसी राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली हो, जो देश, समाज, श्रम और स्वदेशी चेतना से जुड़ी हो। जहाँ आम आदमी का जीवन सम्मानपूर्ण हो और विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। हमारा विज़न ऐसी विकेंद्रित अर्थव्यवस्था का है, जिसमें उत्पादन गांव-गांव में हो, स्थानीय उद्योग और छोटे उत्पादन केंद्र मजबूत हों तथा रोजगार आधारित विकास को प्राथमिकता मिले। हम उस व्यवस्था का विरोध करते हैं जिसमें बड़े कॉर्पोरेट उत्पादन मॉडल के कारण बेरोजगारी, विस्थापन और आर्थिक असमानता बढ़ती है। हमारा विश्वास है कि स्वदेशी उत्पादन, सहकारिता और श्रम आधारित अर्थव्यवस्था ही वास्तविक आत्मनिर्भरता का मार्ग है। हम ऐसी सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करना चाहते हैं, जहाँ दलितों, आदिवासियों, महिलाओं, पिछड़े वर्गों और शोषित समुदायों की पूर्ण भागीदारी सुनिश्चित हो। आदिवासी समाज की संस्कृति, प्रकृति और जीवन मूल्यों की रक्षा करते हुए उन पर होने वाले अन्याय और शोषण के खिलाफ संघर्ष करना हमारे विज़न का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हम प्रकृति के अंधाधुंध दोहन और पर्यावरण विनाश पर आधारित विकास मॉडल का विरोध करते हैं। हमारा लक्ष्य ऐसी जीवन व्यवस्था स्थापित करना है, जिसमें मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन, संवेदनशीलता और सहअस्तित्व बना रहे। जल, जंगल, जमीन और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा को हम आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की रक्षा मानते हैं। हम विपथगामी सांस्कृतिक साम्राज्यवाद और अपसंस्कृति के खिलाफ भारतीय स्वदेशी चेतना, सामाजिक मूल्यों और राष्ट्रीय अस्मिता को मजबूत करना चाहते हैं। हमारा मानना है कि आर्थिक गुलामी के साथ-साथ सांस्कृतिक गुलामी भी राष्ट्र को कमजोर करती है। इसलिए आत्मनिर्भर भारत का निर्माण केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और वैचारिक स्वतंत्रता का भी संघर्ष है। हमारी दृष्टि केवल भारत तक सीमित नहीं है। हम दुनिया के उन सभी शोषण-विरोधी आंदोलनों के साथ एकजुटता में खड़े हैं, जो साम्राज्यवाद, कॉर्पोरेट लूट और आर्थिक अन्याय के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। क्योंकि हमारी लड़ाई का निशाना एक ही है — शोषण, अन्याय और मुनाफाखोर व्यवस्था। हम देश के किसानों, मजदूरों, छात्रों, बुद्धिजीवियों, ट्रेड यूनियनों, महिलाओं, आदिवासियों और युवाओं से आह्वान करते हैं कि वे निजी हितों से ऊपर उठकर नई आज़ादी के इस संघर्ष में शामिल हों।

केवल सरकार बदल जाने से वास्तविक परिवर्तन नहीं आता
सम्पादकीय

आज़ादी बचाओ आंदोलन क्या है?

