हमारा विज़न: -आज़ादी बचाओ आंदोलन

हम एक ऐसे भारत की कल्पना करते हैं — जहाँ देश की अर्थव्यवस्था बहुराष्ट्रीय कंपनियों और कॉर्पोरेट ताकतों के नियंत्रण से मुक्त होकर स्वदेशी, स्वावलंबी और जनकेंद्रित बने। जहाँ जल-जंगल-ज़मीन, प्राकृतिक संसाधनों और उत्पादन व्यवस्था पर पहला अधिकार देश की जनता का हो, न कि मुनाफाखोर कंपनियों और उनके एजेंट बने सत्ता तंत्र का।

हमारा विज़न ऐसे समाज का निर्माण करना है, जिसमें किसान, मजदूर, छात्र, युवा, महिलाएँ, आदिवासी, कारीगर और मेहनतकश वर्ग सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें। जहाँ हर किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य मिले, भूमिहीन खेतिहर मजदूरों को न्याय मिले और कारीगरों के कौशल तथा वैज्ञानिकों की प्रतिभा का उपयोग आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में हो।

हम ऐसी व्यवस्था स्थापित करना चाहते हैं, जहाँ शिक्षा और स्वास्थ्य बाजार की वस्तु नहीं, बल्कि हर नागरिक का मौलिक अधिकार हों। जहाँ कन्वेंटीकरण और बाजारवादी शिक्षा व्यवस्था के स्थान पर ऐसी राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली हो, जो देश, समाज, श्रम और स्वदेशी चेतना से जुड़ी हो। जहाँ आम आदमी का जीवन सम्मानपूर्ण हो और विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे।

हमारा विज़न ऐसी विकेंद्रित अर्थव्यवस्था का है, जिसमें उत्पादन गांव-गांव में हो, स्थानीय उद्योग और छोटे उत्पादन केंद्र मजबूत हों तथा रोजगार आधारित विकास को प्राथमिकता मिले। हम उस व्यवस्था का विरोध करते हैं जिसमें बड़े कॉर्पोरेट उत्पादन मॉडल के कारण बेरोजगारी, विस्थापन और आर्थिक असमानता बढ़ती है। हमारा विश्वास है कि स्वदेशी उत्पादन, सहकारिता और श्रम आधारित अर्थव्यवस्था ही वास्तविक आत्मनिर्भरता का मार्ग है।

हम ऐसी सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करना चाहते हैं, जहाँ दलितों, आदिवासियों, महिलाओं, पिछड़े वर्गों और शोषित समुदायों की पूर्ण भागीदारी सुनिश्चित हो। आदिवासी समाज की संस्कृति, प्रकृति और जीवन मूल्यों की रक्षा करते हुए उन पर होने वाले अन्याय और शोषण के खिलाफ संघर्ष करना हमारे विज़न का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

हम प्रकृति के अंधाधुंध दोहन और पर्यावरण विनाश पर आधारित विकास मॉडल का विरोध करते हैं। हमारा लक्ष्य ऐसी जीवन व्यवस्था स्थापित करना है, जिसमें मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन, संवेदनशीलता और सहअस्तित्व बना रहे। जल, जंगल, जमीन और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा को हम आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की रक्षा मानते हैं।

हम विपथगामी सांस्कृतिक साम्राज्यवाद और अपसंस्कृति के खिलाफ भारतीय स्वदेशी चेतना, सामाजिक मूल्यों और राष्ट्रीय अस्मिता को मजबूत करना चाहते हैं। हमारा मानना है कि आर्थिक गुलामी के साथ-साथ सांस्कृतिक गुलामी भी राष्ट्र को कमजोर करती है। इसलिए आत्मनिर्भर भारत का निर्माण केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और वैचारिक स्वतंत्रता का भी संघर्ष है।

हमारी दृष्टि केवल भारत तक सीमित नहीं है। हम दुनिया के उन सभी शोषण-विरोधी आंदोलनों के साथ एकजुटता में खड़े हैं, जो साम्राज्यवाद, कॉर्पोरेट लूट और आर्थिक अन्याय के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। क्योंकि हमारी लड़ाई का निशाना एक ही है — शोषण, अन्याय और मुनाफाखोर व्यवस्था।

हम देश के किसानों, मजदूरों, छात्रों, बुद्धिजीवियों, ट्रेड यूनियनों, महिलाओं, आदिवासियों और युवाओं से आह्वान करते हैं कि वे निजी हितों से ऊपर उठकर नई आज़ादी के इस संघर्ष में शामिल हों।

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