आजादी बचाओ आंदोलन की सेवाग्राम घोषणा

बहुराष्ट्रीय गुलामी में जकड़े भारत की तस्वीर

विदेशी कर्जों के बोझ तले दम तोड़ती अर्थव्यवस्था, बड़े-बड़े उद्योगों के भयावह पंजों में मक्खियों की तरह मसल उठे परंपरागत लघु और कुटीर उद्योग, महंगे उर्वरकों और कीटनाशकों की वजह से महंगी और बाजार का मुंह तक की खेती, 35 करोड़ बेरोजगार नौजवान, कमर तोड़ महंगाई से परेशान उपभोक्ता, नशाखोर जमीन, जहरीले खाद्यान, हवा और पानी, नष्ट होते जंगल, उजडते लोग, टूटता समाज, पसरती अपसंस्कृतियां और मूल्य हीनता, निज के समाज से कटी टूटी और किन्ही इत्तर जीवन मूल्यों को ढोने वाली शिक्षा व्यवस्था, बाह्य शक्तियों के इशारों पर लिए जाने वाले राजनीतिक और आर्थिक निर्णय, दुनिया की कंपनियों के आगे बिकी सरकारें और विकलांग लोकतंत्र और इससे भी कहीं अधिक भयावह शायद अकल्पनीय यह तस्वीर है भारत की जो कोई 300 साल पहले दुनिया का सबसे समृद्ध राष्ट्र था। सबसे बड़े निर्यातक से सबसे बड़े आयातक देश की श्रेणी में आए इस भारत की आर्थिक नीतियां यहां की सरकारें नहीं तय करती बल्कि विदेशी बहु राष्ट्रीय कंपनियों के इशारो पर उनके मूल देश की सरकारें, विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष तय करते हैं। इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के फैले उपनिवेशवादी जाल से हमारी राजनीतिक संप्रभुता, आर्थिक स्वयत्तता और सांस्कृतिक अस्मिता खतरे में पड़ गई है। देश पर फिर से बहुराष्ट्रीय गुलामी लद गई है।

बाजारवाद पर टिका विकास

दरअसल यह सब कुछ उस व्यापक विश्व अर्थव्यवस्था की संरचना का अंश और एक मायने में परिणाम है, जो पहले यूरोप की औद्योगिक क्रांति में और फिर दूसरे विश्व युद्ध के बाद उभरे महाबली अमेरिका ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पूरी दुनिया पर ठोक दिया। देश की गुलामी और लूट प्रकृति के दोहन पर टिका बाजारवाद ही विकास का मॉडल बन गया

विशाल उद्योगों के पहिए पर दौड़ने वाला विकास के इस मॉडल ने एकाएक उन देशों को आर्थिक पिछड़ा घोषित कर दिया, जो प्राकृतिक संपदायुक्त और आत्मनिर्भर थे तथा जहां विकास की एक भिन्न गति थी, इस नए आर्थिक नव साम्राज्यवाद की वाहक पश्चिमी स्थूल सत्ता न होकर वह निगम निगम में थी, जो नव स्वाधीन देश की अर्थव्यवस्था को अपने कब्जे में करने के लिए अपना सूक्ष्मतम जाल बुन रही थी। भारत समेत दुनिया के तमाम नव स्वाधीन देशों ने इस मॉडल को अपनाया तथा प्रतिपक्ष में बराबरी पर खड़ा होने की प्रति प्रतिस्पर्धा में रूस ने भी इसी मॉडल को अपनाया विश्व आर्थिक वृत्त की परिधि पर विन्दुवत इन विकसित देशों का अर्थ संरचना के नाम पर अपना कुछ भी नहीं बचा रह गया है, जबकि वृत्त के केंद्र के विकसित देश इन देशों के संसाधनों का निरंतर आवाध दोहन कर अपनी अर्थव्यवस्थाओं को समृद्ध बना रहे हैं।

उपनिवेशवाद नए रूपों में

(क) विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष— उपनिवेशवाद के अनेक नए रूपों में विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का महत्वपूर्ण स्थान है। यह बहुराष्ट्रीय कंपनियों का राज स्थापित करने हेतु प्रतिबद्ध है तथा इन पर अमेरिका और उसके सहयोगी औद्योगीकृत देश का कब्जा है। इन्हीं संस्थाओं की एक तरफा शर्तों के दबाव में आकर वर्तमान सरकार ने नई आर्थिक नीतिगत एवं संरचनात्मक परिवर्तन स्वीकार किए हैं। यह इन देशों का हमारी राष्ट्रीय संप्रभुता पर खुला कुठारघात है।

