January 2024

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खारिज किए गए बांधो को फिर से मंजूर करना, प्रभावित आदिवासीयों के हित में नहीं :- राजकुमार सिन्हा

लेखक:- राज कुमार सिन्हालेखक:- राजकुमार सिन्हा  (बरगी बांध विस्थापित संघ के वरिष्ठ कार्यकर्त्ता हैं।) ज्यादा नहीं, कुल आठ साल पहले जिन सात बड़े बांधों को तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने ठेठ राज्य की विधानसभा में खारिज कर दिया था, उन्हें अब प्रशासकीय स्वीकृति मिल गई है। गौरतलब है कि नर्मदा घाटी के मध्यप्रदेश के हिस्से में 29 बड़े बांध प्रस्तावित हैं जिनमें से 10 का निर्माण हो चुका है और 6 का निर्माण कार्य प्रगति पर है। शेष 13 में से 10 बडे बांधों को हाल में प्रशासकीय स्वीकृति मिली है। वर्ष 2016 में मुख्यमंत्री ने विधानसभा में घोषणा की थी कि परियोजनाओं की बढ़ी कीमत, विशाल डूब क्षेत्र और वनाच्छादित क्षेत्र के नुकसान के चलते बड़े बांधों की सात परियोजनाओं को रद्द किया जा रहा है। विडियो देखने के लिए टैप करें। इनमें से एक बसनिया बांध में 2443 हैक्टेयर काश्तकारों की निजी भूमि,2107 हैक्टेयर वनभूमि और 1793 हैक्टेयर शासकीय भूमि, अर्थात कुल 6343 हैक्टेयर जमीन डूब में आएगी। इससे 42 गांवों की 8780 हैक्टेयर जमीन में सिंचाई और 100 मेगावाट जल-विद्युत उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। इसको बनाने की अनुमानित लागत 2884.88 करोङ रूपये होगी। इस बांध से डिंडोरी के 13 और मंडला जिले के 18 गांव, अर्थात कुल 31 गांवों के 2735 आदिवासी परिवार विस्थापित होंगे।‘पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय’ द्वारा गठित ‘नदी घाटी विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति’ ने पिछले वर्ष प्रस्तावित ‘बसनिया बहुउद्देशीय परियोजना’ के लिए ‘पर्यावरणीय प्रभाव आंकलन रिपोर्ट’ तैयार करने हेतु ‘संदर्भ बिन्दु’ (टीओआर, टर्म्स ऑफ रिफरेंसेस)तय करने का निर्णय लिया था। उक्त निर्णय के बाद ‘पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय’ ने ‘नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण’ को विस्तृत दिशा निर्देश जारी किए हैं जिसमें उल्लेख किया गया है कि ‘पर्यावरणीय प्रभाव आकलन – 2006’ के प्रावधानों और संशोधनों के साथ अतिरिक्त ‘विशिष्ट संदर्भ बिन्दुओं’ का अध्ययन किया जाए। इनमें परियोजना निर्माण के कारण नर्मदा नदी के जलग्रहण क्षेत्र में उसकी वहन क्षमता और निरंतरता के कुल प्रभाव का अध्ययन, वनभूमि परिवर्तन से पारिस्थितिकी तंत्र पर पङने वाले असर के लाभ-हानि का विश्लेषण, ‘पर्यावरण प्रभाव निर्धारण रिपोर्ट’ तैयार करने के लिए बेस लाइन डाटा को ‘टीओआर’ के मानक अनुसार संकलित करना शामिल है। साथ ही मिट्टी की विशेषताओं का अध्ययन कर जलाशय और जंगल के आसपास के कम-से-कम 10 गांवों के अलग-अलग स्थानों का डाटा संकलित करना होगा।‘विशिष्ट संदर्भ बिन्दुओं’ में तीनों ऋतुओं में परियोजना क्षेत्र की 10 जगहों के भूजल स्तर का नाप करना, परियोजना के कारण जलीय और स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर पङने वाले असर का अध्ययन करना, विद्युत उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाले पानी के कारण जलीय पारिस्थितिकी तंत्र एवं उत्पादन की मात्रा पर प्रभाव और उसके अनुसार पर्यावरणीय प्रबंधन कार्य योजना तैयार करना, डूब और बांध के निचले क्षेत्र में रेत खनन स्थल को चिन्हित करना, निर्माण में लगने वाली सामग्री का स्रोत और उसकी परियोजना स्थल से दूरी के साथ उसके परिवहन की विस्तृत योजना तैयार करना शामिल है।