आंदोलन समाचार

भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर विशेष परिस्थिति में ही मुआवजा अंतिम विकल्प होना चाहिए :-डॉक्टर मिथिलेश कुमार डांगी

आजादी बचाओ आंदोलन के आंदोलनकारी की ज़ूम बैठक (शनिवार) 4 नवंबर को संपन्न हुई।इस बैठक में आंदोलन के संयोजक डॉक्टर मिथिलेश डांगी ने आंदोलन का पक्ष रखते हुए कहा कि जहां-जहां जमीन अधिग्रहण का आंदोलन चल रहा है, वहां पर आंदोलन का स्पष्ट मानना है कि हमें शुरुआत से ही सरकार की मुआवजा नीति पर संतुष्ट नहीं होना है। आंदोलन की पूरी कोशिश यह रहनी चाहिए कि विशेष परिस्थिति में ही सरकार के द्वारा जमीन अधिगृहत हो, मुआवजा अंतिम विकल्प होना चाहिए। उन्होंने झारखंड के विभिन्न जिलों में चल रहे भूमि अधिग्रहण पर आजादी बचाओ आंदोलन के सक्रियता की जानकारी दी। उन्होंने आंदोलन के साथियों से अगले महीने मध्य प्रदेश के कटनी जिले में संभावित आजादी बचाओ आंदोलन के बैठक में सर्वसम्मति से फैसले लेने पर बल दिया।डॉक्टर डांगी ने यह भी कहा कि पुराने साथियों को आंदोलन से जोड़ने की जरूरत है। इसी क्रम में सभी साथियों के साथ आंदोलन के रणनीति को लेकर एक बैठक की जानी चाहिए। यह बैठक भविष्य में देहरादून या गोड्डा में साथियों की सहमति से कराई जा सकती है। श्री आनंद मालवीय ने भी इस जूम मीटिंग में आंदोलन की विचारधारा पर बात करते हुए कहा कि बड़े कॉरपोरेट्स से छोटे दुकानदारों को बचाने के लिए हमें उन दुकानदारों से सामान खरीदने की कोशिश करनी चाहिए। उन्होंने लोकल फार वोकल की बात अपने ढंग से करते हुए कहा कि हमें देसी सामान खरीदने और उसे पहनने की कोशिश करनी चाहिए। आंदोलन के विचारधारा पर बात करते हुए उन्होंने यह भी कहा कि हमें सांप्रदायिक मुक्त विचारधारा पर कठोर तरीके से अमल करते रहना चाहिए।हरियाणा के साथी हिमांशु युवा बलाश ने आंदोलन के पोर्टल तैयार होने की बात की तथा उन्होंने यह भी कहा कि उस पर विभिन्न तरीके के वीडियो अपलोड किए जा चुके हैं। उन्होंने व्हाट्सएप चैनल शुरू करने की तकनीकी पक्ष की जानकारी दी।उन्होंने पोर्टल के माध्यम से नई आजादी उद्घोष नामक पत्रिका अपने बुद्धिजीवी साथियों के सहयोग से जल्द शुरू होने की उम्मीद जताई।आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए इलाहाबाद के दिनेश यादव ने भी उसकी सक्रियता पर बल दिया। तत्पश्चात पिछले लिए गए फैसलों के अनुसार इसकी प्रबल संभावना है कि एक पखवाड़े में आंदोलन का एक प्रतिनिधिमंडल आजमगढ़ के खिरिया बाग में चल रहे भूमि अधिग्रहण के विरोध में चल रहे आंदोलन को समर्थन देने उक्त स्थान पर जाए। इस प्रतिनिधि मंडल में झारखंड और इलाहाबाद के साथी के जाने की संभावना है।इस बात पर भी बल दिया गया कि जो साथी आंदोलन पोर्टल पर विभिन्न तरीके के लेख बेहतर तरीके से लिख सकते हैं, वह अवश्य लिखें।आंदोलन की अगली पाक्षिक बैठक दिवाली की पूर्व संध्या पर 11 नवंबर को होगा, जिसमें छत्तीसगढ़ के कारपोरेटी लूट के बारे में विस्तार से चर्चा की जाएगी।इस जूम बैठक में अपनी बात रखने वाले उपयुक्त साथी के अलावे मालती जैन तथा मनीष सिन्हा सहित अन्य साथी उपस्थित थे।

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उड़ीसा में पलायन रोकने के लिए जल, जंगल, जमीन तथा संसाधनों की मालकियत पर पूंजीपतियों के बदले वहां की जनता का अधिकार हो :-डॉ मिथिलेश डांगी

