दो राजनीतिक खेमों के पार: जनता के तीसरे जनपक्ष का निर्माण

दो राजनीतिक खेमों के पार: जनता के तीसरे जनपक्ष का निर्माण : हिमांशु युवा बलाश

भारत की राजनीति में जनपक्ष की आवश्यकता: सत्ता-विपक्ष से आगे व्यवस्था परिवर्तन

जंम्बुद्वीप, भारत का इतिहास केवल साम्राज्यों के उत्थान और पतन का इतिहास नहीं है; यह हमारी सामूहिक एकता, विखंडता, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना के उतार-चढ़ाव का भी इतिहास है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी बदलते भारत ने न जाने कितने साम्राज्यों का उदय और पतन देखा। असंख्य बाहरी आक्रांताओं ने इस विशाल राष्ट्र की राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक असंगठित स्थिति का न केवल लाभ उठाया बल्की लंबे समय तक अपने शासन, विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं तथा सत्ता-केंद्रित व्यवस्थाओं को स्थापित किया। इन व्यवस्थाओं ने विकास, सुरक्षा, प्रशासन, धर्म, संस्कृति अथवा सभ्यता के नाम पर अनेक संस्थाएँ और सुविधाएँ विकसित जरूर कीं, लेकिन अक्सर उनका इस्तेमाल जनता को संगठित नागरिक शक्ति बनने से रोकने और सत्ता के केंद्रीकरण को बनाए रखने के लिए ही हुआ। महान राष्ट्र भारत की विविध संस्कृतियों, सभ्यताओं, अस्मिताओं, परंपराओं और जीवन-पद्धतियों पर अनेक बार राजनीतिक वर्चस्व स्थापित किया गया। लेकिन इस पूरे इतिहास में एक प्रश्न बार-बार सामने आता है— क्या महान भारत की कमजोरी उसकी विविधता थी, या उस विविधता का राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक एकीकरण न हो पाना ? हमारी विविधता ही हमारी मजबूती थी और हमारा बिखराव हमारी सबसे बड़ी कमजोरी बना। आक्रांताओं से लेकर औपनिवेशिक शक्तियों और आधुनिक सत्ता-व्यवस्थाओं तक, अलग-अलग शक्तियों ने इस सामाजिक और राजनीतिक विखंडन का अपने-अपने हितों के लिए उपभोग किया। लोगों को जाति, क्षेत्र, भाषा, वर्ग, धर्म, विचार और राजनीतिक पहचान के अलग-अलग खांचों में बाँटा गया, ताकि सत्ता को मजबूती से कायम रखा जा सके।

