“बहुराष्ट्रीय गुलामी और निर्वाचित तानाशाहीयों के खिलाफ नई आज़ादी का उद्घोष” :- हिमांशु युवा बलाश

“बहुराष्ट्रीय गुलामी और निर्वाचित तानाशाहीयों के खिलाफ नई आज़ादी का उद्घोष”

लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक भूलों, आर्थिक नीतिगत विफलताओं, विदेशी कर्जों की निर्भरता, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के बढ़ते प्रभाव और वैश्विक कॉर्पोरेट दबावों ने भारत को एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहाँ राष्ट्र की राजनीतिक संप्रभुता, आर्थिक स्वायत्तता और सांस्कृतिक अस्मिता पर गंभीर संकट में दिखाई दे रहा है।आज देश की अर्थव्यवस्था विदेशी कर्जों के बोझ तले कराह रही है। एक ओर विशाल कॉर्पोरेट घरानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भयावह पंजों में हमारे परंपरागत लघु और कुटीर उद्योग मक्खियों की तरह कुचले जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ किसान महंगे उर्वरकों, जहरीले कीटनाशकों और बाजार पर निर्भर खेती की बेड़ियों में जकड़ दिए गए।

बेरोजगारी, महंगाई, विस्थापन, प्राकृतिक संसाधनों की लूट, शिक्षा और स्वास्थ्य का बाजारीकरण, सामाजिक विघटन और सांस्कृतिक प्रदूषण अब अपवाद नहीं बल्कि इस व्यवस्था की पहचान बन चुके हैं। करोड़ों नौजवान दिशाहीन भविष्य के अंधेरे में धकेले जा चुके हैं। महंगाई ने आम नागरिक की कमर तोड़ दी है। जहरीले खाद्यान्न, प्रदूषित हवा और पानी, उजड़ते जंगल, टूटते परिवार और बिखरते सामाजिक संबंध हमारे समय की कठोर वास्तविकता बन चुके हैं। जिस शिक्षा व्यवस्था को राष्ट्र निर्माण का माध्यम होना चाहिए था, उसे बाजार के हाथों गिरवी रख दिया गया है। आज की शिक्षा युवाओं को अपनी जड़ों, समाज और संस्कृति से जोड़ने के बजाय उन्हें केवल बाजार के लिए उपभोक्ता और मजदूर में बदलने का उपकरण बनती जा रही है।

सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि भारत के राजनीतिक और आर्थिक निर्णय अब जनता की जरूरतों के आधार पर नहीं, बल्कि विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), बहुराष्ट्रीय कंपनियों और वैश्विक वित्तीय शक्तियों के दबाव में निर्धारित होते हैं। लोकतंत्र का ढाँचा तो बहुत मौजूद है, परंतु उसकी चाल लगातार कमजोर होती जा रही है। चुनाव, जनभागीदारी और प्रतिनिधित्व की मूल भावना पर धनबल, प्रचारतंत्र और कॉर्पोरेट प्रभाव का साया गहराता जा रहा है। यह वही भारत है जो कभी विश्व की सबसे समृद्ध सभ्यताओं में गिना जाता था, जो आत्मनिर्भरता, ज्ञान, उत्पादन और सांस्कृतिक वैभव का प्रतीक था। किंतु आज उसी भारत को योजनाबद्ध ढंग से एक बहुत बड़े उपभोक्ता बाजार में परिवर्तित कर दिया गया है। हमारी राजनीतिक संप्रभुता, आर्थिक स्वायत्तता और सांस्कृतिक अस्मिता पर बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद का नया जाल फैल चुका है।

क्यों विफल होते रहे जन-संघर्ष?

हमारी पीढीयों के सामने प्रश्न ये नहीं है कि संघर्ष क्यों हुए, बल्कि ये है कि इतने संघर्षों के बाद भी व्यवस्था क्यों नहीं बदली गयी? पिछले कई दशकों में देश के अलग-अलग हिस्सों में किसानों ने लड़ाइयाँ लड़ीं, मजदूरों ने हड़तालें कीं, छात्रों ने आंदोलन किए, युवाओं ने सड़कों पर संघर्ष किया, महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाई, आदिवासियों ने जल-जंगल-जमीन बचाने के लिए बलिदान दिए। अनेक संघर्ष सफल भी हुए, अनेक मांगें भी मानी गईं, अनेक सरकारें भी बदलीं। लेकिन हर जीत के बाद जनता फिर उसी मोड़ पर खड़ी दिखाई दी जहाँ से संघर्ष शुरू हुआ था।

