Èrèlé 2024

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विश्व आर्द्रभूमि दिवस विशेषांक:-आर्द्रभूमि से होता है, जलवायु संकट पर नियंत्रण

लेखक: राजकुमार सिन्हा  बरगी बांध विस्थापित संघ के वरिष्ठ कार्यकर्त्ता हैं। विश्व आर्द्रभूमि दिवस विशेषांक:-आर्द्रभूमि से होता है, जलवायु संकट पर नियंत्रण ‘वेटलेंड’ यानि आर्द्रभूमि के नाम से पहचाने जाने वाले अपने आसपास के ताल-तलैया, विशाल जलाशय और तटीय इलाके हजारों हजार जैविक इकाइयों का ठिकाना भर नहीं होते, बल्कि उनके भरोसे आज के सबसे बड़े जलवायु परिवर्तन के संकट से भी निपटा जा सकता है। क्या हैं, इन नमी वाले इलाकों की खासियतें? पर लेखक अपने विचार रख रहे हैं, राजकुमार सिन्हा। – संपादकजलवायु परिवर्तन के संकट से निपटने के लिए आर्द्रभूमि (वेटलैंड) हमारा सबसे प्रभावी पारिस्थितिकी तंत्र है। ये कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर तापमान कम करने और प्रदूषण घटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ईरान के शहर रामसर के केस्पियन सागर तट पर दो फरवरी 1971 को ‘अन्तर्राष्ट्रीय आर्द्रभूमि कन्वेंशन’ का आयोजन हुआ था जिसमें ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ ने दो फरवरी को ‘आर्द्रभूमि दिवस’ घोषित किया था। इस दिवस का आयोजन ग्लोबल वार्मिंग का सामना करने में हमारी धरती के लिए आर्द्रभूमि की महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में वैश्विक जागरूकता बढ़ाने के लिए किया जाता है।वर्ष 2023 में ‘आर्द्रभूमि दिवस’ की थीम ‘जलाशयों को पुनर्जीवित और पुनर्स्थापित करना थी।’ 2024 की थीम ‘आर्द्रभूमि और मानव कल्याण’ है। दलदली भूमि में कार्बन अवशोषित करने की क्षमता जंगलों की कार्बन भंडारण क्षमता से दोगुनी होती है। मैंग्रोव (मीठे और खारे पानी के मिश्रण के पास के घने वृक्ष) जैसी तटीय आर्द्रभूमि उष्ण कटिबंधीय वर्षा वनों की तुलना में 55 गुणा अधिक तेजी से कार्बन सोखती है। पीटलैंड (जैव-इंधन के प्राकृतिक स्रोत) जो पृथ्वी की भूमि की सतह का 3 फीसदी हिस्सा कवर करता है, सभी भूमि आधारित कार्बन का 30 प्रतिशत संग्रहित करता है। वर्ष1970 से लेकर अब तक दुनिया की 35 प्रतिशत आर्द्रभूमि विलुप्त हो चुकी है। ‘वेटलैंड इंटरनेशनल’ के अनुसार भारत की करीब 30 प्रतिशत आर्द्रभूमि पिछले तीन दशकों में विलुप्त हो चुकी है। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है कि मंडला की आदिवासी गोंड रानी दुर्गावती द्वारा जबलपुर शहर में 52 तालाबों का निर्माण कराया गया था, परन्तु अवैध निर्माण और शहरीकरण के कारण अब गिनती के ही, आधे-अधूरे तालाब बचे हैं।आर्द्रभूमि की हानि का कुचक्र, आजीविका संकट और गहराती गरीबी, ये सब आर्द्रभूमि को  बेकार भूमि समझने का परिणाम है, जबकि ये रोजगार, आय और आवश्यक पारिस्थितिकी  सेवाओं के जीवन प्रदायी स्रोत हैं। पारिस्थितिकी तंत्र की सेवाएं प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मानव कल्याण में योगदान देती हैं। जो आर्द्रभूमि विश्वभर में जैव-विविधता और मानव के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जाती है, उन्हें ‘रामसर स्थल’ कहा जाता है।