आज परिस्थितियाँ बदल गयी हैं, लेकिन मूल प्रश्न पूरी तरह यूं का यूं खड़ा जवाब की बांट जोह रहा है। आज हमारे सामने  अप्रत्यक्ष आक्रांता है जबकि आज चुनौती कहीं अधिक जटिल है—विकसित देशों का दबाव, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं की थोपी गयी नीतियाँ और कर्ज, दुनिया को नियंत्रित करने वाले अंतरराष्ट्रीय घरानों का प्रभाव, राजनीतिक ध्रुवीकरण, आर्थिक असमानता, बेरोजगारी, शिक्षा और रोजगार का संकट, संसाधनों पर नियंत्रण, संस्थाओं पर बढ़ता अविश्वास और जनता के संघर्षों का अलग-अलग दिशाओं में बिखर जाना। इसी बिखराव के बीच देश की जनता की बेचैनी और आक्रोश एक नई राजनीतिक चेतना का संकेत देती दिखाई दे रही है। अभी यह बेचैनी केवल सरकार बदलने की बात करती दिख रही है, लेकिन असली बदलाव व्यवस्था के बदलाव में निहित है। जनता वर्तमान व्यवस्था से सवाल पूछती है। लेकिन वर्तमान व्यवस्था के पास सवालों का वास्तविक और सटीक जवाब है ही नहीं, क्योंकि वर्तमान व्यवस्था स्वयं लुंज-पुंज और बंजर स्थिति में पहुँच चुकी है। वह केवल एक कमजोर शासन के रूप में उठकर जवाबदेही का दिखावा तो कर रही है, लेकिन व्यवस्था के मूल चरित्र को बदलने की क्षमता उसमें भी दिखाई नहीं देती। लेकिन इस स्थिति में देश के नागरिक अकेले नहीं है।देश के अलग-अलग हिस्सों में किसान, मजदूर, विद्यार्थी, युवा, छोटे व्यापारी, महिला, कर्मचारी और आम नागरिक अपने-अपने सवालों और उनके जवाबों को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। समस्याएँ अलग दिखाई देती हैं, लेकिन उनके पीछे मौजूद असंतोष की जड़ें एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। यहीं से एक बड़ा राजनीतिक प्रश्न जन्म लेता है— क्या इन बिखरी हुई आवाज़ों को एक-दूसरे का विरोधी बनाए रखने के बजाय एक सांझा जनपक्ष में जोड़ा जा सकता है? यहीं से People Alliance — जनपक्षीय एकीकरण की भूमिका सामने आती है। यह किसी राजनीतिक दल का गठबंधन नहीं, बल्कि जनता के विभिन्न संघर्षों, वर्गों, पीढ़ियों और आंदोलनों के सांझा हितों का राजनीतिक एकीकरण होगा। People Alliance का अर्थ किसी तीसरे राजनीतिक दल को खड़ा करना मात्र नहीं है। इसका अर्थ है—बिखरे हुए जनसंघर्षों को उनके सांझा हितों के आधार पर एक-दूसरे से जोड़ना और शायद यही वह बिंदु है जहाँ भारत अपने इतिहास के अगले महान परिवर्तन की ओर कदम बढ़ा रहा है, सत्ता बदलने से आगे बढ़कर सत्ता की राजनीति को जनता-केंद्रित बनाने का परिवर्तन। क्योंकि इतिहास ने हमें बार-बार सिखाया है बिखरी हुई जनता पर शासन किया जा सकता है;लेकिन संगठित जनता अपना भविष्य खुद लिखेगी और यहीं से शुरू होता है वो पड़ाव जो सत्ता और विपक्ष को पीछे छोड़ कर आगे बढ़ती है। ये वो क्रांतिकारी कदम है जिसके बारे में आज तक कल्पना भी नहीं की गयी क्योंकी आज तक की कल्पनाएं कहीं ना कहीं विपक्ष के लिए हथियार या ढाल बनकर आगे बढ़ने का माहोल खड़ा किया गया था फिर चाहे‌ वह सन् 77 में इंद्रा गांधी को पटकनी दी गयी थी या 2014 में सरदार मनमोहन सिंह को। दोनों घटनाओं में विपक्ष की अहम भूमिका रहीं पक्ष की सत्ता हटा कर विपक्ष का सत्ता कायम कर बड़े बदलाव लाने में बेबस रहा।