आजादी बचाओ आंदोलन की पाक्षिक जूम बैठक 28 अक्टूबर दिन शनिवार को संपन्न हुई। जिसमें उड़ीसा में संसाधनों की स्थिति एवं अदानी की लूट के बारे में आंदोलन के संयोजक डॉक्टर मिथिलेश डांगी ने विस्तार से अपनी बात रखी। उड़ीसा राज्य की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि आधुनिक  1 अप्रैल 1936 को स्थापित इस राज्य को  इस तिथि के दिन उत्कल दिवस या उड़ीसा दिवस के रूप में मनाया जाता है । इस समय राज्य में 30 जिले हैं । क्षेत्रफल की दृष्टिकोण से उड़ीसा भारत का नौवां तथा जनसंख्या के हिसाब से 11वां सबसे बड़ा राज्य है । कृषि यहां प्रति व्यक्ति कृषि क्षेत्र 0.2 हेक्टेयर से भी कम है।राज्य के कुल क्षेत्रफल का 45% भाग में खेत है, जिसके 80% भाग में चावल की खेती होती है। यहां लगभग 40 लाख खेत हैं, जिनका औसत आकार 1.5 हेक्टेयर है।राज्य का भौगोलिक क्षेत्रफल 1,55,707 वर्ग किलोमीटर है इसमें  58,136 वर्ग किलोमीटर में वन फैला हुआ है।इन वनों में आरक्षित वन क्षेत्र 26329 वर्ग किलोमीटर संरक्षित वन क्षेत्र 15525 वर्ग किलोमीटर तथा अवर्गीकृत वन 16283 वर्ग किलोमीटर है। वन क्षेत्र राज्य की भौगोलिक क्षेत्रफल का 37.34 प्रतिशत है जो भारत के वनों का 7.53 प्रतिशत होता है।उड़ीसा सरकार ने 1982 से 2013- 2014 तक राज्य के 42,470 हेक्टेयर वन भूमि को 3103 परियोजनाओं के लिए समर्पित किया है। उड़ीसा के खनिज संसाधनों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि उड़ीसा में बॉक्साइट, लौह अयस्क, क्रोमाइट, मैंगनीज, तांबा आदि खनिज भंडार है, जिसका बाजारg मूल्य 325 करोड रुपए हैं। जबकि इस राज्य में कुल आबादी लगभग 5 करोड़ की है अर्थात् इस राज्य में प्रति व्यक्ति खनिजों का जो भंडार है, उसका मूल्य लगभग 65 लाख रुपया होता है। लेकिन दुख की बात है कि इस संपूर्ण भंडार को देश की सरकार किसी न किसी पूंजीपति के हाथों सौंपती आ रही है। वह भी इन्हीं जनता के विकास के नाम पर, अर्थात एक व्यक्ति का 65 लाख रुपए की लूट करवाकर विकास का नाम दिया जा रहा है जबकि भारत के संविधान की धारा 39 ‘ ख’ स्पष्ट करता है की इन खनिजों का स्वामित्व और नियंत्रण का अधिकार सिर्फ और सिर्फ समुदाय के हाथों में है। उन्होंने आगे कहा कि इस देश का वर्तमान नौकरशाह पूंजी पतियों का गुलाम है और यह वर्ग सिर्फ इन्हीं पूंजीपतियों के इशारों पर काम करता है। हालांकि इस काम को भी वे जन सेवा कहते हैं तथा जनता के विकास का सब्जबाग दिखाकर पूंजीपतियों के विकास के लिए कार्य करते हैं। इसका ताजा उदाहरण उड़ीसा के सीजीमाली बॉक्साइट ब्लॉक खनन के लिए किए जा रहे जनसुनवाई को देख सकते हैं जहां 16 और 18 अक्टूबर 2023 को राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड उड़ीसा और जिलाधिकारी के समक्ष जनसुनवाई हुई, जिसमें कंपनी की तरफ से भाड़े के लोग बुलाए गए और उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी गई। उन्हीं पहचान को देखकर जनसुनवाई स्थल पर उन्हें जाने दिया गया। हालांकि स्थानीय साथियों ने इसका विरोध किया और कंपनी के दलालों को खदेड़ा लेकिन यह हाल लगभग सभी खनन क्षेत्र में दिखाई देता है। उन्होंने उड़ीसा में अदानी के प्रोजेक्ट की चर्चा करते हुए कहा कि अदानी उड़ीसा में 57575 करोड रुपए की परियोजना लगा रहा है।इसी क्रम में उन्होंने  इंटीग्रेटेड एलुमिना रिफाइनरी प्रोजेक्ट की चर्चा की। यह रायगढ़ा में स्थापित किया जा रहा है तथा इसके सपोर्ट के लिए इसी जिला के काशीपुर में 175 मेगावाट का थर्मल पावर प्लांट भी लगाया जाएगा ।इस रिफाइनरी प्रोजेक्ट का सालाना उत्पादन चार मिलियन टन होगा तथा इसके लिए बॉक्साइट की आपूर्ति उड़ीसा के ही कालाहांडी और रायगढा जिले के बॉक्साइट ब्लॉक जो वेदांत को आवंटित किया गया है उसके साथ ज्वाइंट वेंचर करके किया जाएगा । आयरन ओर प्रोजेक्ट के बारे में उन्होंने कहा कि यह देवझर, जो क्योंझर जिला में आता है। वहां स्थापित की जा रही है तथा इसकी क्षमता 30 मिलियन टन प्रतिवर्ष होगी। इसी लौह अयस्क पर आधारित एक पिलेट प्लांट की स्थापना भी अदानी के बंदरगाह धामरा के समीप में किया जा रहा है। समुद्री बंदरगाह का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अडानी समूह को उड़ीसा में धामरा बंदरगाह 38 वर्षों के लिए सौंपा गया है। इसमें 300 एकड़ भूमि दी गई है। इसकी वार्षिक क्षमता 83 मिलियन टन की है। एक मिलियन टन के लिए अदानी को 270 रूपए बतौर भाड़ा मिलेगा। इसी क्रम में उन्होंने ग्रीन स्टील मिल की चर्चा की। अडानी पोस्को के साथ मिलकर इसकी स्थापना कर रहा है। इस Posco के खिलाफ उड़ीसा में पूर्व मे  बड़ा संघर्ष हो चुका है, जिसमें कंपनी को वापस जाना पड़ा था।सोमपुरी इन्फ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड के बारे में डॉक्टर डांगी ने कहा कि यह भी धामरा के निकट त्रिवेणी कंपनी के साथ ज्वाइंट वेंचर करके किया जा रहा है।त्रिवेणी कंपनी के ऊपर सर्वोच्च न्यायालय के शाह कमीशन ने पूर्व में अवैध खनन का आरोप लगाया है। उन्होंने अदानी समूह के LNG project की चर्चा करते हुए कहा कि यह समूह धामरा के नजदीक लिक्विफाइड नेचुरल गैस का 5 मिलियन टन क्षमता का एक संग्रह एवं विपणन केंद्र की स्थापना कर रहा है। उन्होंने सड़क परियोजनाएं की भी विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि अदानी समूह को रायपुर – विशाखापत्तनम इकोनॉमिक कॉरिडोर के बाड़ाकुमारी एवं कार्की सेक्शन के बीच NH 130CD में 47.5 किमी निर्माण एवं स्वामित्व दिया गया है।उस समूह को भारत माला परियोजना में 6 लेन 67.75km सड़क निर्माण तथा टोल वसूली का कार्य दिया गया है।इस प्रकार अदानी उड़ीसा के खनिजों, ईंधनों, समुद्री व्यापार, रेल मार्ग तथा सड़क मार्ग के व्यापार पर कब्जा करने की तैयारी कर लिया है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि उड़ीसा जैसे क्षेत्रों में पलायन को रोकने के लिए जरूरी है कि अडानी जैसे पूंजीपतियों के द्वारा जिस प्रकार खनिज संसाधनों कारपोरेटीकरण  किया जा रहा है, उसका जबरदस्त प्रतिरोध किया जाए।डॉ मिथिलेश डांगी ने आह्वान किया कि इस उल्टी गंगा की धारा को सीधी दिशा में मोड़ने हेतु साझा संघर्ष की ओर एक कदम बढ़ाएं और जल, जंगल ,जमीन एवं खनिज पर जन समुदाय की मालकियत स्थापित होने तक संघर्ष जारी रखें। इस बैठक की एक विशेषता यह रही की उड़ीसा के क्षेत्र में जल, जंगल, जमीन के लिए संघर्ष करने वाले साथी