कॉर्पोरेट गुलामी के खिलाफ जन-अधिकार और स्वराज की लड़ाई भारत ने 1947 में अंग्रेज़ी हुकूमत की जंजीरों को तोड़कर राजनीतिक आज़ादी जरूर हासिल की थी, लेकिन आज वही देश एक नए और कहीं अधिक खतरनाक उपनिवेशवाद की गिरफ्त में धकेला जा रहा है। यह नया साम्राज्यवाद लाल कोट पहनकर नहीं आता, यह बहुराष्ट्रीय कंपनियों, कॉर्पोरेट पूंजी, विश्व बैंक, बाजारवादी नीतियों और सत्ता से गठजोड़ किए हुए दलाल तंत्र के रूप में हमारे सामने खड़ा है। पहले विदेशी ताकतें हमारी धरती पर सेना लेकर उतरी थीं, आज वही ताकतें “विकास”, “निजीकरण” और “ग्लोबल निवेश” के चमकदार नारों के पीछे छिपकर देश के जल-जंगल-जमीन, खनिज, खेती, शिक्षा, स्वास्थ्य और यहाँ तक कि लोकतंत्र तक पर कब्ज़ा जमा रही हैं। आज किसान अपनी ही जमीन पर बेगाना बनाया जा रहा है, मजदूर सस्ती मशीन समझा जा रहा है, युवा बेरोज़गारी और निजीकरण की आग में झोंके जा रहे हैं और प्राकृतिक संसाधनों को कुछ कॉर्पोरेट घरानों के हवाले किया जा रहा है। सत्ता जनता की नहीं, पूंजीपतियों की भाषा बोल रही है। संसद से लेकर सड़क तक, नीति से लेकर मीडिया तक — हर जगह बाजार का कब्ज़ा बढ़ता जा रहा है। जनता से उसका अधिकार छीना जा रहा है और उसे “उपभोक्ता” बनाकर सिर्फ मुनाफे की वस्तु में बदला जा रहा है। ऐसे दौर में “आज़ादी बचाओ आंदोलन” सिर्फ एक संगठन नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा को बचाने का संघर्ष बनकर उभरता है। यह आंदोलन उस आर्थिक गुलामी के खिलाफ जनविद्रोह है, जो देश को फिर से कॉर्पोरेट साम्राज्यवाद की बेड़ियों में जकड़ना चाहती है।आंदोलन कहता है कि देश किसी कंपनी की जागीर नहीं है, जल-जंगल-जमीन किसी पूंजीपति की निजी संपत्ति नहीं है और जनता की मेहनत पर मुट्ठीभर लोगों का राज स्वीकार नहीं किया जाएगा। संसाधनों पर पहला अधिकार देश की जनता का है, आज़ादी बचाओ आंदोलन एक राष्ट्रव्यापी जनआंदोलन है, जो देश के जल-जंगल-ज़मीन, प्राकृतिक संसाधनों, स्थानीय अर्थव्यवस्था और जनअधिकारों पर बढ़ते कॉर्पोरेट तथा बहुराष्ट्रीय कब्ज़े के खिलाफ संघर्षरत है। यह आंदोलन मानता है कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक ताकत उसकी जनता, उसकी खेती, उसकी संस्कृति, उसकी प्राकृतिक संपदा और उसकी आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था में होती है; लेकिन आज वैश्वीकरण, निजीकरण और बाजारवादी नीतियों के नाम पर इन्हीं आधारों को कमजोर किया जा रहा है। बड़े कॉर्पोरेट घरानों और विदेशी कंपनियों को फायदा पहुँचाने के लिए किसानों की जमीनें अधिग्रहित की जा रही हैं, जंगलों को उद्योगों के हवाले किया जा रहा है, नदियों और जलस्रोतों तक का निजीकरण किया जा रहा है तथा शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी मूलभूत व्यवस्थाओं को भी मुनाफे का बाजार बनाया जा रहा है। आंदोलन का स्पष्ट मानना है कि देश के संसाधनों पर पहला अधिकार देश की जनता का है, न कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों, पूंजीपतियों या सत्ता से गठजोड़ कर बैठे आर्थिक ताकतों का। जल-जंगल-ज़मीन केवल प्राकृतिक संपदा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका, संस्कृति और अस्तित्व का आधार हैं। जब इन्हें मुनाफे के लिए बेचा जाता है, तब केवल संसाधनों की लूट नहीं होती, बल्कि देश की आत्मा पर हमला होता है। यही कारण है कि आज़ादी बचाओ आंदोलन इस लड़ाई को केवल आर्थिक संघर्ष नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा का संघर्ष मानता है। यह आंदोलन केवल विरोध या नारों तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य जनता को जागरूक, संगठित और संघर्षशील बनाना है, ताकि लोग समझ सकें कि आर्थिक गुलामी किस प्रकार धीरे-धीरे पूरे समाज को अपने नियंत्रण में ले रही है। आंदोलन गाँव-गाँव, शहर-शहर जाकर स्वदेशी, स्वराज और आत्मनिर्भरता की भावना को मजबूत करने का प्रयास करता है। इसका विश्वास है कि जब तक देश की अर्थव्यवस्था विदेशी पूंजी और कॉर्पोरेट नियंत्रण पर निर्भर रहेगी, तब तक वास्तविक स्वतंत्रता अधूरी रहेगी। इसलिए स्थानीय उत्पादन, छोटे उद्योग, किसान, कारीगर, मजदूर और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना इस आंदोलन की प्राथमिकताओं में शामिल है। आज़ादी बचाओ आंदोलन सामाजिक न्याय को भी अपने संघर्ष का केंद्रीय आधार मानता है। आंदोलन का मानना है कि विकास का अर्थ केवल बड़ी इमारतें, उद्योग और चमकदार शहर नहीं हो सकता, बल्कि ऐसा समाज होना चाहिए जहाँ किसान सम्मान के साथ जी सके, मजदूर का शोषण न हो, युवाओं को रोजगार मिले और आम जनता को शिक्षा, स्वास्थ्य तथा जीवन की बुनियादी सुविधाएँ अधिकार के रूप में प्राप्त हों। यह आंदोलन उस व्यवस्था का विरोध करता है जिसमें मुट्ठीभर लोगों की संपत्ति लगातार बढ़ती जाए और करोड़ों लोग बेरोज़गारी, महंगाई और विस्थापन का शिकार बनते जाएँ। आंदोलन स्वराज की अवधारणा को भी नए संदर्भ में प्रस्तुत करता है। इसके अनुसार स्वराज का अर्थ केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि जनता की भागीदारी, संसाधनों पर जननियंत्रण और निर्णय लेने की लोकतांत्रिक शक्ति भी है। जब नीतियाँ जनता के हितों के बजाय कॉर्पोरेट मुनाफे को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं, तब लोकतंत्र कमजोर होता है। इसलिए यह आंदोलन जनता को केवल वोट देने तक सीमित नहीं देखता, बल्कि उसे नीति निर्माण और जनसंसाधनों की रक्षा में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करता है। आज के समय में, जब बाजारवाद और उपभोक्तावाद समाज की सोच पर हावी किए जा रहे हैं, आज़ादी बचाओ आंदोलन भारतीय स्वदेशी चेतना, आत्मसम्मान और राष्ट्रीय एकता को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहा है। यह आंदोलन लोगों को याद दिलाता है कि अगर देश की अर्थव्यवस्था, खेती, जल, जंगल और प्राकृतिक संसाधन कॉर्पोरेट ताकतों के हाथों में चले गए, तो राजनीतिक स्वतंत्रता भी खोखली साबित होगी। इसलिए यह संघर्ष केवल वर्तमान की लड़ाई नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बचाने का संघर्ष है। आंदोलन “स्वराज” की अवधारणा को भी नए अर्थों में प्रस्तुत करता है आज देश में “विकास” के नाम पर जिस मॉडल को जनता पर थोपा जा रहा है, वह वास्तव में कॉर्पोरेट मुनाफे का मॉडल बनता जा रहा है। बड़े-बड़े उद्योगों, एक्सप्रेसवे, खनन परियोजनाओं, स्मार्ट सिटी और निजी निवेश के नाम पर किसानों की उपजाऊ जमीनें छीनी जा रही हैं। जिन खेतों ने पीढ़ियों तक देश का पेट भरा, आज उन्हीं खेतों को उद्योगपतियों और कॉर्पोरेट कंपनियों के हवाले किया जा रहा है। लाखों किसान और आदिवासी अपने ही गांवों में विस्थापित होकर मजदूर बनने को मजबूर हैं। जंगल, जो केवल पेड़ों का समूह नहीं बल्कि आदिवासी समाज की संस्कृति, जीवन और पहचान हैं,

आंदोलन समाचार

बड़कागांव के पूर्वी क्षेत्र में सुलगने लगी आंदोलन की चिंगारी:

झारखंड के आदिवासियों और किसानों को ‘विकास’ के नाम पर मिलने वाले ‘विस्थापन’ के दर्द के खिलाफ एक बार फिर हजारीबाग का बड़कागांव प्रखंड सुलग उठा है। बड़कागांव के पूर्वी क्षेत्र में प्रस्तावित विभिन्न कोल ब्लॉक कोयला परियोजनाओं के विरोध में स्थानीय ग्रामीणों का आंदोलन अब लगातार उग्र और तेज होता जा रहा है। क्षेत्र के सैकड़ों प्रभावित ग्रामीणों और किसानों ने एकजुट होकर एक विशाल पदयात्रा एवं जिला मुख्यालय में महाधरना कार्यक्रम का आयोजन किया। आंदोलन के समापन पर आक्रोशित ग्रामीणों ने हजारीबाग उपायुक्त (डीसी) के माध्यम से देश के प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) सहित कई केंद्रीय मंत्रियों को एक कड़क मांग पत्र यानी ज्ञापन प्रेषित कर कोल ब्लॉकों के आवंटन को तत्काल प्रभाव से रद्द करने की गुहार लगाई है। ग्रामीणों का साफ कहना है कि कॉर्पोरेट कंपनियों के फायदे के लिए वे अपनी पुश्तैनी जल, जंगल और जमीन का सौदा किसी भी कीमत पर नहीं होने देंगे। इन पांच बड़ी कोयला परियोजनाओं के खिलाफ एकजुट हुए बड़कागांव के ग्रामीण ग्रामीणों द्वारा देश के नीति-नियंताओं को सौंपे गए ज्ञापन के अनुसार, यह देशव्यापी विरोध मुख्य रूप से गोन्दलपुरा, बादम, मोइत्रा, बाबूपारा एवं रोहने कोल ब्लॉक कोयला परियोजनाओं के खिलाफ है। इस आंदोलन की गूंज देश की राजधानी तक पहुंचाने के लिए ज्ञापन की प्रतिलिपियां प्रधानमंत्री कार्यालय के प्रधान सचिव, केंद्रीय कोयला मंत्रालय के संयुक्त सचिव, वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के संयुक्त सचिव, केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के संयुक्त सचिव और झारखंड सरकार के मुख्य सचिव को भी भेजी गई हैं। ग्रामीणों ने अपने आवेदन में तीखी चिंता और आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा है कि इन विनाशकारी कोयला परियोजनाओं के कारण बड़कागांव प्रखंड के पूर्वी क्षेत्र का भूगोल और अस्तित्व पूरी तरह समाप्त होने की कगार पर पहुंच जाएगा। इससे पूर्व भी पश्चिमी क्षेत्र में संचालित पकरीबरवाडीह कोयला परियोजना के कारण कई हंसते-खेलते गांव पूरी तरह उजड़ चुके हैं, और वहां के मूल निवासी विस्थापन का दंश झेलकर आज गुमनामी के अंधेरे में अपनी पहचान खो चुके हैं। सूख जाएगी जीवनदायिनी ‘बदमाही नदी’, खड़ा होगा भयानक खाद्यान्न संकट आंदोलनकारियों ने इन परियोजनाओं से होने वाले पर्यावरणीय विनाश का पूरा खाका खींचते हुए कहा कि कर्णपुरा उत्तरी एवं दक्षिणी क्षेत्र में चल रही अन्य खनन परियोजनाओं के घातक दुष्परिणाम आज सबके सामने हैं। बड़कागांव के पूर्वी क्षेत्र के दर्जनों गांवों की सिंचाई एवं पेयजल का मुख्य स्रोत ‘बदमाही नदी’ है, जो इन नई परियोजनाओं की भेंट चढ़कर पूरी तरह सूख जाएगी। इसके अलावा, यह पूरा क्षेत्र नदियों और नालों के किनारे बसा है, जहां की मिट्टी बेहद उपजाऊ और बहुफसली है। यहां के किसान बड़े पैमाने पर धान, गन्ना, सब्जी, तिलहन और दलहन की रिकॉर्ड खेती करते हैं। इस कृषि भूमि के नष्ट होने से न केवल इस क्षेत्र में, बल्कि पूरे राज्य में गंभीर खाद्यान्न संकट पैदा हो जाएगा, जिसकी भरपाई कंपनियों द्वारा दी जाने वाली मुआवजे की किसी भी राशि से संभव नहीं है। जंगल काटकर बगीचे लगाना पर्यावरण का विकल्प नहीं: कंपनियों पर फर्जीवाड़े का आरोप आंदोलन के मंच से वक्ताओं ने कहा कि इन परियोजनाओं के कारण हजारों हेक्टेयर सघन वन भूमि नष्ट होगी और लाखों पेड़ बेरहमी से काटे जाएंगे। बड़े वन क्षेत्र को नष्ट