परियोजना की 10 किलोमीटर की परिधि में वाटर शेड की संभावनाओं का अध्ययन करना इसी का हिस्सा हैं। वनस्पति एवं जीवजंतु का विस्तृत अध्ययन, सबंधित क्षेत्र में पाये जाने वाले स्थानीय पौधों और जानवरों की प्रजाति की जानकारी, वन्यजीव संरक्षण की विस्तृत रिपोर्ट तैयार करना, डूब में आने वाली वनस्पति एवं जीवजंतु और पेङों की संख्या, घनत्व एवं उसकी नामावली के साथ विस्तृत रिपोर्ट तैयार करना, परियोजना के कारण पक्षियों पर पङने वाले प्रभाव और पानी के स्रोत पर पङने वाले प्रभाव का अध्ययन करना ‘विशिष्ट संदर्भ बिन्दुओं’ में शामिल हैं।इस लंबी-चौडी ‘पर्यावरणीय प्रभाव आंकलन रिपोर्ट’ के बावजूद क्या बडे बांधों से होने वाले पर्यावरणीय विनाश पर कोई अंकुश लगाया जा सकेगा? नर्मदा घाटी में पहले बने इंदिरा सागर, सरदार सरोवर, ओंकारेश्वर और बरगी बांध में लगभग 60 हजार हेक्टेयर वनभूमि और जंगल डूब चुका है। कई वर्षो से नर्मदा बेसिन में जंगलों की अंधाधुंध कटाई हुई है। ‘वन स्थिति रिपोर्ट – 1991’ के मुताबिक मध्यप्रदेश की नर्मदा घाटी के जिलों में वन आवरण कुल 52283 वर्ग किलोमीटर था, जबकि 2019 की ‘वन स्थिति रिपोर्ट’ के अनुसार 48188 वर्ग किलोमीटर रह गया है। इसका मतलब है कि बीते 28 सालों में 4095 वर्ग किलोमीटर अर्थात 4 लाख 9 हजार 500 हेक्टेयर वन आवरण कम हुआ है। वन विनाश के इस कारनामे का क्या असर हुआ? ‘जल संसाधन मंत्रालय’ की ‘वाटर ईयर बुक 2014-15’ के मुताबिक नर्मदा घाटी में 1901-1950 के दौरान औसत वार्षिक वर्षा की तुलना 2006 – 2010 के बीच करने पर पता चलता है कि नर्मदा के उद्गम वाले जिले अनूपपुर में औसत वार्षिक वर्षा 1397 मिलीमीटर से घटकर 916 मिलीमीटर रह गई है। उसी के पडौसी अपर नर्मदा के मंडला जिले में भी औसत वार्षिक वर्षा 1557 मिलीमीटर से घटकर 1253 मिलीमीटर रह गई है। बेसिन के अधिकांश जिलों की यही स्थिति है। जाहिर है, वर्षा की इस गंभीर कमी में जंगलों की बर्बादी का खासा हाथ है।नर्मदा की कुल 41 सहायक नदियां हैं जो सतपुडा, विन्ध्य और मेकल पर्वतों से बूंद-बूंद पानी लाकर नर्मदा को सदानीरा बनाती हैं, लेकिन इनमें से कई नदियां सूखने की कगार पर हैं। ‘केंद्रीय जल आयोग’ द्वारा गरूडेश्वर स्टेशन से जुटाए गए वार्षिक जल आंकङे के अनुसार 2004-05 और 2014-15 की तुलना में नर्मदा के प्रवाह में 37 प्रतिशत कमी आई है। 1975 की गणना के अनुसार नर्मदा में पानी की उपलब्धता 28 ‘मिलियन एकङ फीट’ (एमएएफ) थी। ‘नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण’ ने 1980 – 81 से प्रतिवर्ष नर्मदा कछार में उपलब्ध जल की मात्रा को रिकार्ड किया है। इस आंकङे से पता चलता है कि वर्ष 2010 -2011 में नर्मदा कछार में 22.11 ‘एमएएफ’ जल उपलब्ध था। अप्रेल 2018 की एक रिपोर्ट के अनुसार 2017 में नर्मदा नदी की जल उपलब्धता मात्र 14.66 ‘एमएएफ’ थी। ऐसी परिस्थितियों में खारिज किए गए बांधों को फिर से मंजूरी देना कहां की समझदारी होगी?