सम्पादकीय

विदेशी कम्पनी प्राईवेट मिलिट्री कारपोरेशन (PMC)से समझौता है केंद्र सरकार की अग्निपथ योजना :- हिमांशु युवा बलाश

विदेशी कम्पनी प्राईवेट मिलिट्री कॉर्पोरेशन (PMC) से समझौता है, केन्द्र सरकार की अग्निपथ योजना:- हिमांशु युवा बलाश 15वीं शताब्दी के अंत में यूरोप के दो लुटेरे के अमेरिका और भारत की लूट के साथ ही अगली दो सदियों में यूरोप वासियों ने अमेरिका और भारत से भारी मात्रा में संपत्ति और प्राकृतिक संसाधनों की बे-हिसाब लूट की। जिसके नतीजो से यूरोप में 18वीं शताब्दी में औद्योगिक क्रांति हुई इस क्रांति में यूरोपवासियों के हाथ में माप, बिजली की ऊर्जा और नई-नई मशीनें दी जिससे उनके कारखाने दिन रात चलने लगे इन कारखानों में सामान बनाने के लिए भारी मात्रा में कच्चे माल की जरूरत के कारण वह अपना बेड़ा उठा कर व्यापार के बहाने अफ्रीका व एशिया की तरफ निकल पड़े लैटिन अमेरिका और उत्तरी अमेरिका में तो वे पहले से ही मौजूद थे, इसी नीति को अक्सर “बंदूक नाव” यानी “गन बोट” नीति कहा गया है। इस नीति का भरपूर फायदा उठाकर वे व्यापार के बहाने अफ्रीका व एशिया के देशों में अपना साम्राज्य स्थापित करने में सफल हुए जिससे वहां से कच्चा माल मिलने में मुश्किल लेना आए भारत, दक्षिण पूर्व एशिया व अफ्रीका में इंग्लैंड, फ्रांस, इटली, हॉलैंड, स्पेन और जर्मनी के उपनिवेश तेजी से बनते गए इस नीति को “राज्य उपनिवेश” यानी “स्टेट कॉलोनियलिज्म” कहा जाता है. 20वीं सदी के बीच तक आते-आते दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ जिसमें यूरोप की उपनिवेशी ताक़तें आपस में लड़ मरी और कमजोर हो गई। दूसरे भारत जैसे गुलाम देश में आजादी के लिए आंदोलन चले नतीजा यह हुआ की राज्य उपनिवेशवाद में सबसे पहले भारत को आजादी हासिल की और 30-35 सालों में अन्य देशों ने भी मुक्ति पाई लेकिन गुलामी का फंदा अब बदल गया था अब गुलामी के तौर तरीके बदल गए अब विकसित देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियां और उनके साम्राज्य को विस्तार देने के लिए विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन जैसी नापाक तिकड़ी अपने काले कारनामों और घातक समझौते के तहत काम करते हैं जिसके जरिए नई गुलामी आई जो कि पिछले ब्रिटिश गुलामी से कहीं ज्यादा भयानक, खतरनाक और बहु आयामी है इन्हीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उदय के साथ-साथ सेना के क्षेत्र में भी इन कंपनियों की दखलअंदाजी बहुत तेजी से जोर पकड़ रही है यह निजी युद्ध की फर्में अनियंत्रित है उनके लिए सारे नियम व कानून ना के बराबर है और उनकी जांच पड़ताल भी नहीं की जा सकती। यह पूरी दुनिया के लिए खतरा बन गई है “जैसुइट पीठ” द्वारा नियंत्रित व संचालित “नई विश्व व्यवस्था” यानी “न्यू वर्ल्ड ऑर्डर” के उद्देश्यों की पूर्ति में कार्यरत है.2003 में ब्रुकलिन संस्थान में राष्ट्रीय सुरक्षा फेलों रहे पीटर डब्ल्यू सींगर की प्रकाशित हुई पुस्तक “कॉर्पोरेट बैरियर : द वाइस का प्राइवेटाइज्ड मिलिट्री इंडस्ट्री” जिसमें लेखक ने प्राइवेट सेनाओं का खास तौर से इराक में कार्यरत विशेष अध्ययन में बताया कि इराक की जमीन पर बहुत व्यापक भूमिका निभा रही है इराक की जमीन पर लगभग 10 लाख पीएमसी ठेकेदार काम कर रहे हैं ।