भारत की वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति — सत्ता बनाम विपक्ष से आगे:- भारत की वर्तमान राजनीति में सत्ता और विपक्ष के दृश्यों को देखा जाए तो अनंत संघर्ष के अलावा आखिर है ही क्या? आपसी वाद-विवाद, रोध-प्रतिरोध, रोष–आक्रोश, झगड़ा-फसाद,दल-बदल, विधायक और सांसदों की खरीद-फरोख्त के अलावा आखिर है ही क्या? इन सबके बीच भारत की मूल जनता के मतदाताओं के मत का क्या महत्व रह गया है? आरोप-प्रत्यारोप, घूसखोरी, भ्रष्ट व्यवस्था और सत्ता के लिए लगातार चलने वाली खींचतान में जनता का वास्तविक जनादेश कहाँ दिखाई देता है? यदि भारत की वर्तमान राजनीति को केवल सत्ता और विपक्ष के संघर्ष के रूप में देख भी लिया जाए, तो शायद हम उस बड़े परिवर्तन को समझ ही नहीं पाएँगे जो देश के सामाजिक और राजनीतिक जीवन के गर्भ में आकार ले रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 240 सीटें मिलीं और वह अपने दम पर बहुमत से नीचे रही, जबकि NDA सत्ता सठबंधन ने 293 सीटों के साथ सरकार बनाई। विपक्षी INDIA विपक्षी सठबंधन को 234 सीटें मिलीं। इससे संसद में सत्ता और विपक्ष के बीच संतुलन पहले की तुलना में अधिक प्रतिस्पर्धी हुआ, लेकिन जनता के सामने मूल सवाल केवल यह नहीं है कि सत्ता में कौन है और विपक्ष में कौन है? असल सवाल यह है कि क्या सत्ता और विपक्ष—दोनों उसी व्यवस्था के भीतर काम कर रहे हैं, जिसकी सीमाओं से जनता खुद तंग है? आज संसद और चुनावी राजनीति में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखे संघर्ष दिखाई देते हैं। बेकारी, महँगाई, बेरोजगारी, विस्थापन, भुखमरी, गरीबी, मुद्रास्फीति, रुपये का लगातार गिरना, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि का लगातार गिरना, भारत को केवल एक बड़े बाजार के रूप में देखा जाना, जल-जंगल-जमीन प्राकृतिक संसाधनों की लूट पर खामोशी और इन मूल सवालों के अलावा जातीय जनगणना, परिसीमन, छात्र आंदोलनों, परीक्षा व्यवस्था और पुलिस कार्रवाई जैसे मुद्दों पर दोनों पक्ष आमने-सामने दिखाई देते हैं। लेकिन इन संघर्षों के बीच एक तीसरा पक्ष लगातार गायब होता जा रहा है—जनता का पक्ष। यह पक्ष अभी किसी एक राजनीतिक दल के झंडे के नीचे संगठित नहीं है। वह बेरोजगार युवा में, परीक्षा में भ्रष्टाचार और पेपर लीक से परेशान विद्यार्थी में, किसानों के संघर्ष में, मजदूरों की असुरक्षा में, छोटे व्यापारियों की कठिनाइयों में, नौकरी और सम्मान की तलाश कर रहे युवाओं में, न्याय को ताकती बेबस महिलाओं में और यह उस आम नागरिक में है जो चुनाव के समय मतदाता बनता है, लेकिन चुनाव के बाद निर्णय प्रक्रिया से खुद को बाहर और असहाय पाता है। 1970 से लेकर आज तक के विभिन्न आंदोलनों ने इसी बदलती राजनीतिक मनःस्थिति को बहुत स्पष्ट रूप से सामने रखा है। लेकिन इन आंदोलनों के साथ साथ विकसित देशों की बड़ी कंपनियों से मिलने वाले फंड से बने एनजीओ से निकली वैकल्पिक राजनीति के झंडाबरदार भी धीरे-धीरे उसी व्यवस्था के अंग बनकर रह गए और जो आंदोलन वास्तविक वैकल्पिक राजनीति खड़ी नहीं कर पाए या लगातार जोर लगा रहे है, उन्हें व्यवस्था ने पुरी की पुरी विचारधारा को कुचल दिया। इस देश की व्यवस्था किसके हित में काम करेगी—संगठित सत्ता और पूँजी के हित में, या आम जनता के साझा हित में?आज वर्तमान राजनीति में सत्ता बदलने और सत्ता बचाने की राजनीति के बीच जनता के वास्तविक प्रश्न कई बार दबा दिये गये । इसलिए आवश्यकता केवल सत्ता परिवर्तन की नहीं, बल्कि “राजनीतिक दिशा परिवर्तन” की है और यही अंतर सत्ता बनाम विपक्ष की राजनीति और जनपक्षीय राजनीति के बीच है। सत्ता और विपक्ष बदलते रहते हैं, लेकिन यदि व्यवस्था का मूल चरित्र नहीं बदलता, तो जनता की समस्याएँ अपना चेहरा बदलकर फिर सामने खड़ी हो जाती हैं।इसलिए अब सवाल यह नहीं होना चाहिए कि—“अगली सरकार कौन बनाएगा?” हमारा सवाल ये बनाना होगा — कि “अगली व्यवस्था कैसी होगी और उसमें जनता की वास्तविक भूमिका क्या होगी?” यहीं से जनपक्ष एकीकरण केवल एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि भारत के बिखरे हुए जनआंदोलनों, जन समुदायों और जनता को एक साझा दिशा देने का प्रयास बनेगा। सत्ता और विपक्ष के बीच तीसरा विकल्प नहीं—बल्कि जनता को स्वयं अपने जनपक्ष के रूप में संगठित करने की आवश्यकता है।नहीं तो बिखराव और असंतोष और अधिक बढ़ेगा और समाधान की जगह केवल विकल्प की राजनीति में जनता केवल वोटर बन कर सिमट जाएगी।