(ख) समझौता का कुचक्र–विकसित देशों के तथाकथित विकसित ज्ञान और प्रौद्योगिकी के आकर्षण के फलस्वरुप बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा भारत को विश्व बाजार से जोड़ने के अभियान में अनेक एकपक्षीय, दिपक्षीय एवं बहुपक्षीय समझौते की महत्वपूर्ण भूमिका है। इनमें गैट के उरुग्वे चक्र वार्ता और अमेरिकी स्पेशल 301 के अंतर्गत वार्ता प्रमुख हैं।

गैट– वस्तुत गैट का उरुग्वे वार्ता चक्र तीसरी दुनिया के देशों को बराबरी के स्तर पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा को रोकने का कुचक्र है। यह यथार्थ में विश्व की तीन आर्थिक महाशक्तियों अमेरिका, यूरोपीय आर्थिक समुदाय और जापान के बीच चल रहे व्यापारिक युद्ध का मंच है, जिसमें पिस रहे हैं तीसरी दुनिया के गरीब देश, खुली अर्थव्यवस्था और सार्वभौमिक भूमि कारण के नाम पर यह भारत जैसे देशों पर बहुराष्ट्रीय एवं बहुपक्षीय हमला है, जिसका मुख्य उद्देश्य विशेषत अमेरिकी कंपनियों के लिए इन देशों के बाजार को सुरक्षित करना है। ट्रिम्स (TRIMS) और ट्रिप्स (TRIPS) के माध्यम से एकाधिकार प्राप्त कर इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों का भारत के आर्थिक और औद्योगिक अंतरिक्ष पर पूर्ण कब्जा करने का इरादा है। भारतीय कृषि के क्षेत्र में गैट वार्ता का प्रभाव होगा हमारी खेती की स्थाई गुलामी। पौधों के प्रजनन एवं अनुसंधान पर पेटेंट कानून लड़ने की जो कोशिश चल रही है। यदि भारत इसके सामने झुकता है, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे। यह कैसी विडंबना है कि स्वाम्लंबी कृषि नीति को गैट वार्ता में व्यापार विरोधी घोषित किया जा रहा है।

अमेरिकी स्पेशल 301— भारतीय पेटेंट कानून विशेषत बौद्धिक संपदा कानून में भारी परिवर्तन कराने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर लगे शेष प्रतिबंधों को हटाने के लिए तथा पेटेंट संबंधी पेरिस समझौता पर भारत के हस्ताक्षर कराने के लिए अमेरिका अपने व्यापार अधिनियम 1988 की धारा स्पेशल 301 के तहत भारत की बांह मरोड़ रहा है। यदि भारत इन शर्तों को नहीं स्वीकार करता तो अमेरिका की दंडात्मक कार्रवाई की योजना है। वर्तमान सरकार इन दावों के आगे झुकती जा रही है।

दो प्रमुख अंतरराष्ट्रीय घटनाएं— पूर्वी यूरोप एवं साम्यवादी रूसी व्यवस्था के ढह जाने के बाद इन दोनों देशों के द्वारा बाजार अर्थव्यवस्था के अपने और 27 देशों की बहुराष्ट्रीय सेना द्वारा इराक पर हमले ने शोषण और लूट पर आधारित बाजार अर्थव्यवस्था की आक्रामकता को बढ़ावा दिया है।

(ग) पर्यावरण संबंधी उपनिवेशवाद–ग्रीनहाउस प्रभाव या सार्वभौमिक तापन से पर्यावरण के वीभत्स खतरों के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार अमेरिका और अन्य औद्योगिक विकसित देशों ने चोरी और सीना जोड़ी (अंतरराष्ट्रीय गुंडागर्दी) का बेमिसाल उदाहरण पेश करते हुए इसके लिए मुख्यत जिम्मेदार तीसरी दुनिया के देशों को ठहराया है। इसमें भारत, चीन, ब्राजील का नाम पहले पांच अपराधियों में है। इन देशों को विश्व पर्यावरण की रक्षा की जिम्मेदारी बहन करते हुए जुर्माना देना पड़ेगा