2004 में “नई आजादी उद्घोष” में छपे अंतरराष्ट्रीय गणितज्ञ एवं आजादी बचाओ आंदोलन के संस्थापक डॉक्टर बनवारी लाल शर्मा के लेख “हिंसा की ज्वालामुखी पर बैठी दुनिया बहुराष्ट्रीय सेना का उदय” से जानकारी मिलती है, कि यह ठेकेदार फोर्स बहुराष्ट्रीय है इनमें पुराने अमेरिकी, ब्रिटेन, साउथ अफ्रीका, चिल्ली, रूस व भारत के पुराने सैनिक शामिल है। यह सब देखते हुए लगता है कि वह दिन दूर नहीं जब प्राइवेट सेनाएं अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी छा जाएगी और दूसरों को हटा देगी ऐसा लगता है कि मध्य युग की तरह प्राइवेट सेनाएं जगह-जगह बनेगी, डॉक्टर शर्मा की 18 साल पहले की हुई दूर दृष्टा भविष्यवाणी भारत ही नहीं बल्कि विश्व पटल पर भी साबित होती नजर आ रही है। क्या है पीएमसी और उसका इतिहास: पीएमसी यानी प्राइवेट मिलिट्री कॉरपोरेशन जो की एक निजी सैन्य कंपनी है जो आर्थिक या वित्तीय लाभ के लिए सशस्त्र युद्ध या सुरक्षा सेवाएं प्रदान करती है। पीएमसी अपने कर्मियों को “सुरक्षा ठेकेदार” या “निजी सैन्य ठेकेदार” के रूप में जानते हैं। कंपनी जिस देश में जाती है सबसे पहले सर्वाधिक कर सुरक्षित करती है ताकि भविष्य में सैन्य बल की ताकत से राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक हस्तक्षेप मजबूती से कर सके। 1971 में कंपनी द्वारा लीबिया के “कर्नल मोहम्मद गद्दाफी” के तख्ता पलट का असफल प्रयास कर चुकी है इसके बाद कंपनी के मुख्य संचालकों ने 1972 में असहमति जताने के बाद पद से इस्तीफा दे दिया। 1995 में प्राइवेट मिलिट्री ने अफ्रीका में उग्रवादी संगठन “रिवॉल्यूशनरी यूनाइटेड फ्रंट” को न केवल सहयोग दिया बल्कि हजारों अपहृत लड़कों और लड़कियों को सैनिकों और वेश्याओं के रूप में सेवा करने के लिए मजबूर किया गया और जिन्हें लड़ाकों के रूप में चुना गया उन्हें कभी-कभी परिजनों की हत्या करने के लिए भी मजबूर तक किया जाता था। अग्निपथ का पीएमसी से आखिर नाता क्या है: अग्निपथ स्कीम ( स्कैम) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिमाग की उपज नहीं बल्कि जैसुईट पीठ द्वारा एक गुप्त एजेंडा है जो कि विदेशी कंपनियों और कुख्यात गुप्त संगठनों के दबाव में लिया गया फैसला है। जिसकी पुष्टि दिनांक 4 सितंबर 2020 को “इंडियन डिफेंस रिव्यू” की साइट पर “ब्रिगेडियर प्रदीप शर्मा” के लेख “द इंडियन आर्मी कांट्रैक्ट विद प्राइवेट मिलिट्री कंपनीज़: वाय फॉरवर्ड” से होती है। प्रचंड बहुमत वाली केंद्र सरकार ने को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सामने घुटने टेक कर जाता दिया है कि भारत बहुराष्ट्रीय गुलामी के कालचक्र में बड़ी तेजी से फंसता जा रहा है और देश की सत्ता पर आसीन चेहरे आज उनके लिए वायसराय की भूमिका में काम कर रहे हैं. अग्निपथ से पैदा होंगे तीन सामाजिक-राष्ट्रीय संकट: पहला संकट अग्नि वीर के बड़े स्तर पर रिटायरमेंट के बाद देश में अस्थिरता का माहौल पैदा होगा । क्योंकि कंपनियों की मंशा यही है इसलिए हजारों विदेशी कंपनियां समझौते के आधार पर तैयार अग्निवीरों को अपनी निजी सैन्य बल के रूप में न केवल तैनात करेगी बल्कि आमजन के संघर्षों और अधिकारों की लड़ाई को कुचलना का काम भी करेगी। जैसे वे आज भी भारत में तैनात है और छोटे-छोटे स्तर पर निजी कंपनियों को संरक्षण दे रहे हैं कुख्यात कंपनी के दम पर चलने वाली स्कीम अग्निपथ अगर सफल हुई तो कंपनियों के दोहरे