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इस बेलगाम सत्ता के नथुनों में नकेल कसनी होगी:- हिमांशु युवा बलाश

आज संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट और सड़क तक खामौश है आज ये खामौशी कल भारत के पतन का कारण बनेगी। उदय होगा तो बस खामौशी का और जब सत्ता बेलगाम हो जाएगी तो इस देश के पास सिविल नाफरमानी के सिवाय कोई रास्ता नहीं बचेगा। आज भारत की जरूरत है जब देश के तमाम लोगो को हसदेव के लिए ही नहीं बल्कि इस देश को बचाने के लिए सभी को एक मंच पर एक साथ एक हुंकार के साथ इस बेलगाम सत्ता के नथुनों में नकेल कसनी होगी। वरना आज हमारी खामोशी कल एक वीरान भारत को जन्म देगी।(पुरा विडियो देखने के लिए क्यु आर कोड को टच करें)

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परमाणु ऊर्जा संयंत्र लोगों की मौत का सौदागर :- राजकुमार सिन्हा

      केंद्र सरकार परमाणु उर्जा अधिनियम1962 के तहत परमाणु उर्जा केन्द्रों का विकास और संचालन करती है।इस अधिनियम के तहत फिलहाल घरेलू निजी कम्पनियों की उर्जा क्षेत्र में भागीदारी होती है।परन्तु नीति आयोग की ओर से गठित सरकारी समिति ने परमाणु उर्जा क्षेत्र में विदेशी निवेश पर लगी पाबंदी हटाने कि सिफारिश की है।समिति ने परमाणु उर्जा के उत्पादन में विदेशी कम्पनियों को शामिल करने के लिए परमाणु उर्जा अधिनियम के साथ विदेशी निवेश अधिनियमों में बदलाव की सिफारिश किया गया है।इसका  संकेत 2022 में भारत – अमेरिका के रक्षा और विदेश मंत्रियों  के बीच वाशिंगटन में हुई द्विपक्षीय वार्ता के समय ही मिल गया था।जब दोनों देशों के बीच आपसी व्यापार 150 अरब डॉलर तक ले जाने पर सहमति बनी जो उस समय 113 अरब डॉलर का था।इस बैठक में परमाणु,क्लाइमेट एवं क्लीन एनर्जी,  अंतरिक्ष अभियान और साईबर सुरक्षा के क्षेत्रों में 30 अरब डॉलर (लगभग 2.28 लाख करोङ रुपए) के निवेश को लेकर बातचीत हुई थी।जिसमें अमेरिकी कम्पनी भारत में 60 हजार करोङ रुपए की लागत से छह परमाणु रिएक्टर लगाने और भारत के घरेलू उपयोग और निर्यात के लिए लघु माॅडयूलर परमाणु रिएक्टर टेक्नलोजी  के विकास पर करीब 10 हजार करोङ रुपए निवेश की इच्छा जाहिर किया था।इसको लेकर उस समय न्यूक्लियर पावर कार्पोरेशन ऑफ इंडिया और वाशिंगटन इलेक्ट्रिक कंपनी के बीच बातचीत अंतिम चरण में था।कुछ दिन पहले परमाणु उर्जा विभाग ने बताया है कि वेस्टिंगहाउस इलेक्ट्रिक, जीई हिताची, इलेक्ट्रिक डी फ्रांस (ईडीएफ) समेत कई विदेशी कंपनियां देश की परमाणु उर्जा प्रोजेक्ट में भाग लेने में दिलचस्पी दिखा रही हैं।बहुराष्ट्रीय कंपनियां प्रौद्योगिक, आपूर्ति या ठेकेदार के रूप में और सेवा प्रदाता के रूप में अलग-अलग क्षेत्रों में निवेश करने ईच्छुक हैं।               जनवरी 2020 में परमाणु उर्जा विभाग (डीएई) ने इस सबंध में प्रधानमंत्री कार्यालय से चर्चा की थी।चर्चा के बाद केन्द्रीय कानून मंत्रालय से कानूनी राय मांगी गई थी कि क्या एफडीआई नीती को संशोधित कर परमाणु विद्युत क्षेत्र को निवेश के लिए खोला जा सकता है? परमाणु उर्जा विभाग का मत था कि परमाणु उर्जा अधिनियम किसी भी रूप में परमाणु विधुत परियोजनाओं में निजी क्षेत्र की भागीदारी को नहीं रोकता है।