किसी भी आर्द्रभूमि को ‘रामसर साईट’ का दर्जा देने के लिए कुछ मानक तय किए गए हैं जिसमें मुख्य आर्द्रभूमि का दुर्लभ व प्राकृतिक होना और संकटग्रस्त प्रजातियों के जीवन चक्र को प्रतिकूल परिस्थितियों में आश्रय प्रदान करना शामिल है। अंतर्राष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि की सूची में मई 2018 में 2331 ‘रामसर स्थल’ शामिल हैं जो 2.1 मिलियन वर्ग किलोमीटर से अधिक स्थान कवर करता है। वर्ष1974 में विश्व के सबसे पहले ‘रामसर साईट’ में आस्ट्रेलिया के कोबोर्ग पेनिनसुला को शामिल किया गया।13 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रों में फैले 75 ‘रामसर स्थलों’ के साथ भारत दक्षिण एशिया का सबसे अधिक आर्द्रभूमि वाला देश है। वर्ष 1981 में भारत के पहले ‘रामसर स्थल’ के रूप में ओडिशा की ‘चिल्का झील’ और राजस्थान का ‘केवलादेव पक्षी अभ्यारण्य’ शामिल किया गया था। इसके अलावा गुजरात का ‘नलसरोवर,’ केरल की ‘अष्टमुडी झील,’ ओडिशा का ‘भितरकनिका मैंग्रोव,’ मणिपुर की ‘लोकताक झील,’ पश्चिम बंगाल की ‘सुंदरवन आर्द्रभूमि,’ तामिलनाडु में मन्नार की खाङी, महाराष्ट्र की ‘लोनार झील,’ कर्नाटक का ‘रंगनथीपति अभ्यारण्य,’ उत्तरप्रदेश का ‘समसपुर पक्षी अभ्यारण्य,’ जम्मू कश्मीर की ‘कलुर झील’ और बिहार की ‘कांवर झील’ प्रमुख हैं।मध्यप्रदेश में भोपाल का ‘राजा भोज तालाब,’ इंदौर का ‘सिरपुर’ एवं ‘यशवंत सागर’ तालाब और शिवपुरी जिले के ‘माधव राष्ट्रीय उद्यान’ में स्थित ‘सांख्य सागर’ ‘रामसर स्थलों’ में शामिल हैं। जबलपुर में नर्मदा का 30 किलोमीटर प्रवाह क्षेत्र और ‘संग्राम सागर,’ ‘मढोताल,’ ‘बाल सागर,’ ‘देवताल’ आदि अनेकों तालाब पर्याप्त संसाधन के बाबजूद प्रबंधन की कमी के कारण ‘रामसर साईट’ में जगह नहीं बना पाए हैं। देश में कुल 24 लाख 24 हजार 540 जल निकायों में प्राकृतिक या मानव निर्मित इकाइयां शामिल हैं जिनमें से 20 लाख 30 हजार 40 इकाइयां ही उपयोग में हैं। ये आमतौर पर टेंक, जलाशय, तालाब और बंधी आदि नामों से जाने जाते हैं। बर्फ के पिघलने से बनी संरचना जैसे धारा, झरने भी इसके दायरे में आते हैं। मध्यप्रदेश में 82 हजार 643 कुल जल निकाय हैं जिनमें आधे से भी अधिक 45 हजार 386 उपयोग में नहीं हैं।समुद्री आर्द्रभूमि में खाङी का जलडमरूमध्य, कोरल रीफ, कैल्थला समुद्री तट, लेगून आदि प्रमुख हैं, परन्तु 6907 किलोमीटर में फैला भारत का समुद्री तट कटाव से ग्रस्त है। पश्चिम बंगाल अपनी 60 प्रतिशत से अधिक तट रेखा के कटाव के साथ सबसे बुरी तरह प्रभावित राज्यों की सूची में सबसे ऊपर है। तटीय कटाव के कारणों में चक्रवातों की संख्या में वृद्धि, समुद्र के स्तर में वृद्धि और मानव जनित गतिविधियां, जैसे-बंदरगाहों का निर्माण, समुद्र खनन और बांधों का निर्माण शामिल हैं। देश के तीन शहरों इंदौर, भोपाल और उदयपुर को ‘वेटलैंड सिटी’ का दर्जा दिलाने के लिए ‘केन्द्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय’ ने ‘रामसर सचिवालय, स्विट्जरलैंड’ को प्रस्ताव भेजा है। किसी शहर को यदि ‘वेटलैंड सिटी’ का दर्जा मिल जाता है तो वहां पर्यावरण संरक्षण के लिए दिए जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए दरवाजे खुल जाते हैं।