Gen Z का राजनीतिक तेवर — व्यवस्था नहीं, व्यक्ति पर सवाल:- देशभर के आंदोलनों में युवाओं की भूमिका अविस्मरणीय रही है। युवाओं ने अपने खून से नस्ल, फसल और असल बचाने की लड़ाई को सींचा है। फिर चाहे वह सम्पुर्ण क्रांति आंदोलन हो, पेड़ बचाओ आन्दोलन हो, भ्रष्टाचार मिटाओ आंदोलन हो या शिष्टाचार बनाओ आंदोलन हो, या हसदेव बचाने की लड़ाई हो, कर्णपुरा बचाने की, खेती बचाने की लड़ाई हो या अरावली और खनन के खिलाफ संसाधनों को बचाने की लड़ाई—हर जगह युवा शक्ति ने भरपूर और मजबूती से कदम उठाए हैं। लेकिन इन आंदोलनों में एक कमी लगातार दिखाई देती रही है—जोश और आक्रोश युवा था, लेकिन तरीके पुराने थे। वर्तमान में दुर्योधन के सेनापति ने नया चक्रव्यूह रचा, जिसके नियम बदल दिये गये। लेकिन इस बार भी अभिमन्यु के हथियार, योजना और रणनीति अधूरी थी। नेपाल और श्रीलंका की तर्ज पर भारत में भी एक क्रांति का असफल प्रयास हो चुका है। लेकिन भारत के व्यापक भूभाग, उसकी विशाल आबादी, सामाजिक विविधता और जटिल राजनीतिक-सामाजिक संरचना के कारण उस तरह की क्रांति भारत में संभव नहीं है। भारत की परिस्थितियाँ अलग हैं और यहाँ परिवर्तन का रास्ता और योजना भी अलग काम करेगी। देखते ही देखते जंतर-मंतर पर Cockroach Janta Party के कमजोर नेतृत्व संगठन के बाद लगातार Gen Z सड़कों पर दिखाई दे रहे है। लेकिन उद्देश्यविहीन संगठन अंततः अराजकता के अलावा कुछ नहीं देते। आक्रोश को दिशा न मिले, संघर्ष को लक्ष्य न मिले और संगठन के पास आगे की राजनीतिक भूमिका स्पष्ट न हो, तो आंदोलन धीरे-धीरे उसी व्यवस्था में समा जाता है जिसके खिलाफ वह खड़ा हुआ था। राघव चड्ढा जैसे नौजवान सांसद, जो Gen Z की आवाज बन रहे थे, उन्होंने खेमे बदले, चुप्पी को स्वीकार किया और सत्ता के दुत्कार में बैठ गए। यह केवल किसी एक व्यक्ति का सवाल नहीं है; यह उस राजनीतिक व्यवस्था की सच्चाई है जिसमें जनप्रतिनिधि जनता के जनादेश से अधिक अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने में लग जाते हैं। धर्मेंद्र प्रधान जैसे शिक्षा मंत्री का इस्तीफा भी पर्याप्त नहीं था। मांग केवल एक मंत्री को पद से हटाने की नहीं, बल्कि उस समुची राजनीति को ही चुनौती देने की होनी चाहिए थी, जो शिक्षा, रोजगार और युवाओं के भविष्य से जुड़े सवालों का स्थायी समाधान देने में असफल रही है। लेकिन Gen Z का आंदोलन फिलहाल व्यक्ति को पद से हटाने का लक्ष्य बनाकर उसी को अपनी जीत मान चुका है। यह जीत नहीं है। यह उस पानी के बुलबुले की तरह है, जो कुछ समय के लिए दिखाई देता है और फिर अचानक फूट जाता है। असली जीत तब होगी जब Gen Z यह सवाल उठाएगी कि वह व्यवस्था क्यों है जो एक धर्मेंद्र प्रधान को हटाकर दूसरे धर्मेंद्र प्रधान को बैठाने की स्थिति पैदा करती है? सवाल व्यक्ति से नहीं, व्यवस्था से करना होगा। सवाल मंत्री से नहीं, मंत्रालय और निर्णय प्रक्रिया की जवाबदेही के लिए करना होगा। जवाब सरकार बदलने का नहीं, बल्कि सरकार चलाने की पूरी “राजनीतिक संस्कृति” बदलने का इस देश की जनता को खड़े होकर छीनना होगा और यहीं देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती है अपने आक्रोश को व्यक्ति विरोध से व्यवस्था परिवर्तन के संघर्ष में बदलना। क्योंकि व्यक्ति बदलते रहेंगे, सरकारें बदलती रहेंगी, पार्टियाँ बदलती रहेंगी; लेकिन यदि व्यवस्था का चरित्र नहीं बदला तो जनता के सवाल भी बार-बार नए चेहरे के साथ वापस आते रहेंगे। इस बार केवल सरकार का चेहरा बदलने की नहीं, पूरा गुलदस्ता बदलने की तैयारी कर रहे है। वर्तमान गुलदस्ते में लगे फूलों को अब मुरझाने के लिए छोड़ देना होगा और जिस दिन यह गुलदस्ता बदलेगा, उस दिन फूलों की हर पंखुड़ी से जबरन हिसाब माँगा जाएगा। देश को हुई हानि का हिसाब उनके द्वारा बिछाए गए काँटों और उनकी जमाई हुई जड़ों तक से लिया जाएगा। याद रखना होगा—जनता पर किए गए जुल्मों और जनता से किए गए झूठे वादों का हिसाब होगा। राष्ट्र के साथ की गई कथित गद्दारी और जनता के हितों के विरुद्ध बनाई गई नीतियों का भी लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से हिसाब होगा। हम उन सब पर महाअभियोग चलाएंगे जिन्होंने भारत की अस्मिता के साथ खिलवाड़ किया, उसकी अखंडता को ठेस पहुंचाई, उसकी नैतिक स्वतंत्रता भंग की, उसके सम्प्रभुता को कुचल दिया गया और उसकी महानता को बेहरमी से घसीटा गया। हम उन नीतियों पर सवाल करेंगे, जिन्होंने इस देश को दुनिया के सामने केवल एक बाजार बनाकर खड़ा कर दिया और अपने ही लोगों को अंतरराष्ट्रीय आर्थिक शक्तियों के सामने नोचने के लिए छोड़ दिया। हम किसी व्यक्ति को हटा कर अपनी जीत मानने नहीं निकले है, हम एक ऐसी जनशक्ति तैयार करेंगे जो व्यवस्था को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने की क्षमता रखती हो?

सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच घूमती राजनीति की सीमा: – देश की राजनीति में सत्ता और विपक्ष की नीतियों में जनता या राष्ट्र के हित से अधिक केवल सत्ता में बने रहने या उसे पाने के लिए दाँव-पेंचों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो जनता के लिए भयानक रूप साबित हो रहा है। सत्ता में बने रहने के लिए क्षेत्रीय पार्टियों के प्रभाव को साथ लेकर मजबूत लोकतंत्र को कमजोर करने का जो राष्ट्रीय कार्यक्रम चल रहा है, वह नाकाबिले-बर्दाश्त है। ऐसे में देश में केवल सत्ता, विपक्ष और उनके सठबंधन, दल-बदल की राजनीति ने लोकतंत्र को अपाहिज और संसद को बांझ बना दिया है। सत्ता की ताकत के आगे दागदार विधायक और सांसद भी बेदाग बन जाते हैं और सत्ता के आँचल में बैठ जाते हैं। फिर वहीं से वो समुची व्यवस्था, जनता और उनके अधिकारों को नियंत्रित करते हैं। हम देश में तीसरी सत्ता तीसरे जनपक्ष उदय की बात करते हैं—जहाँ जनता को नियंत्रित करने की नहीं, सीधी भागीदारी की बात हो। जनता केवल वोटर नहीं है। वह सत्ता और विपक्ष के मदारी के खेल को बनाने-बिगाड़ने की दर्शक मात्र भी नहीं है। वह इस देश के मजबूत लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है, जिसके बिना सत्ता और विपक्ष दोनों केवल मदारी हैं .

“जनता बनाम राजनीतिक दल” नहीं, बल्कि “जनता की राजनीति” की आवश्यकता; हमें जनता को केवल राजनीतिक दलों के विरुद्ध खड़ा करना नहीं चाहते, बल्कि राजनीति को जनता के पक्ष में लाकर खड़ा करना की तैयारी कर रहे हैं। राजनीतिक दल लोकतंत्र और चुनावी व्यवस्था का हिस्सा हैं और जनता के प्रतिनिधित्व का एक माध्यम; जनता खुद लोकतंत्र का मजबूत आधार है। इसलिए लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की भूमिका जनता से ऊपर नहीं हो सकती। आज समस्या केवल किसी एक राजनीतिक दल की नहीं है। समस्या उस पूरी “राजनीतिक संस्कृति” की है, जिसमें जनता चुनाव के समय मालिक दिखाई देती है, अपना मत देकर सरकार बनाती है और चुनाव समाप्त होते ही उसकी भूमिका केवल दर्शक की बनकर रह जाती है। जनता पाँच वर्ष तक सरकार के फैसलों और विपक्ष के आरोप-प्रत्यारोप झेलती है और अगले चुनाव का इंतजार करती है। फिर चुनाव आता है, राजनीतिक दल जनता के बीच जाते हैं, वादे करते हैं, घोषणाएँ करते हैं, जुमले फैंकते हैं और जनता से वोट लेकर फिर सत्ता के गलियारों में पहुँच जाते हैं। यह चक्र वर्षों से चलता आ रहा है। इस व्यवस्था में जनता का सबसे महत्वपूर्ण अधिकार—अपने मत के बाद अपनी भागीदारी जो लगातार कमजोर हुई है। जनता ने जिसे चुनकर भेजा, वह जनता के प्रति कितना जवाबदेह है? उसके द्वारा किए गए वादों का हिसाब कौन लेगा? नीतियाँ बनाने में जनता की भूमिका क्या होगी? जनता के संसाधनों पर निर्णय कौन करेगा ? और यदि जनप्रतिनिधि जनता के हितों के विपरीत काम करे तो जनता के पास उसे जवाबदेह बनाने का सीधा लोकतांत्रिक अधिकार क्या है ? यही वे सवाल हैं जिन्हें जनता की राजनीति के लिए उठाना होगा। जनता की राजनीति का अर्थ यह नहीं  है कि सभी राजनीतिक दल समाप्त कर दिए जाएँ। बल्की इसका अर्थ यह है कि राजनीतिक दलों और सत्ता के ऊपर जनता के हित और जनता की भागीदारी को स्थापित किया जाए। राजनीतिक दल जनता के प्रतिनिधि हैं, जनता के मालिक नहीं।सरकार