भारत सरकार ने अगस्त 2022 में विदेशी निवेश नियम और विनिमयन में संशोधन के लिए अधिसूचित किया था।             गौर तलब है कि भारत और अमेरीका कै बीच असैन्य परमाणु सहयोग के लिए 2008 के समझौते के तहत को परमाणु प्रौद्योगिकी और सामग्रियों का आयात शुरू करने की अनुमति दी गई और निजी कम्पनियों को भारतीय परमाणु बाजार में प्रवेश करने का रास्ता खोला गया।यह समझौता अमेरिका के परमाणु उर्जा अधिनियम 1954 की धारा 123 के तहत किया गया था।जिसे 123 समझौता कहा गया।इस समझौते को लेकर देश के विषय विशेषज्ञों ने गंभीर सवाल उठाये थे।     सवाल उठता है कि परमाणु क्षेत्र में निवेश करने वाली कम्पनी भारत क्यों आना चाहती है? दुनिया के 192 देश में से मात्र 30 देश परमाणु बिजली संयंत्र चला रहे हैं। इटली ने  चेर्नोबिल की दुर्घटना के बाद ही अपना परमाणु बिजली कार्यक्रम बंद कर दिया था।कजाकिस्तान ने 1999 में और लिथुआनिया ने 2009 में अपने एकमात्र रिएक्टर को बंद कर दिया था।परमाणु उर्जा संयत्रों के इतिहास की तीन भीषण दुर्घटनाओं थ्री माइल आइस लैंड (अमेरिका), चेर्नोबिल (युक्रेन) और फुकुशिमा (जापान) ने बार – बार हमें यह चेताया है कि यह एक ऐसी तकनीक है जिस पर इंसानी नियंत्रण नहीं है फुकुशिमा में आसपास के 20 किलोमीटर दायरे में 3 करोङ टन रेडियोएक्टिव कचरा जमा है।इस कचरा को हटाने में जापान सरकार ने 94 हजार करोङ खर्च कर चुकी है।विकिरण को पुरी तरह साफ करने में 30 साल लगेगें।परमाणु उर्जा स्वच्छ नहीं है।इसके विकिरण के खतरे सर्वविदित है।वहीं परमाणु संयंत्र से निकलने वाली रेडियोधर्मी कचर का निस्तारण करने की सुरक्षित विधी विज्ञान के पास भी नहीं है।ऐसी दशा में 2.4 लाख वर्ष तक रेडियोधर्मी कचङा जैवविविधता को नुकसान पहुंचाता रहेगा।इसलिए अमेरिका और ज्यादातर पश्चिम यूरोप के देशों में पिछले 35 वर्षो में रिएक्टर नहीं लगाए गए हैं।जर्मनी ने तो अपने यहां अंतिम परमाणु उर्जा संयत्र को भी इस वर्ष बंद कर दिया है।   साठ और सत्तर के दशकों में परमाणु उर्जा का बहुत शोर था।जो अस्सी के दशक आते – आते स्पष्ट हो चुका था कि परमाणु बिजली काफी महंगी पङती है।विकसित पश्चिमी देशों में परमाणु बिजली परियोजनाएं अपने बजट से ज्यादा खर्चे और योजना से ज्यादा समय लगने से पुनर्विचार के लिए बाध्य हुए। दूसरा  परमाणु बिजली घरों के संभावित खतरे,ऐसे बिजली घरों को बंद किए जाने पर आने वाली भारी लागतों और परमाणु कचरे के भंडारण की समस्या ने भी सोचने के लिए मजबूर किया है।   दरसल परमाणु बिजली उधोग में जबरदस्त मंदी है।इसलिए अमेरीका,फ्रांस और रूस आदि की कम्पनिया भारत में इसके ठेके और आर्डर पाने के लिए बेचैन है।साल 2017 में ‘ विश्व परमाणु उधोग स्थिति रिपोर्ट’ (वर्ल्ड न्यूक्लियर इंडस्ट्री स्टेटस रिपोर्ट) ने एक रिपोर्ट जारी की थी।इस रिपोर्ट में बताया गया कि पिछले चार सालों में दुनियाभर में निर्माणाधीन परमाणु रिएक्टरों की संख्या में गिरावट देखी गई है।