“जन-संसाधनों पर जन-अधिकार स्थापित करने का समय आ गया है”
प्रिय देशवासियों,
हमें तीन शक्तियों को एक करना होगा:
किशोर — जिनमें ऊर्जा और विद्रोह है.
नौजवान — जिन पर जिम्मेदारियों का बोझ है.
बुजुर्ग — जिनके पास अनुभव और चेतना है.
हम लगातार अपनी-अपनी आवाज़ अपने-अपने मुद्दों के लिए उठाते आए हैं। देश भर के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग संगठनों ने संघर्ष किए, कई लड़ाइयों में सफलताएँ भी हासिल की लेकिन वे सभी सफलताएँ बिखरी हुई रहीं। कुछ समय बाद हमारे सामने फिर एक नया संकट, एक नया मुद्दा खड़ा किया गया और हम फिर उसी नए संघर्ष में उतर गए। अब समय आ गया है कि हम यह स्वीकार करें कि हम इस व्यवस्था के चक्रव्यूह में कृष्ण नहीं, बल्कि अभिमन्यु की तरह लड़ रहे हैं — जो चक्रव्यूह में घुसना जानता है, लड़ना भी जानता है, लेकिन उससे बाहर निकलने की सामूहिक रणनीति नहीं बना पाया।दुनिया भर के संघर्षशील समाजों ने यही गलती की। वे लड़ते रहे, संघर्षों को जीतते भी रहे, लेकिन अस्थायी परिवर्तन भी स्थापित नहीं कर सके। युद्ध निरंतर जारी रहा।
जबकि हमारा उद्देश्य केवल युद्ध जीतना नहीं होना चाहिए, बल्कि उस व्यवस्था को बदलना है जो बार-बार जनता को संघर्ष करने पर मजबूर करती है। आज देश की स्थिति फिर उसी मोड़ पर खड़ी है। हम अलग-अलग मोर्चों पर बिखरकर लड़ रहे हैं — किसान अपने मुद्दे पर, छात्र अपने मुद्दे पर, मजदूर अपने मुद्दे पर, महिलाएँ अपने अधिकारों के लिए, बेरोजगार युवा रोजगार के लिए, आदिवासी जल-जंगल-जमीन के लिए।
लेकिन हमारी बिखरी हुई शक्तियाँ व्यवस्था परिवर्तन का आधार नहीं बन पा रहीं।
सन 2010 में भी देश में ऐसा ही माहौल बना था। भूमि अधिग्रहण, परमाणु संयंत्रों, जल संकट, बेरोजगारी, शिक्षा, विस्थापन और जन-अधिकारों के सवाल पर पूरा देश आंदोलनों से भरा हुआ था। जनता सड़कों पर थी। लेकिन उसी समय वैश्विक शक्तियों खासकर वर्ल्ड बैंक द्वारा “भ्रष्टाचार विरोध” की एक ऐसी मुहिम खड़ी की गई जिसने देश की जमीनी लड़ाइयों की दिशा बदल दी। जन-संघर्षों को पुनर्गठन और व्यवस्था परिवर्तन की दिशा में बढ़ने से रोक दिया गया। परिणाम यह हुआ कि जो ऊर्जा जन-आंदोलन खड़ा कर सकती थी, वह धीरे-धीरे शांत कर दी गई।
आज फिर दुनिया करवट बदल रही है। पूरी दुनिया में आर्थिक संकट, कॉर्पोरेट नियंत्रण, संसाधनों की लूट और जन-अधिकारों पर हमले तेज़ हो रहे हैं। भारत भी उसी दौर से गुजर रहा है।और हमें सावधान रहना होगा —कहीं फिर कोई ऐसा प्रायोजित नैरेटिव खड़ा न कर दिया जाए जो जनता की वास्तविक लड़ाइयों को भटका दे और आने वाले 15 वर्षों तक जन-आंदोलनों को कमजोर कर दे।
इस बार हमें केवल किसी चेहरे, किसी मैगेसैसे पुरस्कारधारी या किसी तैयार किए गए “नायक” के पीछे नहीं चलना है। बल्की इस बार जनता को स्वयं अपनी आवाज़ बनना होगा। आज स्थिति यह है कि कॉर्पोरेट शक्तियाँ सत्ता का साथ नहीं छोड़ रही हैं और विपक्ष भी जनता की वास्तविक लड़ाइयों को निर्णायक रूप से अपने हाथ में लेने की स्थिति में दिखाई नहीं देता। ऐसे में देश कब तक प्रत्यक्ष और परोक्ष अंतरराष्ट्रीय शक्तियों के लिए एक प्रयोगशाला बना रहेगा? देश की वर्तमान परिस्थितियों में केंद्र में बैठी निर्वाचित तानाशाह सत्ता को चुनाव के रास्ते हरा पाना असम्भव है और क्रांति के बल पर पुनर्गठन संभव नहीं। तो आम जन के पास एक ही रास्ता है :- जनपक्ष का।