जनता द्वारा चुनी जाती है, इसलिए सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह होना होगा संसद और विधानसभाएँ जनता के प्रतिनिधित्व नाम पर चलती हैं, इसलिए उनमें होने वाली राजनीति का केंद्र भी जनता के वास्तविक हित होने चाहिए। आज आवश्यकता ऐसी राजनीति की है जिसमें जनता केवल वोट देने वाली संख्या न हो, बल्कि निर्णय प्रक्रिया में अपनी सीधी और प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करे।सत्ता जनता से निकले, जनता के प्रति जवाबदेह रहे और जनता के हित में काम करे।इसीलिए हमारा संघर्ष “जनता बनाम राजनीतिक दल” का संघर्ष नहीं है। हमारा संघर्ष है राजनीति को जनता के हाथों में वापस लाने का। राजनीति पर जनता का अधिकार स्थापित करने का। जनता को वोटर से भागीदार बनाने का। जनादेश को पाँच वर्ष के लिए सत्ता का लाइसेंस बनने से रोकने का और ऐसी राजनीतिक व्यवस्था खड़ी करने का जिसमें जनता केवल सरकार बनाए नहीं, बल्कि शासन और नीति-निर्माण की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भी अपनी वास्तविक भूमिका निभाए। यही राजनीति है और यहीं से जनपक्षीय राजनीति की शुरुआत होती है—जहाँ राजनीति का उद्देश्य सत्ता हासिल करना नहीं, बल्कि जनता को राजनीतिक शक्ति बनाना हो। विरोध को भी दो खेमों में बाँट देने की राजनीति वर्तमान स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि भाजपा के शासनकाल में हर विरोधी को कांग्रेसी और कांग्रेस के शासनकाल में हर विरोधी को भाजपाई, संघी या मुखबिर कहकर उसकी आवाज को दबाने की कोशिश की जाती रही है।