सेवाग्राम घोषणा

आजादी बचाओ आंदोलन की सेवाग्राम घोषणा

बहुराष्ट्रीय गुलामी में जकड़े भारत की तस्वीर विदेशी कर्जों के बोझ तले दम तोड़ती अर्थव्यवस्था, बड़े-बड़े उद्योगों के भयावह पंजों में मक्खियों की तरह मसल उठे परंपरागत लघु और कुटीर उद्योग, महंगे उर्वरकों और कीटनाशकों की वजह से महंगी और बाजार का मुंह तक की खेती, 35 करोड़ बेरोजगार नौजवान, कमर तोड़ महंगाई से परेशान उपभोक्ता, नशाखोर जमीन, जहरीले खाद्यान, हवा और पानी, नष्ट होते जंगल, उजडते लोग, टूटता समाज, पसरती अपसंस्कृतियां और मूल्य हीनता, निज के समाज से कटी टूटी और किन्ही इत्तर जीवन मूल्यों को ढोने वाली शिक्षा व्यवस्था, बाह्य शक्तियों के इशारों पर लिए जाने वाले राजनीतिक और आर्थिक निर्णय, दुनिया की कंपनियों के आगे बिकी सरकारें और विकलांग लोकतंत्र और इससे भी कहीं अधिक भयावह शायद अकल्पनीय यह तस्वीर है भारत की जो कोई 300 साल पहले दुनिया का सबसे समृद्ध राष्ट्र था। सबसे बड़े निर्यातक से सबसे बड़े आयातक देश की श्रेणी में आए इस भारत की आर्थिक नीतियां यहां की सरकारें नहीं तय करती बल्कि विदेशी बहु राष्ट्रीय कंपनियों के इशारो पर उनके मूल देश की सरकारें, विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष तय करते हैं। इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के फैले उपनिवेशवादी जाल से हमारी राजनीतिक संप्रभुता, आर्थिक स्वयत्तता और सांस्कृतिक अस्मिता खतरे में पड़ गई है। देश पर फिर से बहुराष्ट्रीय गुलामी लद गई है। बाजारवाद पर टिका विकास दरअसल यह सब कुछ उस व्यापक विश्व अर्थव्यवस्था की संरचना का अंश और एक मायने में परिणाम है, जो पहले यूरोप की औद्योगिक क्रांति में और फिर दूसरे विश्व युद्ध के बाद उभरे महाबली अमेरिका ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पूरी दुनिया पर ठोक दिया। देश की गुलामी और लूट प्रकृति के दोहन पर टिका बाजारवाद ही विकास का मॉडल बन गया विशाल उद्योगों के पहिए पर दौड़ने वाला विकास के इस मॉडल ने एकाएक उन देशों को आर्थिक पिछड़ा घोषित कर दिया, जो प्राकृतिक संपदायुक्त और आत्मनिर्भर थे तथा जहां विकास की एक भिन्न गति थी, इस नए आर्थिक नव साम्राज्यवाद की वाहक पश्चिमी स्थूल सत्ता न होकर वह निगम निगम में थी, जो नव स्वाधीन देश की अर्थव्यवस्था को अपने कब्जे में करने के लिए अपना सूक्ष्मतम जाल बुन रही थी। भारत समेत दुनिया के तमाम नव स्वाधीन देशों ने इस मॉडल को अपनाया तथा प्रतिपक्ष में बराबरी पर खड़ा होने की प्रति प्रतिस्पर्धा में रूस ने भी इसी मॉडल को अपनाया विश्व आर्थिक वृत्त की परिधि पर विन्दुवत इन विकसित देशों का अर्थ संरचना के नाम पर अपना कुछ भी नहीं बचा रह गया है, जबकि वृत्त के केंद्र के विकसित देश इन देशों के संसाधनों का निरंतर आवाध दोहन कर अपनी अर्थव्यवस्थाओं को समृद्ध बना रहे हैं। उपनिवेशवाद नए रूपों में (क) विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष— उपनिवेशवाद के अनेक नए रूपों में विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का महत्वपूर्ण स्थान है। यह बहुराष्ट्रीय कंपनियों का राज स्थापित करने हेतु प्रतिबद्ध है तथा इन पर अमेरिका और उसके सहयोगी औद्योगीकृत देश का कब्जा है। इन्हीं संस्थाओं की एक तरफा शर्तों के दबाव में आकर वर्तमान सरकार ने नई आर्थिक नीतिगत एवं संरचनात्मक परिवर्तन स्वीकार किए हैं। यह इन देशों का हमारी राष्ट्रीय संप्रभुता पर खुला कुठारघात है। (ख) समझौता का कुचक्र–विकसित देशों के तथाकथित विकसित