(घ) विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर एकाधिकार— मानव सभ्यता के विकास आने वाली अड़चनो को समझने और हल करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले विज्ञान और तकनीक पर विकसित कहलाने वाले बड़े देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनी का कब्जा है। जहां एक ओर घिसी पीटी तकनीक के भारतीय आयत की बात है, वहीं दूसरी ओर परमाणु विकिरण रिसाव के खतरे, तकनीक एवं महंगे डिजाइनों पर आधारित बड़े बांधों की त्रासदी, बहुराष्ट्रीय निगमन द्वारा बेचे जा रहे कृषि रसायन कीटनाशक दवाओ एवं नए परिष्कृत बीजों के खतरे अत्यंत ही विभत्स है। भोपाल गैस त्रासदी की भयावहता इसका ज्वलंत उदाहरण है। गरीब देशो के लिए तकनीक की उपयुक्तता के प्रश्न को पीछे छोड़ते हुए हमारे सरकारें तकनीक आयात और औद्योगीकरण के नाम पर उन क्षेत्रों में बहुराष्ट्रीय निगमन को बुलवा दे रही है जिनमें अधुनातन व विशिष्ट तकनीक की कोई आवश्यकता नहीं है। बड़ी बहुराष्ट्रीय निगम हिंदुस्तान लीवर, बाटा, ब्रुकबॉन्ड, कैडबरी, कोलगेट, पामोलिव, पेप्सी, कोक आदि ऐसे ही क्षेत्र में अपना व्यापार कर रही है।

(ङ) औद्योगिक क्षमता की नीलामी— दुष्परिणामों पर ध्यान दिए बिना और जिस तरह भारतीय सार्वजनिक उद्योगों पर निष्क्रियता और अफसरशाही के आरोप लगाकर इनकी राष्ट्रीय आर्थिक विकास के प्रति जवाबदेही की संरचना तैयार करने और कार्य संस्कृति का विकास करने की बजाय सरकार इन्हें नीलाम कर बहुराष्ट्रीय कंपनी के हवाले कर रही है। यह गुलामी की चरम स्थिति है

(च) गुलाम हो चुकी कृषि व्यवस्था— बहुराष्ट्रीय कंपनियों की गुलाम कृषि उत्पादन प्रणाली के आधुनिकीकरण के दिखावे में उत्पादन वृद्धि की बात तो की जाती है, पर गुणवत्ता और रचनात्मकता की गिरावट पर एकदम ध्यान नहीं दिया जाता है। आधुनिकीकरण और व्यवसायीकरण के मकरजाल में भारतीय किसानों की जान बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा उत्पादित महंगे उपकरणों एवं रसायन सामग्री को खरीदने में निकल चुकी है। इससे एक तरफ तो राष्ट्रीय कंपनियों की अकूत आय हो रही है तथा दूसरी ओर निरंतर गरीबी भयावह रूप लेती जा रही है। ना सिर्फ कृषि शोध वरण नए किस्म के बीजों की आपूर्ति के लिए भी हम अमेरिका और यूरोपीय बहुराष्ट्रीय निगमों के ऊपर निर्भर हैं। जिनका मूल उद्देश्य अपनी आर्थिक संप्रभुता हेतु कृषि जिंसों का अंतरराष्ट्रीय व्यापार करना है। स्वभावत इस प्रक्रिया में मूल भारतीय जींस एवं परंपरागत उत्पादन प्रणाली पूर्ण समाप्ति के कगार पर है। देश के जैविक भंडार के समाप्त होने पर हम कृषि शोध के लिए पूर्णत बहुराष्ट्रीय निगमो के गुलाम और मोहताज हो जाएंगे।

(छ) मानव स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़— दवाओ के नाम पर जहर, स्वास्थ्य, टानिकों के नाम पर सोयाबीन और मूंगफली की खाली सुखा दूध या जौ का आटा और कभी-कभी तो जानवरों का खून तक लेने वाली यह बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत की गरीब जनता के साथ मौत का व्यापार कर रही है। दुनिया के तमाम विकसित तथा अविकसित देशों में अपने जानलेवा असर के कारण प्रतिबंधित अनेक सैकड़ो दवाइयां हमारे यहां बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा हजारों ब्रांड नाम से बनाई जा रही है। वॉलंटरी हेल्थ एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अनुसार बहुराष्ट्रीय कंपनियां प्रतिवर्ष 1800 करोड़ से ज्यादा मुनाफा प्रतिबंधित तथा प्रतिबंध योग्य दवाइयां को बेचकर कमाती है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने इस देश के डॉक्टरों तथा मेडिकल प्रैक्टिसनरों को अपनी दवाइयां बेचने के लिए घूस व कमीशन देकर पथभ्रष्ट और कर्तव्य भावना से हीन तो बनाया ही है साथ ही इस देश के बच्चों से दूध, दही और मक्खन छीन कर उसकी ट्रॉफी और चॉकलेट बनाकर संपन्न वर्ग के बच्चों में बेचा जा रहा है। उन्हें उनके स्वास्थ्य के लिए विटामिन की गोलियां और तथाकथित स्वास्थ्यवर्धक टॉनिकों पर निर्भर बना दिया गया है।