केन्द्र में बैठी भाजपा का कोई कार्यकर्ता या समर्थक अपने राजनीतिक सिद्धांतों के विरुद्ध कोई सवाल सुनने को तैयार नहीं होता तो बहस और तर्क के बजाय गाली-गलौज पर उतर आता है। उसकी नजर में हर विरोधी कांग्रेसी या कांग्रेस समर्थक हो जाता है। वो लोग विरोधियों को चमचा कह कर सम्बोधित करते हैं। ठीक यही स्थिति कांग्रेस के शासनकाल में भी रही थी —विरोध करने वाले को भाजपाई, संघी या मुखबिर करार दिया जाता रहा है। सबसे खतरनाक बात यह है कि जो लोग न कांग्रेस के साथ है और न भाजपा के साथ, बल्की न्युट्रल है उन्हे भी इन दोनों दलों ने एक-दूसरे का मुखौटा पहना दिया है। यदि आप भाजपा से सवाल करें तो कांग्रेसी, कांग्रेस से सवाल करें तो भाजपाई—आखिर जनता अपने सवाल पुछे तो किससे और कैसे पूछे? यही वह सुनियोजित षड्यंत्र है जिसने धीरे-धीरे विरोध के एक बड़े स्वतंत्र पक्ष को कमजोर किया और जनता के असली सवालों को सत्ता बनाम विपक्ष के शोर में दबा दिया। अब देश को केवल सत्ता और विपक्ष के बीच घूमती राजनीति की जरूरत नहीं है बल्की देश में एक मजबूत तीसरा पक्ष के उदय की जरूरत है। —ऐसा पक्ष जो न सत्ता का चाटुकार हो, न हो विपक्ष का चमचा। जो सत्ता से सवाल करे तो सत्ता की आँखों में आँख डालकर करे और विपक्ष से सवाल करे तो विपक्ष को भी खामौश कर दे। जिसके सामने न भाजपा का भय हो, न कांग्रेस का मोह। क्योंकि लोकतंत्र में जनता को दो खेमों में बाँटकर चुप कराने वालों के सामने जनता का अपना एक मजबूत राजनीतिक पक्ष खड़ा करना ही होगा। न सत्ता के साथ, न सत्ता के खिलाफ किसी दल के साथ— बल्कि जनता के साथ, जनता के पक्ष में एक मजबूत तीसरी ताकत। यही जनपक्ष है।People Alliance — राजनैतिक दलों का गठबंधन या विलय नहीं, जनशक्तियों का एकीकरण People Alliance का अर्थ अलग-अलग राजनीतिक दलों का चुनावी गठबंधन नहीं है। इसका अर्थ है—देश के अलग-अलग हिस्सों में बिखरी जनशक्तियों, जनआंदोलनों और जनहित के संघर्षों का एकीकरण। आज किसान अलग लड़ रहा है, मजदूर अलग, विद्यार्थी अलग, बेरोजगार युवा अलग, छोटा व्यापारी अलग, महिलाएँ अलग, कर्मचारी अलग और आम नागरिक अपने-अपने सवालों के साथ अलग खड़ा है। संघर्ष अलग-अलग हैं, लेकिन संकट एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इन्हीं बिखरी हुई शक्तियों को एक साझा जनपक्ष में जोड़ना People Alliance का उद्देश्य है। यह गठबंधन कुर्सियों का नहीं, मुद्दों और समस्याओं के समाधान का होगा। यह समझौता पार्टियों के बीच नहीं, जनता के हितों के बीच होगा। यह मजबूत नेतृत्व के साथ साझा जनभागीदारी का होगा। People Alliance का सवाल यह नहीं होगा कि कौन-सी पार्टी सत्ता पर काबिज़ होगी? बल्कि सवाल होगा— सत्ता जनता के प्रति कितनी जवाबदेह होगी? किसान, मजदूर, युवा, विद्यार्थी, महिला, कर्मचारी, छोटा व्यापारी और आम नागरिक—इन सबके संघर्षों को एक-दूसरे से जोड़कर एक ऐसी जनशक्ति तैयार करना, जो सत्ता और विपक्ष दोनों से जनता के सवालों और समस्याओं के समाधान का जवाब कालर पकड़ कर डंके की चोट पर ले सके, यही People Alliance की बुनियाद होगी।यह तीसरी ताकत केवल सत्ता की कुर्सी पाने का अभियान नहीं, बल्कि जनता को राजनीतिक शक्ति बनाने का अभियान है। क्योंकि जब तक जनता बिखरी रहेगी, राजनीतिक दल उसे अपने-अपने खेमों में बाँटते रहेंगे। जिस दिन जनशक्तियाँ एकजुट हो गईं, उस दिन राजनीति के केंद्र में दलदल नहीं जनता होगी।