2013 तक वैश्विक स्तर पर 68 रिएक्टरों का निर्माण कार्य चल रहा था,वहीं 2017 में निर्माणाधीन रिएक्टरों की संख्या 53 हो चुकी है।             परन्तु भारत में परमाणु परियोजना के विकास के लिए भारत के सबसे बङे बिजली उत्पादक नेशनल थर्मल पावर कार्पोरेशन (एनटीपीसी) और न्यूक्लियर पावर कार्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनपीसीआईएल) के बीच संयुक्त उद्यम अणुशक्ति विधुत निगम लिमिटेड बनाकर 1 मई 2023 को एक समझौता किया गया है।शुरुआत में संयुक्त उद्यम कंपनी दो प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (दाबित भारी जल रिएक्टर) परियोजनाओ का विकास करेगी – चुटका परमाणु परियोजना मंडला मध्यप्रदेश (2×700) और माही बांसवाडा राजस्थान परमाणु परियोजना(4×700) जिसे “फ्लीट मोड” की तरह बनाया जाएगा।रिपोर्ट के अनुसार चुटका परमाणु संयंत्र की अनुमानित लागत 25 हजार करोङ रुपए और माही परमाणु संयंत्र की 50 हजार करोङ रुपए होगी। भारत के सबसे बङे बिजली उत्पादक एनटीपीसी का लक्ष्य 2032 तक 2000 मेगावाट, 2035 तक 4200 मेगावाट और 2050 तक 20 हजार मेगावाट परमाणु उर्जा उत्पादन शुरू करना है।एनटीपीसी अभी तक ताप विद्युत और सौर उर्जा उत्पादन क्षेत्र में ही काम कर रहा था।परमाणु उर्जा क्षेत्र में

आंदोलन समाचार

पर्यावरण असंतुलन के लिए विकसित राष्ट्र सहित मानवीय लालच जिम्मेदार :- श्री आनंद मालवीय

आजादी बचाओ आंदोलन के तत्वावधान में जूम बैठक दिनांक 6 जनवरी 2023 को संपन्न हुई।इस जूम बैठक के मुख्य वक्ता इलाहाबाद के आंदोलन के साथी तथा पर्यावरणविद् श्री आनंद मालवीय थे। इस बैठक का मुख्य विषय ‘बदलता पर्यावरण, कारण और बदलने के प्रयास : जिम्मेदार कौन कार्पोरेट, आर्थिक महत्वाकांक्षा या दबी सहमी सरकारें’ ? श्री आनंद मालवीय ने इस मुद्दे पर विस्तार से अपनी बातें रखी।उन्होंने शुरुआत करते हुए कहा कि पर्यावरण का अर्थ है परि+आवरण पेड़ पौधे तथा जीव जंतु पर्यावरण में एक दूसरे को नियंत्रित करते हैं। पर्यावरण की चिंता प्राचीन समय से रही है। भारतीय साहित्य प्रकृति के साथ सायुज (सहोदर) बनाने पर जोर देता रहा है। प्राचीन काल में प्लेटो ने कृषि को भी पर्यावरण में हस्तक्षेप माना करते थे। लेकिन recycle होने तक इस व्यवस्था से कोई विशेष दिक्कत नहीं थी।   औद्योगिक क्रांति से यह संतुलन बिगड़ना उस वक्त शुरू हुआ,जब उत्पादन से तेजी से बढ़ा। आवश्यकता के बदले बाजार के लिए उत्पादन होने लगा। फ्रेंच अर्थशास्त्री का कथन काफी चर्चित हुआ, जब उसने कहा कि ‘एक झूठा अहंकार आ गया कि विज्ञान ने प्रकृति को जीत लिया है।’Supply credits its own demand. बाजारवाद का यह सूत्र वाक्य है। 19वीं शताब्दी के एक सामाजिक चिंतक डीन इंज ने कहा कि पर्यावरण असंतुलन हमें कई रूपों में दिखता है।              प्रारंभ में यह केवल वायुमंडलीय प्रदूषण के रूप में ही दिखता था। अब यह ध्वनि, जल, जैविक प्रजातियों के विलोपीकरण, कुछ वनस्पतियों का विलुप्तिकरण तथा ओजोन परत में छिद्र के रूप में दिखता है। यह जलवायु परिवर्तन के रूप में भी दिखता है। औद्योगिक उत्पादन जीवाश्म ईंधन का प्रयोग करता है।         