(ज) बेरोजगारी — आंकड़े गवाह है कि भारतीय रेल में 5 लाख लोगों की छंटनी के साथ-साथ बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मार से सभी क्षेत्रों में बेरोजगारी तेजी से बढ़ रही है

(झ) सांस्कृतिक साम्राज्यवाद— कृत्रिम इच्छाओं और भोग विलासिता को जगाकर निकृष्ट कोटि की संस्कृति को गरीब देश में ठूंसने का काम इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने बखूबी किया है। बुद्धिजीवियों ने पश्चिम की ओर इतनी श्रद्धा और अनुकरण की दृष्टि से देखा, मानो वही प्रगति का आदर्श हो। नतीजा सामने है, भटकते युवाओं के दिमाग पर सेक्स और हिंसा का जुनून पागलपन की हद तक उतरने लगा है और नारी सिर्फ बाजार की बिकाऊ वस्तु बन गई है।

बहुराष्ट्रीय गुलामी की मकरजाल:- तीसरी दुनिया के 90 फ़ीसदी बाजार पर काबिज यह बहुराष्ट्रीय कंपनियां लूट और भ्रष्टाचार की हर सीमा को तोड़ रही है। गरीब देश की विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और नौकरशाही पूरी तरह बिकाऊ सिद्ध हो रही है। ऐसे में स्वतंत्रता और संप्रभुता खतरे में है। अमेरिका भुख और भोजन की चाल में कामयाब रहा है। जिसमें एक और इसने इन देशों की खेती को नष्ट किया और दूसरी और अन्न बेचकर उन्हें कर्ज के जाल में भी उलझा दिया। ब्राजील, भारत, नाइजीरिया आदि तमाम देशों की अर्थव्यवस्थाएं चरमरा गई है। आय का वितरण निरंतर असामान हो रहा है। भ्रष्टाचार सिर चढ़कर बोल रहा है और विकास के नाम पर पनप रहा नव धनाढ्यवर्ग काले धन को हड़प रहा है। फिर भी हमारे शीर्षस्थ अर्थशास्त्रीय विकास की दुहाई दिए बगैर नहीं रहते। रोजगार मिले या ना मिले, गरीबी मिटे या ना मिटे, बस सकल राष्ट्रीय उत्पादन बढ़ाना चाहिए। इस अनर्थशास्त्र की यही विडंबना है।

वैकल्पिक व्यवस्था की और

इसमें कोई शक नहीं है कि जिस बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद में हम बुरी तरह फंस चुके हैं, वह ब्रितानी शासन की गुलामी से कहीं बदतर है और हमारी सरकार इस उपनिवेशवाद के सपने को साकार कर रही है। इसलिए आजादी की यह लड़ाई नव साम्राज्यवादी शक्तियों के साथ-साथ अपने ही देश के उन उद्योगपतियों व सत्ताधीशो के खिलाफ भी है जो इनका हित साधन कर रहे हैं। यह कंपनियां निश्चय ही शोषण के कुचक्र का नियोजन और नेतृत्व कर रही है।

हमें इस शोषण से मुक्त उस आत्मनिर्भर समाज की रचना करनी है, जिसमें हर व्यक्ति को ईमान की रोटी और इज्जत की जिंदगी की गारंटी हो। आजकल विकास के नए शब्द उदारीकरण और वैश्वीकरण औपनिवेशीकरण के ही दूसरे नाम है। जिसका अर्थ है गरीब मुल्क में बदहाली, भुखमरी और मुट्ठी भर लोगों का विकास।

इसलिए अब पहले से चले आ रहे अंतरराष्ट्रीय व्यापार के औपनिवेशिक ढांचे को तोड़कर पूंजी सघन क्षेत्रों के बचाए श्रम साधन क्षेत्र में उत्पादन को बढ़ाना होगा और स्वदेशी वस्तुओं के होते अनावश्यक आयात पर पाबंदी लगानी होगी। तब देश भर में विकेंद्रित उत्पादन तथा स्वावलंबन के साथ ही लोकतांत्रिक संस्थाओं में चल की भागीदारी सुरक्षित की जा सकेगी। शोषण के आधुनिक रूप प्रौद्योगिकी एक बड़ा हथियार है। इसके जरिए बहुराष्ट्रीय निगमे हमारे बाजारों पर कब्जा करती है। हमें इस गुलामी की टेक्नोलॉजी को बाहर करके स्वदेशी का विकास करना होगा जो आवश्यकता के हिसाब से उत्पादन करें, अनावश्ताक श्रम की बचत करें और मनुष्य व पर्यावरण के बीच रागात्मक संबंध की स्थापना करें