कारण स्पष्ट है।

हम समस्याओं से लड़ें , लेकिन समस्याओं को जन्म देने वाली व्यवस्था को चुनौती देने के लिए आवश्यक राष्ट्रीय एकता और दीर्घकालिक रणनीति विकसित नहीं कर पाए. हम चक्रव्यूह के भीतर लड़ते रहे, लेकिन चक्रव्यूह को तोड़ने की तैयारी कभी नहीं कर पाए। युवा हमेशा से संघर्ष करना जानता रहा है, अन्याय के खिलाफ खड़ा होता रहा है, बलिदान भी देता रहा है; लेकिन उसे यह भी समझना होगा कि केवल जज्बे की जरूरत नहीं है। हिम्मत, जज्बे और हुंकार के साथ साथ संगठन, रणनीति, अनुशासन और दूरदृष्टि की भी ज़रूरत होती है। दुनिया के अनेक संघर्षशील समाज, शक्तिशाली विचारधारा और क्रांतिकारी आंदोलनों ने यही गलती दोहराई। उन्होंने युद्ध जीते, लड़ाइयाँ जीतीं, शासक बदले, लेकिन व्यवस्था को स्थायी रूप से बदलने में असफल रहे। परिणाम ये आया की संघर्ष का चक्र चलता रहा और जनता बार-बार उसी टीस में लौटती रही। हमारा उद्देश्य एक ओर संघर्ष छेड़ना कतई नहीं है, हमारा उद्देश्य ऐसा जन-आंदोलन खड़ा करना है जो संघर्ष को स्थायी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन में बदल दे।

राष्ट्रीय पुनर्गठन की आवश्यकता

आज आवश्यकता केवल विरोध की नहीं, बल्कि पुनर्गठन की है, देश के किसान अलग लड़ रहे हैं,युवा अलग लड़ रहे हैं,छात्र अलग लड़ रहे हैं,मजदूर अलग लड़ रहे हैं,महिलाएँ अलग लड़ रही हैं,छोटे व्यापारी अलग संघर्ष कर रहे हैं,कर्मचारी और संविदाकर्मी अलग लड़ रहे हैं।

जबकि जिन शक्तियों के खिलाफ ये संघर्ष हैं, वे संगठित हैं, संसाधन सम्पन्न हैं और एक साझा रणनीति के साथ न केवल काम कर रही है बल्की नागरिकों के स्वाभिमान को कचोट रहीं हैं उनके हर संघर्ष को कुचल रही है। बिखरी हुई जनता कभी संगठित सत्ता को हरा नहीं सकती।

इसलिए आज आवश्यकता है कि देश के सभी संघर्षशील वर्ग, संगठन, आंदोलन, विचारधाराएँ और जन-समुदाय न्यूनतम साझा सहमति के आधार पर एक राष्ट्रीय मंच का निर्माण करें, ऐसा मंच जो किसी एक व्यक्ति, परिवार, दल या संगठन का मंच न हो, ऐसा मंच जो जनता का मंच हो,ऐसा मंच जो आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का मंच हो।

नई आज़ादी का अर्थ

हम जिस नई आज़ादी की बात कर रहे हैं, उसका अर्थ केवल विदेशी कंपनियों का विरोध नहीं है। नई आज़ादी का अर्थ है— आर्थिक गुलामी से मुक्ति, राजनीतिक निर्भरता से मुक्ति, कॉर्पोरेट नियंत्रण से मुक्ति, सांस्कृतिक हीनता से मुक्ति, बेरोजगारी और शोषण से मुक्ति प्राकृतिक संसाधनों की लूट से मुक्ति, भय, अन्याय और निरंकुशता से मुक्ति, नई आज़ादी का अर्थ है— जनता द्वारा जनता के लिए जनता के संसाधनों पर जनता का अधिकार।नई आज़ादी का अर्थ है—जन-मालिकियत, जन-भागीदारी और जन-सत्ता पर आधारित भारत का पुनर्निर्माण।

हमारा अंतिम आह्वान इतिहास गवाह है कि जब-जब जनता जागी है, तब-तब साम्राज्य टूटे हैं। कोई भी सत्ता जनता से बड़ी नहीं होती। कोई भी साम्राज्य स्थायी नहीं होता। कोई भी तानाशाही अमर नहीं होती।

सवाल केवल इतना है कि क्या जनता अपनी ताकत को पहचानती है या नहीं।

आज समय की पुकार है— संगठित हो संघर्ष करो रणनीति बनाओ शक्ति जुटाओ और मिलकर भारत की तस्वीर बदल दो क्योंकि इस बार केवल सरकार नहीं, केवल चेहरा नहीं, केवल दल नहीं, पूरी रक्तरंजित व्यवस्था बदलनी होगी।

“हम मिलकर बदलेंगे भारत की तस्वीर।”

— हिमांशु युवा बलाश
राष्ट्रीय युवा संयोजक
आज़ादी बचाओ आंदोलन

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