कर कागजों पर छोटे-छोटे बगीचे लगाना पर्यावरण संरक्षण का विकल्प नहीं हो सकता, जैसा कि गोन्दलपुरा कोल परियोजना में अडानी कंपनी द्वारा किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, यह क्षेत्र हाथियों का प्राकृतिक कॉरिडोर भी है, जिससे मानव-हाथी द्वंद्व बढ़ेगा और वन्यजीवों पर गंभीर संकट खड़ा होगा साथ ही इन वनों के नष्ट होने से प्राणवायु पर भी संकट होगा, जिससे गरीबों और करोड़ों जीवजंतुओं का जीवन घोर संकट में आ जाएगा। इस संकट की भरपाई किसी मुआवजे की रकम से नहीं की जा सकती है।ज्ञापन में स्थानीय प्रशासन और कंपनियों की कार्यशैली पर भी फर्जीवाड़े का संगीन आरोप लगाया गया है। ग्रामीणों का कहना है कि कंपनियां बाहरी और फर्जी किसानों को खड़ा कर ग्राम सभा एवं जनसुनवाई जैसे लोकतांत्रिक नाटकों का आयोजन कर रही हैं। उदाहरणस्वरूप, अडानी कंपनी द्वारा 20 जनवरी 2026 तथा एनटीपीसी कंपनी द्वारा 10 मई 2026 को एनटीपीसी आईटीआई कॉलेज में आयोजित किए गए कार्यक्रमों को ग्रामीणों ने सिरे से ‘अस्वीकार’ और खारिज कर दिया है। ग्रामीणों की स्पष्ट मांग है कि प्रभावित क्षेत्र में निष्पक्ष रूप से मतपत्र (बैलेट पेपर) के माध्यम से जनमत संग्रह कराया जाए। यदि 51 प्रतिशत जनता परियोजनाओं के पक्ष में वोट देती है तो ही परियोजनाएं जारी रहें, अन्यथा आवंटन को फौरन रद्द किया जाए। लाठी और झूठे मुकदमों के दम पर आंदोलन कुचलने का प्रयास, रिहाई की मांग आंदोलनकारियों ने प्रधानमंत्री से मुख्य रूप से मांग की है कि इन परियोजनाओं के लिए ग्राम सभा प्रस्ताव पारित करने से संबंधित सभी फर्जी पत्रों एवं प्रशासनिक प्रक्रियाओं को तत्काल निरस्त किया जाए। इसके साथ ही खाद्य, जल, प्राणवायु सुरक्षा एवं आर्थिक संतुलन को ध्यान में रखकर उपरोक्त सभी कोल ब्लॉकों का आवंटन तुरंत रद्द हो। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि कंपनियों के विरोध को दबाने हेतु आंदोलनकारी किसानों व ग्रामीणों पर कई झूठे मुकदमे थोपे गए हैं, जिन्हें अविलंब वापस लिया जाए तथा गिरफ्तार साथियों को बिना शर्त रिहा किया जाए। बड़कागांव पुलिस प्रशासन द्वारा कंपनियों के प्रभाव में आकर आंदोलनकारियों के साथ की जा रही मारपीट, गाली-गलौज, धमकी और जमीन देने के अवैध दबाव पर तत्काल रोक लगाई जाए। जिले के किसान नेता और स्थानीय प्रतिनिधि उतरे मैदान में इस विशाल धरना और पदयात्रा के कुशल संचालन एवं नेतृत्व में देश के कई प्रमुख सामाजिक और राजनैतिक कार्यकर्ताओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। कार्यक्रम में मुख्य रूप से संयुक्त किसान मोर्चा के महासचिव राजकुमार भारत (हरियाणा), ‘ आजादी बचाओआंदोलन’ की बिहार प्रदेश संयोजिका शीलम झा आजादी बचाओ आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक और कर्णपुरा आंदोलन के प्रमुख डॉ मिथिलेश कुमार दांगी और सीपीआई के प्रदेश सचिव महेंद्र पाठक विशेष रूप से उपस्थित थे। इसके साथ ही स्थानीय आंदोलनकारियों और जन प्रतिनिधियों में बालेश्वर महतो, श्रीकांत निराला, यशोदा देवी, विकास कुमार, लोकनाथ महतो, मुखिया इलियास अंसारी, मुनेश्वर महतो, बादम के रवि कुमार दांगी, हरली के अनिरुद्ध कुमार दांगी, गोन्दलपुरा के विनोद महतो, हजारीबाग सदर के प्रदीप प्रसाद और बड़कागांव के रोशन लाल चौधरी आदि ने अपनी सक्रिय भागीदारी दर्ज कराते हुए इस लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने

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