आज विकसित देश हमें निर्यात पढ़कर विकास करो कि सीख दे रहे हैं और अपने यहां की गैर बुनियादी वस्तुओं को अल्प विकसित देशों में मंडियों में खपा रहे हैं। हमारी वैकल्पिक व्यवस्था में पूर्ण रोजगार, उत्पादक उपभोक्ता के बीच शोषण मुक्त संबंध और मूलभूत आवश्यकता का उत्पादन आदि प्रमुख अंग होंगे। छोटे व स्वतंत्र उत्पादन की कीमत पर बड़े पैमाने पर उत्पादनो को बढ़ावा कतई नहीं दिया जाएगा। वास्तव में सब उत्पादन सामूहिकता और सहकारिता पर आधारित होगा।

कच्चे माल का निर्यात बहुत ही कम मात्रा में होगा बल्कि उसे स्वयं ही बेहतर व ज्यादा रोजगार उपलब्ध कराने के लिए प्रयोग किया जाएगा। इससे बहुराष्ट्रीय निगमो में से सहयोग का अर्थ है अपनी आर्थिक स्वायत्तता और राजनीतिक संप्रभुता को खो बैठना। सामान्य तौर पर खेती की उपज का प्रसोधन होकर उपभोग योग्य वस्तु के रूप में यानी कच्चा माल पक्का बनकर ही गांव से बाहर जाएगा। इससे गांव के कलां कौशल तो पनपेगे ही, खेती पर बढ़ता दबाव भी कम होगा। वर्तमान अर्थव्यवस्था में तो तीसरी दुनिया के तमाम देश स्वयं कृषि प्रधान होने पर ही विकसित देशों से खाद्यान्न आयात कर रहे हैं। पूंजी का बहाव गरीब देशो से अमीर देशो की ओर है। ऐसे में स्वदेशी को ही मूल मंत्र बनाना होगा।

नई आजादी की लड़ाई में आगे आए

इस प्रकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों के रूप में दुश्मन हमारे सामने है और जब सरकार ही उनके आगे घुटने टेक रही है, वह उनके एजेंट बन चुकी है। जाहिर है इन कंपनियों को भगाने की लड़ाई हमें यानी किसानों, मजदूरों, छात्रों, बुद्धिजीवियों, व्यापारियों, कर्मचारियों को स्वयं लड़नी होगी। इसका कोई लघु मार्ग नहीं है

अहिंसा के अस्त्र को लेकर हम जिस समाज की रचना करेंगे, उसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों के देसी पुछल्लों का तो अंत होगा ही, सामंतवाद के अवशेष और अपसंस्कृति का भी हमेशा के लिए अंत होगा। नई व्यवस्था में हर किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य मिलेगा। भूमि सुधार को लागू करने भूमिहीन खेतिहर मजदूरों का ध्यान रखा जाएगा। कारीगरो के कौशल और वैज्ञानिकों की प्रतिभा का आत्मनिर्भर उपयोग हो सकेगा

आंचलिक गैर बराबरी के कारण देश के विघटन और तनाव का माहौल व्याप्त है। हमारे आंदोलन में मुनाफाखोरों की मार्ग को सहते दलित, महिलाओं और पिछड़े वर्गों की पूर्ण भागीदारी होगी

आदिवासियों की संस्कृति के उदात्त पक्षो की रक्षा करते हुए सभ्य समाज द्वारा उन पर हो रहे अत्याचार का प्रचुर मुकाबला किया जाएगा। प्रकृति के मूर्खतापूर्ण दोहन पर कर अंकुश लगाने के लिए संघर्ष किया जाएगा

विपथगामी सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का पूरजोर विरोध करना होगा

हमारी व्यवस्था में उत्पादन गांव गांव में होगा। कन्वेंटीकरण से मुक्त शिक्षा की गारंटी होगी और आम आदमी का जीवन प्रतिष्ठा पूर्ण होगा। इसके अलावा हम तीसरी दुनिया के शोषण विरोधी आंदोलन में उनके साथ देंगे क्योंकि हमारी लड़ाई का निशाना एक है। इसके लिए सभी वर्गों के लोगों को निजी हित से निकलकर आगे आना होगा। देश के किसानों, मजदूरों, बुद्धिजीवियों, ट्रेड यूनियनों, आदिवासियों, छात्रों, महिलाओं से हमारी अपील है कि वह नई आजादी का ऐलान करें। पचास साल पहले 1942 में ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का चौतरफा आंदोलन छिड़ा था। ‘बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत छोड़ो’ उसी की अगली जोरदार हुंकार है

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