आमूल-चूल व्यवस्था परिवर्तन की दिशा:- अब सवाल केवल सरकार बदलने का नहीं, व्यवस्था बदलने का है। वर्षों से सत्ता और विपक्ष के बीच घूमती राजनीति ने जनता को केवल सरकारें बदलने का अवसर दिया, व्यवस्था के मूल चरित्र को बदलने का नहीं। आमूल-चूल व्यवस्था परिवर्तन का अर्थ किसी व्यक्ति, पार्टी या सरकार को हटाकर उसकी जगह दूसरे व्यक्ति, पार्टी या सरकार को बैठाना नहीं है। इसका अर्थ है—राजनीति की दिशा, सत्ता के चरित्र और निर्णय प्रक्रिया में जनता की भूमिका को मूल रूप से बदलना। इसके साथ नौकरशाही में जमीनी और गंभीर बदलाव, धर्म और आध्यात्मिकता की अपनी-अपनी सीमाओं का सुनिश्चित निर्धारण, आर्थिक असमानता पर नियंत्रण, शिक्षा व्यवस्था में सुधार और तकनीकी विकास को जनहित से जोड़ना भी आवश्यक होगा। जनता केवल मतदाता नहीं, निर्णय की भागीदार बने। जनप्रतिनिधि केवल चुनाव जीतकर पाँच वर्ष के लिए स्वतंत्र न हो जाएँ, बल्कि जनता के प्रति लगातार जवाबदेह रहें। देश के जल, जंगल, जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर फैसले जनता के हित और उसकी भागीदारी से हों। नीतियाँ जनता के लिए नहीं, जनता की भागीदारी से बनें। यही आमूल-चूल व्यवस्था परिवर्तन की पहली दिशा है। सत्ता बदलना परिवर्तन नहीं है। सत्ता के चरित्र को बदलना परिवर्तन है।
केवल चेहरे बदलना परिवर्तन नहीं है, बल्कि जनता की भूमिका बदलना ही वास्तविक परिवर्तन है आंदोलन से जनशक्ति, जनशक्ति से जनपक्ष और जनपक्ष से आमूल-चूल व्यवस्था परिवर्तन—यही परिवर्तन की दिशा है। हम भारतीय हैं, कोई बिल के चूहे नहीं कि बिल्ली के गले में घंटी बाँधने के लिए अपनी पीढ़ियों की कुर्बानियाँ देते रहें। हम वह योद्धा नागरिक हैं, जो बिल्ली तो क्या, शेर को भी अपने पंजों में जकड़ने की हिम्मत रखते हैं। सत्ता ने खुद को जंगली शेर समझते समझते भले पुरे राष्ट्र को जंगल राज में बदल दिया गया है इससे भारत की जनता की ताकत कम नहीं होगी। महान भारत के नागरिक जब ठान लें, तो सत्ता और उसके संरक्षण में पलने वाले राजनीतिक अहंकार को लोकतंत्र के पिंजरे में बंद करने में पीछे नहीं हटेंगे।केंद्र की सत्ता में पिछले 12 वर्षों से जिसने स्वयं को शेर समझने का भ्रम पाल रखा है, न केवल उसे बल्कि समूची व्यवस्था को समझना होगा कि जनता की ताकत के सामने सत्ता का अहंकार आखिरकार भीगी बिल्ली बन जाता है। अब उसके गले में केवल घंटी बाँधने की नहीं, बल्कि जनता के लोकतांत्रिक नियंत्रण की लगाम डालने की जरूरत है। देशभर के बिखरे हुए जनसमुदाय से हमारा अंतिम आह्वान है अपने-अपने संघर्षों की सीमाओं से बाहर आइए।अपने आक्रोश को हमारा साथ देकर एक दिशा दीजिए। अपनी आवाजों को एक सांझे मंच से जोड़िए और जनपक्ष पर अपने जीवन की पहली मोहर लगाइए। देश में एक ऐसी तीसरी ताकत खड़ी कीजिए जो सत्ता की पिछलग्गू न हो और विपक्ष की मोहताज न हो, किसी दल की चाटुकार न हो जो केवल जनता के पक्ष में खड़ी हो और यदि इसमें थोड़ा समय और लगे तो लगे।हमने यह बीड़ा उठाया है। हम इसे पूरा करेंगे। जनशक्तियों को जोड़कर, जनपक्ष को खड़ा करेंगे और रक्त रंजित बाँझ व्यवस्था व्यवस्था को बदलेंगे। क्योंकि इस बार केवल सरकार बदलने की लड़ाई नहीं है इस बार जनता को उसकी राजनीतिक ताकत वापस दिलाने की लड़ाई है।

“भारत को एक ओर दलबदल राजनीतिक गठबंधन की नहीं, बल्कि जनता के बिखरे हुए संघर्षों के एकीकरण की जरूरत है।” जरूरत उस जनशक्ति को एकजुट करने की है जो देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग मुद्दों को लेकर लड़ रही और व्यवस्था की दलदल की गर्त में समा रहीं हैं।अर्थात किसान का संघर्ष मजदूर से जुड़े, मजदूर का संघर्ष युवा से जुड़े, विद्यार्थी का सवाल रोजगार से जुड़े और आम नागरिक का संघर्ष जल, जंगल, जमीन, संसाधन, शिक्षा, रोजगार और सम्मान के सवालों से जुड़े।संघर्ष अलग हो सकते हैं, लेकिन जनपक्ष एक होना चाहिए। यही बिखरी हुई आवाजों को एक साझा राजनीतिक शक्ति में बदलने की दिशा है। न सत्ता की साझेदारी, न कुर्सी का बँटवारा— बल्कि जनता की राजनीतिक भागीदारी और जनपक्ष की स्थापना।

“लेखक एवं जनपक्षीय विचारक”

हिमांशु युवा बलाश
राष्ट्रीय युवा संयोजक:- आज़ादी बचाओ आंदोलन,
संपादक:- नई आज़ादी उद्घोष.

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