ज्ञान और प्रौद्योगिकी के आकर्षण के फलस्वरुप बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा भारत को विश्व बाजार से जोड़ने के अभियान में अनेक एकपक्षीय, दिपक्षीय एवं बहुपक्षीय समझौते की महत्वपूर्ण भूमिका है। इनमें गैट के उरुग्वे चक्र वार्ता और अमेरिकी स्पेशल 301 के अंतर्गत वार्ता प्रमुख हैं। गैट– वस्तुत गैट का उरुग्वे वार्ता चक्र तीसरी दुनिया के देशों को बराबरी के स्तर पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा को रोकने का कुचक्र है। यह यथार्थ में विश्व की तीन आर्थिक महाशक्तियों अमेरिका, यूरोपीय आर्थिक समुदाय और जापान के बीच चल रहे व्यापारिक युद्ध का मंच है, जिसमें पिस रहे हैं तीसरी दुनिया के गरीब देश, खुली अर्थव्यवस्था और सार्वभौमिक भूमि कारण के नाम पर यह भारत जैसे देशों पर बहुराष्ट्रीय एवं बहुपक्षीय हमला है, जिसका मुख्य उद्देश्य विशेषत अमेरिकी कंपनियों के लिए इन देशों के बाजार को सुरक्षित करना है। ट्रिम्स (TRIMS) और ट्रिप्स (TRIPS) के माध्यम से एकाधिकार प्राप्त कर इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों का भारत के आर्थिक और औद्योगिक अंतरिक्ष पर पूर्ण कब्जा करने का इरादा है। भारतीय कृषि के क्षेत्र में गैट वार्ता का प्रभाव होगा हमारी खेती की स्थाई गुलामी। पौधों के प्रजनन एवं अनुसंधान पर पेटेंट कानून लड़ने की जो कोशिश चल रही है। यदि भारत इसके सामने झुकता है, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे। यह कैसी विडंबना है कि स्वाम्लंबी कृषि नीति को गैट वार्ता में व्यापार विरोधी घोषित किया जा रहा है। अमेरिकी स्पेशल 301— भारतीय पेटेंट कानून विशेषत बौद्धिक संपदा कानून में भारी परिवर्तन कराने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर लगे शेष प्रतिबंधों को हटाने के लिए तथा पेटेंट संबंधी पेरिस समझौता पर भारत के हस्ताक्षर कराने के लिए अमेरिका अपने व्यापार अधिनियम 1988 की धारा स्पेशल 301 के तहत भारत की बांह मरोड़ रहा है। यदि भारत इन शर्तों को नहीं स्वीकार करता तो अमेरिका की दंडात्मक कार्रवाई की योजना है। वर्तमान सरकार इन दावों के आगे झुकती जा रही है। दो प्रमुख अंतरराष्ट्रीय घटनाएं— पूर्वी यूरोप एवं साम्यवादी रूसी व्यवस्था के ढह जाने के बाद इन दोनों देशों के द्वारा बाजार अर्थव्यवस्था के अपने और 27 देशों की बहुराष्ट्रीय सेना द्वारा इराक पर हमले ने शोषण और लूट पर आधारित बाजार अर्थव्यवस्था की आक्रामकता को बढ़ावा दिया है। (ग) पर्यावरण संबंधी उपनिवेशवाद–ग्रीनहाउस प्रभाव या सार्वभौमिक तापन से पर्यावरण के वीभत्स खतरों के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार अमेरिका और अन्य औद्योगिक विकसित देशों ने चोरी और सीना जोड़ी (अंतरराष्ट्रीय गुंडागर्दी) का बेमिसाल उदाहरण पेश करते हुए इसके लिए मुख्यत जिम्मेदार तीसरी दुनिया के देशों को ठहराया है। इसमें भारत, चीन, ब्राजील का नाम पहले पांच अपराधियों में है। इन देशों को विश्व पर्यावरण की रक्षा की जिम्मेदारी बहन करते हुए जुर्माना देना पड़ेगा (घ) विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर एकाधिकार— मानव सभ्यता के विकास आने वाली अड़चनो को समझने और हल करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले विज्ञान और तकनीक पर विकसित कहलाने वाले बड़े देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनी का कब्जा है। जहां एक ओर घिसी पीटी तकनीक के भारतीय आयत की बात है, वहीं दूसरी ओर परमाणु विकिरण रिसाव