वर्ष 2017 में ‘पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय’ द्वारा आर्द्रभूमि से संबंधित नियमों को अधिसूचित किया गया है। यह ‘आर्द्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियमावली 2017’ 2010 में लागू दिशा- निर्देशों के स्थान पर आई है। इन नियमों में आर्द्रभूमि प्रबंधन के प्रति विकेन्द्रित दृष्टिकोण अपनाया गया है, ताकि क्षेत्रीय विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके और राज्य अपनी प्राथमिकताओं को निर्धारित कर सके। ज्यादातर निर्णय राज्य के ‘आर्द्रभूमि प्राधिकरण’ द्वारा लिए जाएंगे, जिसकी ‘राष्ट्रीय आर्द्रभूमि समिति’ द्वारा निगरानी की जाएगी।

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बजट विशेषांक:- अंतरिम बजट 2024-25, कर्ज पर विकास, लूट की गारंटी  गांव, गरीब, किसान और कृषि के लिये बडा ‘शुन्य’

लेखक:- विवेकानंद माथने राष्ट्रीय किसान समन्वय समिति vivekanandpm.india@gmail.com लेखक:- विवेकानंद माथने अंतरिम बजट 2024-25 कर्ज पर विकास, लूट की गारंटी, गांव, गरीब, किसान और कृषि के लिये बडा ‘शुन्य’ अंतरिम बजट 2024-25 ने जो दिशा तय की है, उससे स्पष्ट है कि आगे भी गांव, गरीब और किसान की लूट जारी रहेगी। 2024-25 का अंतरिम बजट कुल 47.66 लाख करोड रुपये है। जिसमें कृषि के लिये केवल 1.27 लाख करोड रुपये रखे गये है, जो कुल बजट का मात्र 2.65 प्रतिशत है। इसमें से प्रत्यक्ष योजनाओं पर बहुत कम राशि आवंटित की गई है। कृषि बजट पहले की तुलना में घटा दिया गया है। बजट में कृषि के लिये कोई विशेष प्रावधान नही किया गया। किसानों की आमदनी दुगनी करने के लिये भी कोई उपाय नही किये गये। लेकिन खेती को कारपोरेट घरानों को सौंपने की प्रक्रिया जारी है।इस बजट में गांव, गरीब, किसान और कृषि के लिये बडा ‘शुन्य’ दिया गया है। देश में सबसे अधिक रोजगार देने की क्षमता रखनेवाले कृषि क्षेत्र की सरकार द्वारा अनदेखी कृषि का संकट बढायेगी। बेरोजगारी की समस्या और भयंकर होगी।इस साल भी कृषि और किसानों के लिये बजट की राशि बनाये रखी गई या उसे कम की गई है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के लिये 14 हजार 600 करोड रुपये, कृषि बजट के अलावा प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के लिये 60 हजार करोड रुपयें, युरिया सबसिडी के लिये 1 लाख 19 हजार करोड रुपयें का प्रावधान रखा गया है। प्राकृतिक खेती को बढावा देने के लिये, गोपालन के लिये बजट में कोई प्रावधान नही है।अंतरिम बजट 24-25 के अनुसार बजट के प्रावधानों को पूरा करने के लिये इस वर्ष भी 16.85 लाख करोड रुपये कर्ज लेना होगा। 2014-15 से 2024-25 तक गत दस साल का कुल बजट 326.64 लाख करोड का है। उसमें लगभग 95 लाख करोड रुपये का कर्ज लिया गया है, जो दस साल के कुल बजट का 29 प्रतिशत है। याने की देश का विकास कर्ज पर किया जा रहा है। और इस कर्ज पर केवल ब्याज भुगतान के लिये 11.90 लाख करोड रुपये खर्च करने होंगे। इस समय देश पर कुल 205 लाख करोड का कर्ज है, उसमें और भी बढोत्तरी होगी। बजट पूर्ति के लिये सरकार को कारपोरेट टैक्स में बढ़ोत्तरी करनी चाहिये थी लेकिन इस बजट में भी कारपोरेट टैक्स में कोई बढ़ोत्तरी नही की है। पहले से ही 30 प्रतिशत से 22 प्रतिशत तक कम किये गये कारपोरेट टैक्स को बनाये रखा गया है।