कभी न कभी इस देश की जनता को तीसरा पक्ष जनपक्ष खड़ा करना ही होगा — ऐसा जनपक्ष जो सत्ता के नथुनों में हाथ डालकर जनविरोधी नीतियों को रोक सके। जब तक जनता स्वयं व्यवस्था परिवर्तन की ताकत नहीं बनेगी, तब तक कोई भी दल हो — जनता को पीसती रहेगी। आज केवल चुनावी बदलाव पर्याप्त नहीं है। यदि समाज संगठित नहीं हुआ, तो असंतोष बढ़ेगा, टकराव बढ़ेंगे और देश अराजक संघर्षों की ओर धकेला जाएगा।इसलिए आज सबसे बड़ी जरूरत राष्ट्रीय एकीकरण की है — जहाँ किशोरों का जोश, युवाओं की जिम्मेदारी और बुजुर्गों का अनुभव एक साथ खड़ा हो।
हमें तीन शक्तियों को एक करना होगा: किशोर — (जिनमें ऊर्जा और विद्रोह है.), नौजवान — (जिन पर जिम्मेदारियों का बोझ है.) और बुजुर्ग — (जिनके पास अनुभव और चेतना है.) इन्हीं तीनों के मेल से नया भारत खड़ा होगा। व्यवस्था परिवर्तन केवल किताबों, घोषणापत्रों, सिद्धांतों, भाषणों और नारों से नहीं आएगा। अपने अहम, वहम, झंडे, डंडे टोपी, सिद्धांतों आदर्शों की पोटली में टांग कर एकजूट होना पड़ेगा वर्ना बिखरे हुए लोग आवाज़ भी बुलंद नहीं कर पाते और हम व्यवस्था परिवर्तन की बात करते हैं।
1977 में भी व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई सात आयामों पर लड़ी गई थी, लेकिन बाद में वह अलग-अलग दलों में बंटकर रह गई। इस बार परिस्थितियां पहले से भयानक और बहुआयामी हो गयी है। हम इस नई लड़ाई को केवल एक “सेनापति” के आधार पर खड़ा नहीं करना चाहते। यह संघर्ष बदलते नेतृत्व, बढ़ती जिम्मेदारियों और सामूहिक भागीदारी के साथ तब तक जारी रहेगा जब तक नई व्यवस्था स्थापित नहीं हो जाती।आज हमारा देश ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ जल, जंगल, जमीन, खनिज, नदियाँ, पहाड़ और प्राकृतिक संसाधनों पर जनता का अधिकार लगातार कमजोर किया जा रहा है। विकास के नाम पर सरकारें जन-संसाधनों को बड़े कॉर्पोरेट घरानों और देशी-विदेशी कंपनियों के हवाले कर रही हैं।
यह केवल जमीन का सवाल नहीं है — यह हमारे अस्तित्व, हमारी आने वाली पीढ़ियों और भारत की आत्मा का प्रश्न है। हम यह मानते हैं कि — “देश के संसाधनों के असली मालिक जन-समुदाय हैं — न सरकारें और न कंपनियाँ।” हमारा संघर्ष किसी दल या सत्ता के लिए नहीं, बल्कि जन-अधिकार, स्वदेशी, स्वराज, आत्मनिर्भरता और आर्थिक आज़ादी के लिए है। आज जरूरत है कि —हर गाँव, हर युवा अपनी आवाज बुलंद करे, हर नागरिक जन-संसाधनों की रक्षा के लिए आगे आए, सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक जनता की आवाज गूँजे
यदि हम संगठित होंगे, तो कोई भी ताकत जनता के अधिकारों को नहीं छीन सकती।
आइए,
नई आज़ादी की इस लड़ाई में शामिल हों और जन-मालिकियत स्थापित करने के इस ऐतिहासिक अभियान का हिस्सा बनें।
ना रुकेंगे, ना झुकेंगे, ना बिकेंगे, ना टुटेंगे, ना पीछे हटेंगे, अपने अधिकार लेकर रहेंगे
हिमांशु युवा बलाश
राष्ट्रीय युवा संयोजक
आज़ादी बचाओ आंदोलन
“देश की अस्मिता और अखंडता को समर्पित”