सम्पादकीय

आजादी बचाने की जरूरत क्यों है? क्या है आजादी के मायने?

साथियों हम भारत के नागरिकों के बीच कुछ ज्वलंत विषयों को लेकर सबके बीच आए है।  3 दिसंबर 1984 की रात मध्य प्रदेश के भोपाल में एक गैस कांड हुआ था जिसे “भोपाल गैस त्रासदी” के नाम से जानते है। जिसमें एक षडयंत्र के तहत मिक नामक गैस को लीक करके देखा गया था, की कितने कम समय में कितने लोगों को मौत की नींद में सुलाया जा सकता है और महज कुछ समय की लीकेज से हजारों लोग सुबह का सुरज नहीं देख पाए। दूध पिलाती मां और बच्चे मृत पाए गये और सुप्रीम कोर्ट ने वारेन एंडरसन और अमरीकी कुख्यात कम्पनी युनियन कारबाईड के दबाव में फैसला सुनाया और मृतकों की गिनती कर 720 करोड़ रू कीमत तय कर दी और हमेशा के लिए चुप हो जाने को कहा, इसके साथ साथ  इस पर से  सारे क्रिमनल केस हटा दिए गये। उसी दिन अहसास हुआ की ये तो मौत के सौदागर है जो मौत के दाम तय करते है। एसी भयंकर स्थिति को देख कर की अब इस देश में इन विकसित देशों की बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आगे सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने हथियार डाल दिये और युनियन कारबाईड कम्पनी को माफी दे दी गयी थी तब अंतरराष्ट्रीय गणितज्ञ और सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन के नायक प्रो. बनवारी लाल शर्मा की पहल पर देश भर के समाजकर्मीयों, बुद्दजीवीयों और युवाओं ने मिलकर इस युनियन कारबाईड को देश से निकालने का अथक प्रयास किया और अंततः देश से बाहर खदेडने की  सफलता भी हासिल की। भोपाल गैस त्रासदी  घटना वर्ष 1989 की है उस समय यह घटना मात्र छोटी सी, एक स्थान पर सीमित लगती थी पर उसकी विचारधारा इतनी व्यापक थी की पिछले 37 वर्षों में देशव्यापी और अंततः विश्वव्यापी आंदोलन के रूप में उभर कर सामने आई। उस साल 5 जून की भीषण गर्मी में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के गांधी भवन में “संपूर्ण क्रांति दिवस” मनाने के लिए बुद्धिजीवियों, समाजकर्मियों और युवाओं के गोष्ठी हुई उसमें देश के बिगडते हालातों की समीक्षा करते हुए यह सवाल गर्मजोशी से उठाया गया कि आखिर देश के हालात बदलने के लिए जेपी आंदोलन हुआ बहुत से लोग समाज परिवर्तन में लगे हुए हैं फिर भी देश की दशा व दिशा बद से बदतर क्यों होती जा रही है ?लम्बी चली बैठक और विचारों के आत्म मंथन में तरह-तरह के कारण निकल कर सामने आऐ उनमें से एक महत्वपूर्ण कारण निकाला गया कि देश की अर्थव्यवस्था में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की नाजायज घुसपैठ और देश के धन का बाहर ले जाना।  इसी विचार ने “लोक स्वराज अभियान” (आजादी बचाओ आंदोलन) का सूत्रपात किया । जो की 18 महीने बाद सेवाग्राम आश्रम में जनवरी 1991 में आयोजित पहले राष्ट्रीय सम्मेलन नाम बदल कर “आजादी बचाओं आंदोलन” तय हुआ पर कार्यकर्ताओं की एक जुझारू व कर्मठ टीम ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सुची बनाने हेतु खोज में 5 जून 1989 से जुट गई थी । यहां एक बात का उल्लेख करना बहुत जरूरी है आजादी बचाओ आंदोलन के कार्यकलापों के बाद में पता चला कि वो बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कुकृत्यों के बारे में दुनिया में कुछ संगठन अध्ययन लेखन कर रहे थे और  उनके द्वारा प्रकाशित जनरल मल्टीनेशनल मॉनिटर और मलेशिया में प्रोफेसर मोहम्मद इदरीश और डॉक्टर मार्टिन खोर कोर पोंग का समूह थर्ड वर्ल्ड नेटवर्क और उसके द्वारा प्रकाशित थर्ड वर्ल्ड और टीडब्ल्यूएम फीचर विशेष रूप से उल्लेखनीय है। 1993 में डेविड कॉटन की अद्भुत पुस्तक “When Corporation Rule The World” प्रकाशित हो गई जिसने बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद कॉर्पोरेट कॉलोनीज़्म का अत्यंत गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया जिसका हिंदी अनुवाद प्रो. बनवारी लाल शर्मा जी ने किया जिसका शीर्षक “जब दुनिया में निगमों का राज चले” और कॉरपोरेट के खिलाफ सीधी लड़ाई आजादी बचाओ आंदोलन ने शुरु कि आगे चलकर इन अभियानों का भरपूर लाभ न केवल आंदोलन को मिला । बल्कि आंदोलन ने साहित्य,पोस्टर, पत्रिका, व्याख्यान, कैसेट के द्वारा सम्पूर्ण राष्ट्र को एहसास कराया ।बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा जारी शोषण लूट और अपसंस्कृतियों के प्रसारण से लोगों को परिचित कराया और उन्हें विदेशी उत्पादों के बहिष्कार का कार्यक्रम दिया। आजादी बचाओ आंदोलन देश का पहला आंदोलन था जिसने नए गैट डंकल प्रस्ताव के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी । 23 मार्च 1992 आंदोलन ने दिल्ली के बोर्ड पर भूमंडलीकरण उदारीकरण की नीतियों के खिलाफ विशाल रैली का आयोजन किया 3 मार्च 1994 को अन्य जमीनी संगठनों के साथ मिलकर डंकल समझौते के विरुद्ध दिल्ली के लाल किले पर एक और विशाल रैली की । 14 दिसंबर 1993 को आंदोलन ने दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में बड़ी सभा की जिसमें राज्यसभा के विरोधी दलों के सांसदों और समाज कर्मियों ने ऐलान किया कि राज्य सभा में सभी पेटेंट कानून का संशोधन पारित होने नहीं देंगे यह बिल 4 साल तक रुका रहा सरकार ने इस बिल को पारित करा लिया है  पर आंदोलन में अन्य संगठनों के साथ इसके विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की है।  आंदोलन की साढे तीन साल की कानूनी लड़ाई के बाद दिल्ली के पुलिस आयुक्त ने 7 जुलाई 1999 को पुलिस आदेश जारी किया कि दिल्ली में कोई अश्लील पोस्टर चिपकाने नहीं दिया जाएगा दूरदर्शन के खिलाफ आजादी बचाओ आंदोलन की याचिका पर 3 जुलाई 1996 को दिल्ली के चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट श्री प्रेम कुमार ने आदेश जारी किया कि दूरदर्शन पर एडल्ट फिल्में तथा अश्लील कार्यक्रम बंद किए जाए और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही की जाए भारत सरकार ने आंदोलन के इस प्रयास को निष्फल कर दिया।  30 अप्रैल से 15 मई 1993 को आंदोलन में गांधीवादी और समाजवादी संगठनों के साथ नमक बनाने आई सन् 2005 को अमरिकी कम्पनी कारगिल के खिलाफ आंदोलन चलाया और कांडला (गुजरात) बंदरगाह से उसे खदेड़ा।  राजस्थान के अलवर जिले में 24 देशी-विदेशी शराब का लाइसेंस रद कराया  शंकरगढ़ इलाहाबाद में विदेशी कंपनी सेल के कारखाने को नहीं लगने दिया और व्यापक जन उभार को संघर्ष की तरफ उड़ते हुए आंदोलन में अक्टूबर 2003 को वाराणसी के सम्मेलन में निर्णय किया कि कंपनियों के खिलाफ सीधी लड़ाई का समय आ गया है और आंदोलन में अपना पहला लक्ष्य बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद की झंडाबदार लूटखोर अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों पेप्सी कोला कोका कोला को बनाया । 20 फरवरी 2005 को इन कंपनियों के बॉटलिंग प्लांट कि पूरे