खनिजों का अंधाधुंध प्रयोग मनुष्य के लालच का बड़ा कारण है।विकास कार्यों के साथ-साथ इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के लिए भी प्रकृति को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचाया जा रहा है।यहां पर उन्होंने महात्मा गांधी को उद्धृत करते हुए कहा कि धरती सभी की आवश्यकता है पूरी कर सकती हैं लेकिन किसी एक इंसान के लालच को पूरा नहीं कर सकती। 2012 के आंकड़ों के अनुसार विकास परियोजनाओं के कारण प्रतिवर्ष औसतन 30 लाख हेक्टेयर वन नष्ट किया जा रहे हैं।ग्लोबल वार्मिंग या जलवायु परिवर्तन का ताज़ा उदाहरण को अगस्त 2020 के बांग्लादेश में आई बाढ़ से समझा जा सकता है। सरकारी आंकड़े और उपग्रह से प्राप्त जानकारी के अनुसार उस वक्त बांग्लादेश का 24 से 37% क्षेत्रफल जलमग्न हुआ था। उस क्षेत्र के 10 लाख घर और लगभग 47 लाख लोग प्रभावित हुए थे। बांग्लादेश का लगभग दो तिहाई इलाका समुद्र तल से 5 मीटर से कम ही ऊंचा है। अगर वहां के समुद्र के जलस्तर में 30 से 35 सेंटीमीटर की बढ़ोतरी हुई तो बांग्लादेश के तटीय इलाकों में रहने वाले करीब साढे तीन करोड़ लोग विस्थापित हो सकते हैं। यह बांग्लादेश की कुल आबादी का एक चौथाई हिस्सा है।          पर्यावरण असंतुलन आधुनिक दौर में असमानता के सबसे विचलित करने वाले पहलुओं में से एक है। यह दुर्भाग्य है कि पृथ्वी को प्रदूषित करने में जो सबसे कम जिम्मेदार राष्ट्र है, वहीं इसका खामियाजा सबसे ज्यादा भुगत रहे हैं। पृथ्वी को गर्म करने में औसत बांग्लादेशी की तुलना में औसत अमेरिकी 33 गुना ज्यादा जिम्मेदार है। वैश्विक पर्यावरण के 40 फीसदी हिस्से की बर्बादी के लिए दुनिया की 10 फीसदी अमीर जिम्मेदार हैं। इसके उलट अति गरीब जनता की जिम्मेदारी केवल 5 फीसदी बनती है।उन्होंने अंत में कहा कि अगर दुनिया में पर्यावरण असंतुलन को समाप्त करना है तो विकसित और अमीर राष्ट्रों को इसकी पहल करनी होगी तथा इंसान को लोभ और लालच के बल पर अपनी बनाई हुई जीवन शैली को समाप्त करना होगा।         मुख्य वक्ता के भाषण के बाद सवाल जवाब का भी एक छोटा सा सत्र हुआ तथा उत्सुक प्रतिभागियों द्वारा कुछ रोचक टिप्पणी की गई. आंदोलन के संयोजक डॉक्टर मिथिलेश डांगी जो कि उस वक्त कॉरपोरेटी लूट के प्रतिरोध को स्वर देने छत्तीसगढ़ में थे, ने कहा कि छत्तीसगढ़ के हसदा वन क्षेत्र, जिसे कांग्रेसी हुकूमत के समय अदानी समूह को दिया गया था लेकिन उस वक्त तक वहां के जंगल को काटने की इजाजत अदानी समूह को नहीं थी। विधानसभा चुनाव के बाद भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के अगले दिन ही कई लाख हेक्टर पेड़ उस वन क्षेत्र से काट दिए गए। यह छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी के द्वारा की जाने वाली कारपोरेटी लूट का एक नमूना है।इस ज़ूम बैठक में अपनी बात कहने वाले उपरोक्त साथी के अलावे सीलम झा, हंसमुख भाई पटेल, प्रदीप जी, दिवाकर जी, हिमांशु युवा बलाश, मनीष सिन्हा सहित अन्य साथी मौजूद थे।

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