बजट पूर्ति के लिये कारपोरेट टैक्स और दुसरे रास्ते ढूंढने के बजाय सरकार लोगों की जेब से पैसा निकालकर और कर्ज लेकर काम कर रही है। इससे देश पर लगातार कर्ज बढता जा रहा है। जीएसटी का हर साल बढता कलेक्शन यही साबित करता है कि जीएसटी का दायरा बढाने के साथ साथ आम लोगों की जेब से पैसा निकालने के कारण जीएसटी कलेक्शन बढ रहा है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में बीमा कंपनियों को केवल मुआवजा बांटने के लिये गत सात साल में 60 हजार करोड रुपये मिले है। उसके लिये करोड़ों किसानों से बीमा क़िस्त वसूली जाती है।रेलवे मंत्रालय द्वारा सामान्य और स्लीपर के डिब्बे कम करके प्रवासियों को एसी के डिब्बे में प्रवास करने के लिये बाध्य किया जा रहा है, जिसके कारण एक अनुमान के अनुसार प्रवासियों को हर साल लगभग 15 हजार करोड रुपये ज्यादा देने होंगे। आरबीआई के द्वारा रेपो रेट में 2020 से अबतक 2.5 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की गई और उसी अनुपात में ब्याज दर भी बढ़ाये गये है। जिससे ईएमआई बढने के साथ ही जरुरतमंद विद्यार्थियों को शिक्षा ऋण के लिये कुल शिक्षा ऋण पर 18 हजार करोड रुपये और सभी प्रकार के ऋण पर कर्जदारों को लगभग 9 लाख करोड रुपये ज्यादा देने होंगे।इससे स्पष्ट है कि सरकार बजट पूर्ति के लिये कारपोरेट टैक्स और दुसरे रास्ते ढूंढने के बजाय सरकार लोगों की जेब से पैसा निकालकर और कर्ज लेकर काम कर रही है। कर्ज निकालकर जो विकास काम हो रहा है, उसकी कीमत लोगों को चुकानी पड रही है। इससे लोगों की लूट और देश पर कर्ज लगातार बढता जा रहा है। कर्ज पर विकास, लूट की गारंटी होती है।इस बजट में पुरानी योजनाओं के अलावा रेल गलियारे, रेल समुद्र मार्ग को जोडना, वंदे भारत की तरह 40 हजार डिब्बों का निर्माण, मंडियों को इ-नाम से जोडना, धार्मिक पर्यटन आदि योजनाओं का प्रमुखता से उल्लेख किया गया है। जोकि आम जनता के लिये नही बल्कि कारपोरेट घरानों के लिये शोषण के रास्ते बनाये जा रहे है। सरकार की गलत विकास नीति के कारण प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और बढेगा। जिससे किसान और आदिवासी समाज की मुश्किलें और बढ़ेगी। पवित्र धार्मिक स्थानों को पर्यटन स्थानों में बदलने की सोच भारतीय संस्कृति के विरुद्ध है।सरकारी शोषण के विरुद्ध लोगों का आक्रोश बढता जा रहा है। उसे रोकने के लिये उनसे लूटी गई राशि का कुछ हिस्सा लोककल्याणकारी योजना के रुप में लोगों को वापस दिया जा रहा है। लेकिन इससे मिलने वाली मदद लोगों की लूट की तुलना में कुछ भी नही है। लोगों को जो दिया जा रहा है, उससे कई गुना ज्यादा उनसे लूटा जा रहा है। सरकार कर्ज लेकर जो विकास काम कर रही है, उसमें गांव, गरीब और किसान के लिये कोई जगह नही है। बल्कि वह कारपोरेट कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिये काम कर रही है। इसके लिये अलग से सबूत देने की जरूरत नही है।‌ यह दिख रहा है कि देश में अमीरों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अमीर अमीर बनते जा रहै है और गरीबी बढ़ती ही जा रही है। आर्थिक विषमता बढ़ रही है। भारत सरकार का कुल बजट – 47.66 लाख करोड रुपयेकृषि एवं शिक्षा विभाग – 1.17 लाख करोड रुपये+ कृषि और संबंध कार्याकलाप – 10 हजार करोड रुपयेकृषि एवं किसान कल्याण विभाग – 1.27 लाख करोड रुपये

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