आंदोलन समाचार

देश का कार्पोरेटीकरण अदानी ग्रुप के माध्यम से 2014 के बाद द्रुत गति से बढ़ा–डॉ मिथिलेश डांगी

आजादी बचाओ आंदोलन की पाक्षिक आम बैठक Google Meet के माध्यम से दिनांक 14 अक्टूबर को शाम 8:00 बजे से 9:30 बजे तक सफलतापूर्वक संपन्न हुई।इस बैठक का मुख्य विषय ‘भारत की वर्तमान परिस्थितियां और अडानी की लूट’ था। इसके मुख्य वक्ता आंदोलन के संयोजक डॉक्टर मिथिलेश डांगी थे, जिन्होंने विस्तार से इस मुद्दे पर अपनी बात रखी।                              गुगल मीट बैठक  उन्होंने बात रखते हुए कहा कि भारत के संविधान में पूंजीवाद का कहीं भी जिक्र नहीं है लेकिन आज देश को पूंजीवादी नीतियों के तहत बढ़ाया जा रहा है। एक समय भारत में 24 लाख रेलकर्मी थे लेकिन निजीकरण के माध्यम से आज की स्थिति सर्वविदित है। उन्होंने संविधान के विभिन्न अनुच्छेदो का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान में समान न्याय, राइट टू वर्क व एजुकेशन, देश में बच्चों को अनिवार्य शिक्षा आदि का जिक्र है लेकिन असंवैधानिक तरीके से लगातार निजी इंस्टिट्यूट को बढ़ाया जा रहा है। एक तरफ शिक्षा तथा स्वास्थ्य का निजीकरण खतरनाक रूप से हो रहा है और दूसरी तरफ नाजायज तरीके से टोल टैक्स वसूला जा रहा है। एक तरफ आंगनबाड़ी सहित प्राथमिक, माध्यमिक तथा उच्च माध्यमिक विद्यालय के छात्रों की संख्या 27 करोड़ के आसपास है, वहीं पर सरकारी शिक्षक की संख्या 97 लाख के करीब है। वहां के पाठ्यक्रम को भी मनमाने तरीके से फेरबदल किया जा रहा है।गांव, प्रखंड तथा जिला स्तर के अस्पताल लगातार खस्ता हाल में है और इन सभी चीजों पर निजीकरण के माध्यम से कॉर्पोरेट का नियंत्रण होता जा रहा है। वर्तमान भारत में चर्चित कॉरपोरेट जगत में से एक अदानी समूह के द्वारा भारत के हरेक क्षेत्र पर निजीकरण के माध्यम से कॉर्पोरेट का प्रभुत्व होता जा रहा है।उन्होंने स्पष्ट कहा कि 2014 के बाद विभिन्न बंदरगाहों पर अदानी समूह का प्रभुत्व है जैसे पश्चिम बंगाल में हल्दिया, ताजपुर उड़ीसा में धामरा, आंध्र प्रदेश में कृष्णापट्टनम, विशाखापट्टनम आदि, कर्नाटक में बेंगलुरु, गुजरात में मुंद्रा, दहेज,आदि गोवा में पणजी तथा पांडिचेरी, केरल, महाराष्ट्र में एक-एक तथा तमिलनाडु में दो बंदरगाह अदानी समूह के हैं। भारत के तटीय व्यापार पर अदानी समूह का 46% कब्जा है।  जहां पर जल मार्ग की बहुलता नहीं है उस क्षेत्र के कई हवाई अड्डे भी अब अदानी समूह के पास है। जैसे लखनऊ, अहमदाबाद, बेंगलुरु, जयपुर, गुवाहाटी आदि। इसके अलावा 25 अन्य हवाई अड्डे भी आधुनिकीकरण के नाम पर  अदानी समूह को देने की तैयारी है। इस तरह के क्षेत्र उस कॉरपोरेट कंपनी को दिया जा सकता है जिनके पास तीन से चार वर्ष का अनुभव हो, जबकि अदानी समूह के पास इस तरह का अनुभव नहीं है। ठीक उसी प्रकार रेलवे ट्रांसपोर्टेशन में भी अदानी समूह ने अपना प्रभुत्व बढ़ाया है। जैसे मुंबई में छत्रपति शिवाजी टर्मिनल, उत्तर प्रदेश में अयोध्या तथा गोमती, नई दिल्ली के सफदरगंज रेलवे स्टेशन सहित ग्वालियर, इंदौर तथा अहमदाबाद आदि शहरों के चुनिंदा रेलवे स्टेशन पर अब अदानी समूह का नियंत्रण है।ठीक उसी प्रकार राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना के अंतर्गत 600 किलोमीटर लंबाई वाले गंगा एक्सप्रेसवे में से 470 किलोमीटर लंबाई वाली सड़क बनाने का काम अदानी समूह को मिला है। ऊर्जा के क्षेत्र में भी थर्मल पावर प्लांट के अंतर्गत चार लाख 16 हजार मेगावाट में से 44 हजार मेगावाट के अंतर्गत इस परियोजना में अदानी समूह की भूमिका है।ठीक उसी प्रकार कोल ब्लॉक में भी अदानी समूह को अच्छा खासा शेयर दिया गया है।उन्होंने RSR (Rail ship Rail) योजना का जिक्र करते हुए कहा कि यह योजना भी अदानी समूह को फायदा पहुंचाने के लिए लाई गई। इसे विस्तार से समझाते हुए उन्होंने कहा कि एक समय झारखंड के पचवारा कोयला खदान से कोयला सीधे पंजाब एनटीपीसी जाती थी। लेकिन अब पाकुड़ के पचवारा से यह कोयला पहले उड़ीसा के पारादीप जाती है, वहां से ship के माध्यम से यह गुजरात के दहेज बंदरगाह जाता है। वहां से फिर यह ट्रेन के माध्यम से पंजाब एनटीपीसी भेजा जाता है। इस तरह जो कोयला झारखंड से सीधे पंजाब एनटीपीसी भेजने पर  प्रति टन 4700 रूपए में चला जाता था, अब वही कोयला अदानी समूह को फायदा पहुंचाने के लिए प्रति टन 7000 रूपए में पंजाब पहुंच रहा है। अग्निवीर योजना का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इस तरह की योजना का लाभ भी अदानी समूह को मिलेगा। अग्निवीर योजना में काम करने वाले सैनिक चार साल में रिटायर होने के बाद इसी तरह का काम करना पसंद करेंगे। आने वाले दिनों में देश में कई तरह की अव्यवस्था फैलने के आसार हैं। इसका नतीजा यह होगा कि अडानी समूह जैसे कॉरपोरेट कंपनी को हथियारबंद सैनिक की आवश्यकता पड़ेगी। अग्निवीर योजना से रिटायर सैनिक इसमें काम आएंगे। दूसरी तरफ कानपुर में हथियार उत्पादन करने वाली फैक्ट्री का ठेका भी भारत सरकार के द्वारा अडानी समूह को दिया गया है, जिससे इन सैनिकों को हथियार मुहैया कराने में आसानी रहेगी। यह एक प्रकार से देश की संप्रभुता को खतरे में डालने जैसा होगा। डॉ डांगी ने यह भी खुलासा किया कि बॉक्साइट और मैंगनीज आदि क्षेत्रों में भी अदानी समूह काम कर रहा है। उन्होंने मणिपुर में पिछले कई महीने से जारी कुकी-मैतई हिंसा में भी अदानी समूह की भूमिका को जोड़ते हुए कहा कि अडानी समूह को वहां पर पाम आयल तेल की खेती करनी है और इस समूह को वहां पर बसाने के लिए भी इस हिंसा को बढ़ावा दिया जा रहा है। इस तरह उन्होंने कहा कि भूमि, जल, वायु सहित सभी क्षेत्रों में इस कॉर्पोरेट कंपनी का अच्छा खासा प्रभुत्व हो चुका है। 2014 के पहले इस देश में जिन-जिन क्षेत्रों में कॉर्पोरेट का प्रभुत्व था, आज उस क्षेत्र में पहले के मुकाबले कहीं अधिक इस पूंजीवादी शक्तियों का कब्जा है और रोचक बात यह है कि उस पर केवल एक पूंजीपति गौतम अडानी का कब्जा है। इससे पता चलता है कि अदानी की लूट की फेहरिस्त काफी लंबी है। हिंदुस्तान की हुकूमत उसके द्वारा ही govern हो रही है। 2014 के पहले भी विभिन्न बंदरगाहों पर कॉरपोरेट का कब्जा था लेकिन बड़े-बड़े बंदरगाह सरकार द्वारा संचालित होते थे लेकिन आज मुंद्रा जैसे बंदरगाह भी अदानी समूह के हाथ में है। इन सब परिस्थितियों के मद्देनजर देश में

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